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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 56 ☆ परसाई जी के जीवन का अन्तिम इन्टरव्यू – समर्पित ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय (श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की  अगली कड़ी में  उनके द्वारा स्व हरिशंकर परसाईं जी के जीवन के अंतिम इंटरव्यू का अंश।  श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी ने  27 वर्ष पूर्व स्व  परसाईं जी का एक लम्बा साक्षात्कार लिया था। यह साक्षात्कार उनके जीवन का अंतिम साक्षात्कार मन जाता है। आप प्रत्येक सोमवार ई-अभिव्यिक्ति में श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी के सौजन्य से उस लम्बे साक्षात्कार के अंशों को आत्मसात कर सकेंगे।)  ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 56 ☆ ☆ परसाई जी के जीवन का अन्तिम इन्टरव्यू – समर्पित ☆    जय प्रकाश पाण्डेय – आपने अपनी...
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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ विष्णु प्रभाकर की जयंती पर कुछ यादें  ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय  (जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता) आज प्रस्तुत है मूर्धन्य साहित्यकार स्व विष्णु प्रभाकर जी की जयंती (21 जून ) पर आदरणीय श्री कमलेश भारतीय जी के अविस्मरणीय संस्मरण।  कृपया आत्मसात करें। (21 June 1912 – 11 April 2009) ☆ संस्मरण  : विष्णु प्रभाकर की जयंती पर कुछ यादें   ☆ मित्र अरूण कहरवां ने आग्रह किया कि विष्णु प्रभाकर जी को स्मरण करूं कुछ इस तरह कि बात बन जाये। मैं फरवरी, ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 58 ☆ संस्मरण – हमारे मित्र डॉ लालित्य ललित जी ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का एक अतिसुन्दर संस्मरण “हमारे मित्र  डॉ लालित्य ललित जी”।  श्री विवेक जी ने  डॉ लालित्य ललित जी  के बारे में थोड़ा  लिखा  ज्यादा पढ़ें की शैली में बेहद संजीदगी से यह संस्मरण साझा किया है।। इस संस्मरण  को हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने के लिए श्री विवेक जी  का हार्दिक आभार। ) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 58 ☆   ☆ संस्मरण –  हमारे मित्र डॉ लालित्य ललित जी ☆ खाने के शौकीन, घुमक्कड़, मन से कवि,  कलम से...
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हिन्दी साहित्य ☆ होली पर्व विशेष – अपने बाल साहित्यकारों की यादगार होली – भाग 2☆ प्रस्तुति – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। आज प्रस्तुत है  उनके । द्वारा संकलित  बाल साहित्यकारों की यादगार  होली के संस्मरण ।  ये संस्मरण हम दो भागों में प्रकाशित कर रहे हैं।  यह इस कड़ी का अंतिम भाग है।  हम सभी बाल साहित्यकारों का ह्रदय से अभिनंदन करते हैं । ) श्री ओमप्रकाश जी के ही शब्दों में – “होली वही है. होली का भाईचारा वही है. होली खेलने के तरीके बदल गए है. पहले दुश्मन को गले लगाते थे. उसे दोस्त बनाते थे. उस के लिए एक नया अंदाज था. आज वह अंदाज बदल गया है. होली दुश्मनी  निकालने का तरीका रह गई है. क्या आप जानना चाहते हैं कि आप के पसंदीदा रचनाकार बचपन में कैसे होली खेलते थे? आइए उन्हीं से उन्हीं की लेखनी से पढ़ते हैं, वै कैसे होली खेलते थे.” प्रस्तुति- ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆ अपने बाल साहित्यकारों की यादगार होली – भाग 2 ☆ गौरव वाजपेयी "स्वप्निल”...
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हिन्दी साहित्य ☆ होली पर्व विशेष – अपने बाल साहित्यकारों की यादगार होली – भाग 1☆ प्रस्तुति – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। आज प्रस्तुत है  उनके । द्वारा संकलित  बाल साहित्यकारों की यादगार  होली के संस्मरण ।  ये संस्मरण हम दो भागों में प्रकाशित कर रहे हैं।  हम सभी बाल साहित्यकारों का ह्रदय से अभिनंदन करते हैं । ) श्री ओमप्रकाश जी के ही शब्दों में - "होली वही है. होली का भाईचारा वही है. होली खेलने के तरीके बदल गए है. पहले दुश्मन को गले लगाते थे. उसे दोस्त बनाते थे. उस के लिए एक नया अंदाज था. आज वह अंदाज बदल गया है. होली दुश्मनी  निकालने का तरीका रह गई है. क्या आप जानना चाहते हैं कि आप के पसंदीदा रचनाकार बचपन में कैसे होली खेलते थे? आइए उन्हीं से उन्हीं की लेखनी से पढ़ते हैं, वै कैसे होली खेलते थे." प्रस्तुति- ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆ अपने बाल साहित्यकारों की यादगार होली - भाग 1☆ सुश्री अंजली खेर अंजली खेर लेखिका हैं.  वे बताती है....
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हिन्दी साहित्य ☆ संस्मरण ☆ पुण्य स्मरण – स्व. प्रो नामवरसिंह – आलोचना के दिनमान से अनौपचारिक संवाद ☆ डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’  (डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ पूर्व प्रोफेसर (हिन्दी) क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय, चीन ।  वर्तमान में संरक्षक ‘दजेयोर्ग अंतर्राष्ट्रीय भाषा सं स्थान’, सूरत. अपने मस्तमौला  स्वभाव एवं बेबाक अभिव्यक्ति के लिए  प्रसिद्ध।  मैं डॉ गंगाप्रसाद शर्मा  'गुणशेखर' जी का हृदय से आभारी हूँ जो उन्होंने मेरे आग्रह पर एक संस्मरण  ही नहीं  अपितु एक साहित्यिक एवं ऐतिहासिक दस्तावेज  ई- अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों को साझा करने का अवसर दिया है।  इस सन्दर्भ में अनायास ही  स्मृति पटल पर अंकित  ई-अभिव्यक्ति पर  दिए गए  प्रख्यात साहित्यकार नामवर सिंह जी नहीं रहे शीर्षक से उनके निधन के दुखद समाचार की याद दिला दी। प्रस्तुत है डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ' गुणशेखर ' जी  का एक पुण्य संस्मरण - आलोचना के दिनमान से अनौपचारिक संवाद । )  ☆पुण्य स्मरण - स्व. प्रो नामवरसिंह - आलोचना के दिनमान से अनौपचारिक संवाद ☆ स्व. प्रो नामवरसिंह जन्म: 28 जुलाई 1926 (बनारस के जीयनपुर गाँव में)  निधन: 19 फरवरी 2019 (नई दिल्ली) "न तन होगा न मन होगा ।...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समय कैसे पंख लगाकर उड़ जाता है! ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  ☆ संजय दृष्टि  – समय कैसे पंख लगाकर उड़ जाता है! ☆ (जिस मंच पर बतौर प्रतियोगी पारितोषिक पाया हो उसी मंच पर 24 वर्ष पश्चात उसी प्रतियोगिता के उद्घाटन का सौभाग्य और उन क्षणों को जीने के लिए श्री संजय भारद्वाज जी का हार्दिक अभिनन्दन। सादर प्रस्तुत है उनकी मनोभावनाएं ई-अभिव्यक्ति के पाठकों के लिए।) सन 1996..., महाराष्ट्र राज्य हिंदी नाट्य प्रतियोगिता में...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – संस्मरण : अनन्य मुम्बई ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  ☆ संजय दृष्टि  – संस्मरण : अनन्य मुम्बई ☆ 90 के दशक की बात है। 85-86 में ग्रेजुएशन समाप्त कर आगे के जीवन का रोडमैप मस्तिष्क में तय कर चुका था। उच्चशिक्षा, लेक्चररशीप, शाम को थियेटर, लेखन और समाजसेवा। मुंबई शिफ्ट होना था और फिल्मों के लिए लिखना-अभिनय करना था। यूनिवर्सिटी के स्तर पर सर्वश्रेष्ठ लेखक, निर्देशक, अभिनेता और अन्य ललित कलाओं के...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – एक संस्मरण ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  ☆ संजय दृष्टि  – एक संस्मरण  ☆ रात के 2:37 का समय है। अलीगढ़ महोत्सव में कविता पाठ के सिलसिले में हाथरस सिटी स्टेशन पर कवि मित्र डॉ. राज बुंदेली के साथ उतरा हूँ। प्लेटफॉर्म लगभग सुनसान। टिकटघर के पास लगी बेंचों पर लगभग शनैः-शनैः 8-10 लोग एकत्रित हो गए हैं। आगे की कोई ट्रेन पकड़नी है उन्हें। बाहर के वीराने में एक चक्कर...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – संस्मरण ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। )    ☆ संजय दृष्टि  –  संस्मरण ☆ मेरे लिए प्रातःभ्रमण निरीक्षण, अपने आप से संवाद करने एवं आकलन का सर्वश्रेष्ठ समय होता है। रोजाना की कुछ किलोमीटर की ये पदयात्रा अनुभव तो समृद्ध करती ही है, मुझे शारीरिक से अधिक मानसिक स्वास्थ्य प्रदान करती है। आज टहलते हुए हिंदी माध्यम के एक विद्यालय के सामने से निकला। अंग्रेजी स्कूलों में वैन, स्कूल बस और ऑटोरिक्शा से उतरनेवाने स्टुडेंट्स की बनिस्बत घर से पैदल आनेवाले विद्यार्थियों की भीड़ फुटपाथ पर थी। आपस में बातचीत करती 10-12 वर्ष की दो बच्चियाँ स्कूल...
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