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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संस्मरण # 97 ☆ स्वच्छता मिशन ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय (श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता  ‘नकली इंजेक्शन’)   ☆ संस्मरण # 97 ☆ स्वच्छता मिशन ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय☆ ये बात ग्यारह साल पहले की है, जब स्वच्छता मिशन चालू भी नहीं हुआ था........ । समाज के कमजोर एवं गरीब वर्ग के सामाजिक और आर्थिक उत्थान में स्टेट बैंक की अहम् भूमिका रही है। ग्यारह साल पहले हम देश की पहली माइक्रो फाइनेंस ब्रांच लोकल हेड आफिस, भोपाल में प्रबंधक के रुप में पदस्थ थे। ग्वालियर क्षेत्र में माइक्रो फाइनेंस की संभावनाओं और फाइनेंस से हुए फायदों की पड़ताल हेतु ग्वालियर श्रेत्र जाना...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संस्मरण#94 ☆ कला-संस्कृति के लिए जागा जुनून ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय (श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।) ☆ "कला-संस्कृति के लिए जागा जुनून" ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆ (ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए हम श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी के विशेष स्वर्णिम अनुभवों को साझा करने जा रहे हैं जो उन्होने एसबीआई ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (आरसेटी) उमरिया के कार्यकाल में प्राप्त किए थे। आपने आरसेटी में तीन वर्ष डायरेक्टर के रूप में कार्य किया। आपके कार्यकाल के दौरान उमरिया जिले के दूरदराज के जंगलों के बीच से आये गरीबी रेखा परिवार के करीब तीन हजार युवक/युवतियों का साफ्ट स्किल डेवलपमेंट और हार्ड स्किल डेवलपमेंट किया गया और...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 104 ☆ संस्मरण – एक जनम की बात सात जनम का साथ – श्रीमती दयावती श्रीवास्तव ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। साथ ही मिला है अपनी माताजी से संवेदनशील हृदय। इस संस्मरण स्वरुप आलेख के एक एक शब्द - वाक्य उनकी पीढ़ी के संस्कार, संघर्ष और समर्पण की कहानी है । गुरु माँ जी ने निश्चित ही इस आत्मकथ्य को लिखने के पूर्व कितना विचार किया होगा और खट्टे मीठे अनुभवों को नम नेत्रों से लिपिबद्ध किया होगा। यह हमारी ही नहीं आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उनकी पीढ़ी के विरासत स्वरुप दस्तावेज हैं।  ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 104 ☆ संस्मरण - एक जनम की बात सात जनम का साथ - श्रीमती दयावती श्रीवास्तव...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 85 – संस्मरण – बोलता बचपन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है  “संस्मरण - बोलता बचपन”।  हम एक ओर बेटियों को बोझ मानते हैं और दूसरी ओर नवरात्रि पर्व पर उन्हें कन्याभोज देकर  उनके देवी रूप से आशीर्वाद की अपेक्षा करते हैं।  यह दोहरी  मानसिकता नहीं तो क्या है ?  इस  संवेदनशील विषय पर आधारित विचारणीय संस्मरण एवं सार्थक रचना के लिए श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ जी की लेखनी को सादर नमन। )  ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 85 ☆ 💃🏻 संस्मरण - बोलता बचपन 💃🏻 'बेटा भाग्य से और बेटियां सौभाग्य से प्राप्त होती हैं।'  इसी विषय पर पर आज एक  संस्मरण - सिद्धेश्वरी सराफ 'शीलू'  ठंड का मौसम मैं और पतिदेव राजस्थान, कुम्बलगढ़ की यात्रा पर निकले थे। जबलपुर से कोटा और कोटा से ट्रेन बदलकर चित्तौड़गढ़ से कुम्बलगढ ट्रेन पकड़कर जाना था। क्योंकि ट्रेन चित्तौड़गढ़ से ही प्रारंभ होती थी। हम ट्रेन पर बैठ चुके...
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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ स्वदेश दीपक : कहानी से नाटक में आकर दृष्टिकोण व्यापक हुआ ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता ☆ संस्मरण ☆ स्वदेश दीपक : कहानी से नाटक में आकर दृष्टिकोण व्यापक हुआ ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆  (स्वदेश दीपक से मैंने अम्बाला छावनी उनके घर जाकर इंटरव्यू की थी दैनिक ट्रिब्यून के लिए। तब उपसंपादक की जिम्मेदारी थी। कभी सोचा नहीं था कि इंटरव्यूज पर आधारित कोई पुस्तक बन सकती है। पर एक फाइल सन् 2013 में हाथ लगी अपनी ही तो सारी इंटरव्यूज...
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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ रमेश बतरा : कभी अलविदा न कहना ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय  जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता (15 मार्च - स्व रमेश बतरा जी की पुण्यतिथि पर विशेष) ☆ संस्मरण ☆ रमेश बतरा : कभी अलविदा न कहना ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆  (प्रिय रमेश बतरा की पुण्यतिथि । बहुत याद आते हो मेशी। तुम्हारी मां कहती थीं कि यह मेशी और केशी की जोड़ी है । बिछुड़ गये ....लघुकथा में योगदान और संगठन की शक्ति तुम्हारे नाम । चंडीगढ़ की कितनी शामें तुम्हारे...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – संस्मरण – अनजाने में पढ़ा ‘उबूंटू’ का पाठ ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) ☆ संजय दृष्टि – संस्मरण - अनजाने में पढ़ा 'उबूंटू' का पाठ ☆ (किशोर अवस्था का एक संस्मरण आज साझा कर रहा हूँ।) पढ़ाई में अव्वल पर खेल में औसत था। छुटपन में हॉकी खूब खेली। आठवीं से बैडमिंटन का दीवाना हुआ। दीवाना ही नहीं हुआ बल्कि अच्छा खिलाड़ी भी बना। दीपिका पदुकोण के दीवानों (दीपिका के विवाह के बाद अब भूतपूर्व दीवानों) को...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 84 – इलाहींच्या आठवणी…. ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे (आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा सोनवणे जी  के उत्कृष्ट साहित्य को  साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।) (जन्म – 1 मार्च 1946 मृत्यु – 31 जनवरी 2021) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 84 ☆ ☆ इलाहींच्या आठवणी…. ☆ एकतीस जानेवारीला सुप्रसिद्ध गजलकार इलाही जमादार आपल्यातून निघून गेले. आणि मनात अनेक आठवणी जाग्या झाल्या...... तेवीस जानेवारीला मी त्यांना फोन केला होता तेव्हा त्यांच्या वहिनी ने फोन घेतला, मी म्हटलं, मी प्रभा सोनवणे, मला इलाहींशी बोलायचं आहे....त्यांनी इलाहींकडे फोन दिला, तेव्हा ते अडखळत म्हणाले, "आता निघायची वेळ झाली ......पुढे बोललेली दोन वाक्ये मला समजली नाहीत....मग त्यांच्या वहिनी ने फोन घेतला, त्या म्हणाल्या "आता त्यांना उठवून खुर्चीत बसवलं आहे, तब्बेत बरी आहे आता.".....त्या नंतर सात दिवसांनी ते गेले! मला इलाहींची पहिली भेट आठवते, १९९३ साली बालगंधर्व च्या कॅम्पस मधून चालले असताना अनिल तरळे या अभिनेत्याने माझी इलाहींशी ओळख करून दिली, मी इलाहीं च्या गजल वाचल्या होत्या, इलाही जमादार हे गजल क्षेत्रातील मोठं नाव होतं, मी त्यांच्यावरचा एक लेख ही त्या काळात वाचला होता, दारावरून माझ्या त्यांची वरात गेली मेंदीत...
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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ याद गली से, एक सत्यकथा- कैमला गांव — 62 साल पुराना ☆ श्री अजीत सिंह, पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन

श्री अजीत सिंह (हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक अविस्मरणीय संस्मरण  ‘याद गली से, एक सत्यकथा- कैमला गांव … 62 साल पुराना। हम आपसे आपके अनुभवी कलम से ऐसे ही आलेख समय समय पर साझा करते रहेंगे।) ☆ संस्मरण  ☆ याद गली से, एक सत्यकथा- कैमला गांव -- 62 साल पुराना ☆ कैमला, जो चंद रोज़ पहले तक एक अज्ञात सा गांव था, अब मीडिया की सुर्खियों में बना हुआ है। गत रविवार दस जनवरी को हरियाणा के मुख्य मंत्री मनोहरलाल खट्टर ने वहां एक जनसभा को संबोधित करना था पर ग्रामवासियों के एक वर्ग तथा आस पास के गांवों से आए किसान आंदोलनकारियों ने भारी पुलिस बंदोबस्त के बावजूद उस जगह घुस कर धरना दे दिया जहां जनसभा होनी थी। खट्टर का हेलीकॉप्टर वहां नहीं उतर सका और वे वापस जिला मुख्यालय करनाल...
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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ हिमाचल से मेरा प्रेम और कुछ यादें… ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय (जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता आदरणीय श्री कमलेश भारतीय जी से किसी भी रूप में जुड़ना एक रिश्ता बन जाने जैसा है। एक अनजान रिश्ता। मुझे यह सौभाग्य मिला डॉ मधुसूदन पाटिल सर के माध्यम से। उनके संस्मरण हमें स्मृतियों के उस संसार में ले जाते हैं जहाँ जाना अब संभव नहीं है। हम उस संस्मरण के एक तटस्थ पात्र बन जाते हैं। बिलकुल आर के लक्ष्मण के पात्र...
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