डॉ प्रतिभा मुदलियार
☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – कोरिया की संस्कृतिक लय और मेरी शाम ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆
शाम —केवल दिन का अंत नहीं, बल्कि जीवन की लय का विस्तार होती है। दक्षिण कोरिया में रहते मैं लगभग हर रोज़ शाम के समय हुडी पहनकर या विंटर कोट पहनकर लंबे वॉक के लिए चली जाती थी। कान में हेड फोन लगाकर हिंदी गाने सुनते जाना अच्छा लगता था। कभी किसी लंबी सडक पर तो कभी पास ही के एक विश्वविद्यालय के परिसर में या फिर मार्केट में पैदल चली जाती। या कभी किसी छुट्टी के दिन मेट्रो से हान नदी के पुल पर चली जाती या इथेवॉन के इंडियन शॉप चली जाती। भले ही मेट्रो से चले जाए पर पैदल चलना होता ही था जिससे आसपास के मौहोल का आनंद भी लिया जा सकता था। यहाँ की शामें मुझे धीरे-धीरे खुलती हुई, लय में डूबती हुई, और भीतर कहीं गहराई तक उतरती हुई। यह संस्मरण उन्हीं शामों का है —जो नोरेंबैंग के शोर, हान नदी की शांति, सोजू के स्वाद, और साइकिल पर पैडल करते युवा बच्चे की गति में बसी हैं।
शाम होते ही सियोल की सड़कें जैसे फिर से जीवंत हो उठती हैं। कार्यालयों से लौटते लोग थके हुए नहीं लगते—बल्कि “पल्ली-पल्ली” (जल्दी-जल्दी) संस्कृति में दिनभर की तेज़ी के बाद भी उनके चेहरों पर एक सहज शांति रहती है। मेट्रो, बसें, दफ़्तर, कैफ़े—हर जगह एक तेज़, पर सुंदर लय बहती रहती है। काम से लौटते लोग थके नहीं लगते, बल्कि जैसे दिन का बोझ पीछे छोड़ते हुए किसी नई ताजगी की ओर बढ़ रहे हों। हान नदी के किनारे टहलने वालों की भीड़ होती है। मेट्रो में लोग चुपचाप बैठे रहते—किताब पढ़ते हुए, संगीत सुनते हुए, या सिर्फ खिड़की से शाम को बहते शहर को निहारते हुए।
कोरिया की एक चीज़ जिसने मुझे हमेशा प्रभावित किया, वह है सम्मान की संस्कृति—विशेषकर बुज़ुर्गों के लिए। उनके लिए मेट्रो में सीट तुरंत छोड़ देना, बातचीत में हल्का झुकना, यह सब उनके सामाजिक व्यवहार की नींव है। कई बार ऐसा होता कि मैं मेट्रो में खड़ी होती और कोई बुज़ुर्ग मुझे देखकर मुस्कुरा देता… उस मुस्कान में ऐसा स्नेह और अपनापन होता कि अपने आप विदेशी होने का अजनीबीपन गायब हो जाता। यह सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, सांस्कृतिक संवेदना है—और कोरिया के जीवन में यह संवेदना हर कदम पर दिखाई देती है।
कभी कभी लगता कि सियोल साइकिलों की गति से साँस लेने वाला शहर है। पुलों के नीचे, नदी किनारे बने खास ट्रैक्स पर परिवार, युवा, विद्यार्थी—सब साइकिल चलाते मिल जाते हैं। यहाँ साइकिल चलाना जीवन के संतुलन का अभ्यास ही लगता है। कोरियाई लोग कहते हैं— शरीर को गतिमान रखो, मन स्थिर रहेगा। यह दर्शन शाम की हवा में साफ़ महसूस होता है। और हाँ.. साईकिले यहाँ मुख्य सड़क पर नहीं चलाई जाती बल्कि यह मुख्य सडक के किनारे बने फुटपाथ पर ही चलायी जाती है… या फिर बगीचों में साईकिल चलाने के लिए ट्रैक्स हैं। यहाँ रोड के रुल्स बहुत सख्त हैं.. जिनका सारे लोग अनुसरण करते हैं। कहीं भी धक्का मुक्की नहीं।
सियोल के विश्वविद्यालय केवल सीखने की जगह नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक केंद्र हैं। शाम को जैसे ही सूरज ढलता है, कैंपस एक अलग ही दुनिया बन जाता है—कहीं युवा समूह संगीत का अभ्यास करते, कहीं कोई नृत्य का रियाज़ कर रहा है, कहीं छात्र फोटोशूट में व्यस्त। जब मैं विश्वविद्यालय के परिसर में टहलती, तो मुझे लगता मानो भविष्य की धड़कन मेरे आसपास स्पंदित हो रही है। उनकी ऊर्जा, उनकी हँसी, उनकी जिज्ञासा—कैंपस को एक उष्मा देती, और मेरे भीतर भी एक नई लहर जगाती।
कोरिया में कैफ़े केवल कॉफी पीने की जगह नहीं वे पढ़ने, काम करने, बातचीत करने और स्वयं से मिलने की एक जगह हैं। कई कैफ़े 24 घंटे खुले रहते हैं—मद्धम रोशनी, धीमा संगीत, लैपटॉप पर काम करते युवा… शहर की यह शांत रचनात्मकता दिल को छू जाती है।
इनका वर्क कल्चर प्रशंसनीय है। अतः दिनभर यहाँ लोग काम में डूबे रहते हैं, पर शाम होते ही वे अपनी आत्मा को खुली हवा में सांस लेने देते हैं। हर कदम के साथ जैसे वे अपने भीतर से तनाव की एक एक परत उतार देते हैं। कभी-कभी बुज़ुर्ग जोड़े मिलते हैं जो एक दूसरे का हाथ थामे चुपचाप चलते हैं। उनके चेहरे पर न कोई जल्दी, न कोई चिंता — बस एक स्थिर मुस्कान, जैसे जीवन का अर्थ उन्होंने पा लिया हो।
शहर का दूसरा चेहरा रात में खुलता है। जहाँ दिन में अनुशासन और जिम्मेदारियाँ हैं, वहीं रात में जीवन की सहजता। छोटे-छोटे कमरों में जगमगाती रोशनी — यही हैं ‘नोरेंबैंग” कराओके रूम। एक बार मेरे सहकर्मी मुझे वहाँ ले गए। हम एक दो लोग नहीं थे बल्कि हम भारतीय प्रोफेसर कुछ कोरियाई प्रोफेसर और कुछ छात्रों के साथ गए थे। अच्छा खासा जमघट था। जब हम अंदर गए तो हमारे एक कुलिग ने कहा… “आप गाइए”.. मैंने कहा, “मैं तो अच्छा नहीं गा सकती। ” वे हँस पड़े — “यहाँ गाना अच्छा नहीं, दिल से गाना ज़रूरी है। ” कुछ देर बाद जब सब मिलकर कोरियाई और अंग्रेज़ी गीतों पर झूमने लगे, तो हम भी उनमें शामिल हो गए। संगीत ने भाषाओं की सीमाएँ मिटा दीं। हर व्यक्ति, चाहे उसका पेशा कुछ भी हो, उस क्षण केवल एक गायक होता है — आज़ाद, निश्चिंत, और जीवन से भरपूर। नोरोबैंग दक्षिण कोरिया की लोकप्रिय संस्कृति का एक हिस्सा है। यह एक छोटा, सुकूनभरा और साउंडप्रूफ कमरा होता है जहाँ लोग अपने दोस्तों, परिवार या सहकर्मियों के साथ बैठकर मनचाहे गीत गा सकते हैं। इसके अंदर आमतौर पर एक आरामदायक सोफ़ा, गानों की बड़ी सूची वाला डिजिटल सिस्टम, माइक्रोफ़ोन, स्पीकर और एक बड़ी स्क्रीन होती है जिस पर गानों के बोल चलते रहते हैं। कमरे में हल्की–फुल्की LED रोशनी, रंगीन माहौल और कभी-कभी डिस्को लाइटें भी होती हैं, जिससे एक छोटा-सा निजी संगीत–मंच जैसा अनुभव मिलता है। यहाँ हाथ में ज्यूस, सोजू लेकर ये लोग तनाव मुक्त होकर हँसते गाते झूमते हैं। नोरोबैंग सिर्फ गाने की जगह नहीं है—यह तनाव मुक्त होने, मज़े करने, और साथ में यादें बनाने का एक बहुत खास कोरियाई तरीका माना जाता है। यहाँ संगीत की बीट पर स्टेप्स् करने के विडियों भी होते और सभी उसके अनुसार गाते और नाचते है। खुश होकर अपनी शाम बिताते हैं।
नोरेंबैंग से निकलते ही लगभग हर वीक एंड या किसी खास अवसर पर इन युवाओं की शाम ‘हॉपिंग ड्रिंक’ में बदल जाती है। सड़क के किनारे छोटे-छोटे ‘पोजांगमाचा” (खाने पीने की टपरीनुमा ठेले) रोशनी से जगमगाते हैं। लोग एक जगह नहीं रुकते —एक बार से दूसरे बार, फिर तीसरे, हर जगह थोड़ा खाना, थोड़ा सोजू, और बहुत सारी बातें और हँसी के फव्वारें। सोजू एक प्रकार की शराब है जो कोरिया के सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा है। “गनबे!” कहकर जब गिलास टकराए जाते हैं, तो यह केवल औपचारिक ‘चीयर्स’ नहीं, बल्कि दोस्ती का स्वीकार होता
कई बार ये लोग कभी परिवार के साथ या मित्रों के साथ हान नदी के किनारे जाकर बैठ जाते है साथ में होता है पीज़्ज़ा, बर्गर, और क्रीस्पी चिकन के साथ सोजू या ज्यूस की बोतलें। ये लोग बहुत कम पानी पीते हैं.. अक्सर कोई ज्यूस या आईस कॉफी इनका फेवरिट पेय होता है। पुलों की झिलमिलाती रोशनियों में नदी की लहरें चमकती हैं। ये लोग बातें करते, हँसते, और कभी-कभी बस चुप रहते हैं। उनकी चुप्पी में भी एक मुखरता दिखाई देती है। दोस्ती का सबसे गहरा क्षण वह होता है जब शब्दों की ज़रूरत नहीं होती।
चेरी ब्लॉसम की गुलाबी शामें, शरद की सुनहरी हवा, सर्दियों में सड़क किनारे भुने आलू की खुशबू हर मौसम सियोल को नया व्यक्तित्व दे देता है। यह शहर हर ऋतु में जैसे एक नया गीत गाता है।
एक रविवार को हमारी साथी प्रोफेसर ने मुझे कहा कि, “आज आप हमारे साथ चलिए, कोरिया का एक और अनुभव कराते हैं आपको। ” और वे वह मुझे एक ‘जिमजिलबांग’ ले गई — एक विशाल सार्वजनिक स्नानगृह। अंदर दृश्य ही अलग था — भाप के कमरे, गर्म और ठंडे जल के स्नान-टब, और लोग — परिवार, मित्र, बच्चे — सब साथ में..हाँ पुरूषों और महिलाओं के अलग अलग कक्ष थे…यहाँ कहीं कोई मसाज ले रहा है, कहीं कोई टीवी देखता हुआ अंडे खा रहा है। शुरुआत में मैं हैरान ही रह गई, वहाँ के उस खुलेपन में मैं सहज ही नहीं हो पायी। यह केवल स्नान नहीं था, यह सामूहिक विश्रांति गृह था। लोग अपने शरीर के साथ-साथ अपने मन को भी धो रहे थे — थकान, तनाव और औपचारिकता से मुक्त होकर। कोरिया की संस्कृति में यह “सामूहिक स्नान” व्यक्तिगत स्वच्छता से आगे जाकर सामाजिक जुड़ाव का माध्यम बन गया है। वहाँ एक साथ नहाते हुए लोग जैसे एक दूसरे के बोझ को भी हल्का करते हैं। किंतु मैं वहाँ कुछ मिनट भी रुक नहीं सकी.. लौट आयी थी और बाद में मुझे मेरे सहकर्मियों ने इसके बारे में बताया था।
आधुनिक सियोल के बीच भी कोरिया की पारंपरिक कला जीवित है। एक शाम हमने ‘पानसोरी’ सुना … एक गायक, एक ढोल के साथ अपनी भावनाओं के महासागर को राह दे रहा था। प्रेम, पीड़ा, संघर्ष सब उसकी आवाज़ में समाया था। यह केवल संगीत नहीं, कथा का अभिनय था। फिर ‘तालचुम’ — मुखौटा नृत्य। ये कलाकार समाज की बुराइयों पर व्यंग्य करते हैं, राजा, पुजारी, व्यापारी — सब हँसी के पात्र बन जाते हैं। दर्शक हँसते हैं, पर भीतर कुछ सोचते भी हैं। उतनी साहित्यिक कोरियाई भाषा मैं समझी नहीं पर उनके हावभाव से कुछ को पल्ले पड़ा ही था। यह हमारे प्रहसन जैसा ही लगा।
जब रात गहराती है, तो सियोल का दूसरा जीवन शुरू होता है। सड़क किनारे भुने आलू और उबले मक्के की खुशबू, कॉफ़ी कैफ़े में किताबों के बीच बैठे युवा, और पार्कों में गिटार बजाते प्रेमी। शहर जैसे खुद से संवाद कर रहा हो।
कोरिया की यह सामूहिकता अनोखी है —लोग साथ रहते हैं, पर एक-दूसरे को अपना अकेलापन भी जीने देते हैं। यहाँ ‘साथ होना’ और ‘स्वतंत्र रहना’ विरोध नहीं, संतुलन है। शायद यही संतुलन उन्हें इतनी शांति और जीवंतता देता है।
अब जब मुझे कोरिया से लौटकर भी एक अरसा बीत गया है फिर भी कभी-कभी आँखें बंद करते ही हान नदी की हवा मेरे चेहरे को छू जाती है। नोरेंबैंग की हँसी, जिमजिलबांग की गर्म भाप — सब एक स्मृति बनकर भीतर उतर गए हैं।
देश हो या विदेश जीवन चाहे कितना भी व्यस्त क्यों न हो, हर दिन कुछ पल ऐसे होने चाहिए जहाँ हम अपने भीतर लौट सकें। वॉक, साइकिल, मेट्रो का अकेला सफर, गीत, या नदी किनारे की चुप्पी — ये सब उसी आत्म-यात्रा के पड़ाव हैं। और शायद यही कारण है कि कोरिया की शामें अब मेरे लिए किसी देश की नहीं रहीं — वे मेरे भीतर बस गई हैं, एक स्थायी रोशनी बनकर। यह संस्मरण केवल कोरिया की संस्कृति का चित्र नहीं, बल्कि उस आत्मीय अनुभव का है जिसमें व्यक्ति अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर किसी और जीवन की लय में खुद को खोजता है।
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© डॉ प्रतिभा मुदलियार
पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006
306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक
मोबाईल- 09844119370, ईमेल: mudliar_pratibha@yahoo.co.in
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈















