(ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व “सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद – स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे और उनका सृजन” के संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)
स्व. इन्द्र बहादुर खरे
☆ कहाँ गए वे लोग # ५२ ☆
☆ “सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद – स्व. इन्द्र बहादुर खरे और उनका सृजन” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
(73 वी पुण्य तिथि 13 अप्रैल पर शत शत नमन)
बड़ी भली है अम्मा मेरी
ताजा दूध पिलाती है।
मीठे मीठे फल लेकर
मुझको रोज खिलाती है।
अपने समय में स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल उपरोक्त मनमोहक काव्य पंक्तियों के रचयिता, सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं शिक्षाविदस्व श्री इन्द्र बहादुर खरे ने अपनी साहित्य साधना से राष्ट्रीय स्तर पर जबलपुर को गौरवान्वित किया था। खरे जीने अपने साहित्यिक जीवन में गद्य और पद्य में जो कुछ भी साहित्य सृजन किया उसने उनके समय में तो अपार लोकप्रियता अर्जित की ही बल्कि वह आज भी चर्चित, पठनीय और प्रभावी है।
हितकारणी कालेज के प्रारंभिक काल के प्रसिद्ध प्राध्यापक, जबलपुर के माडल हाई स्कूल के प्रतिष्ठित शिक्षक एवं विजन के फूल और भोर के गीत जैसी अनेक काव्य कृतियों के रचियता स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे ने अपने समय में अनेक साहित्यिक पुस्तकों के प्रतिष्ठित लेखकों के रुप में चर्चित रहे हैं लेकिन यह भी स्मरणीय है कि उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों के लिए अपने समय में ऐसी पाठ्य पुस्तकों की रचना की जो कि उनके समय में पाठ्यक्रम में न केवल शामिल की गई बल्कि उपयोगी और ज्ञानवर्धक भी सिद्ध हुईं। शिक्षा जगत के लिए काफी पहले भारत के गौरवशाली इतिहास से छात्रों को परिचित कराने के लिए भारत वैभव के नाम से 3 भागों में विभक्त पुस्तकें पाठ्यक्रम में शामिल की गई थीं जिसमें भारत वैभव के भाग 3 की रचना स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे नेकी थी।
सुभाष प्रिटिंग प्रेस से मुद्रित इस पुस्तक में 21 अध्याय शामिल किये गए थे जिसमें हमारा देश, भारतीय स्वतंत्रता, 1857 की जनक्रांति, गांधीजी और असहयोग आंदोलन, हमारी राजनीतिक प्रगति, बारडोली सत्याग्रह और सरकारी दमन, 1934 से 1941 और 1942 से 1947 तक का कालखंड, आजादी के बाद का घटना चक्र इत्यादि प्रमुख विषयों से संबंधित अधिकांश महत्वपूर्ण बातें समझाईं गयी थी।
आज अगर हम इस पुस्तक की विभिन्न बातों पर ध्यान दें तो हम आज भी ऐतिहासिक महत्व की दृष्टि से इस पुस्तक को शिक्षा जगत के लिए प्रासंगिक और उपयोगी पाते हैं। इस सबंध में स्व. श्री खरे जी के सुपुत्र आदरणीय श्री अमित रंजन जी ने भी पुस्तक में लिखा है कि आदरणीय पाठक स्वयं तय करें कि 150 में लिखी पुस्तक आज भी कहाँ तक उपयोगी है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि स्व श्री इन्द्र बहादुर खरे जी की अन्य पठनीय और लोकप्रिय कविताओं को पूर्व में स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था जिनमें बड़ी भली है अम्मा मेरी, ताजा दूध पिलाती है, शिक्षा जगत में काफी लोकप्रिय और प्रभावी मानी जाती थी।
भोपाल के संदर्भ प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक का पुनः प्रकाशन खरे परिवार के सहयोग से किया गया है। इस पुस्तक का आवरण पृष्ठ भारत के नक्शे में महात्मा गॉंधी के चित्र के साथ काफी आकर्षक लग रहा है। इस पुस्तक के प्रकाशन से आदरणीय स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे जी का प्रेरक और प्रणम्य व्यक्तित्व और भारत के ऐतिहासिक महत्व की बातें दोनों ही दिल और दिमाग में ताजी हो गईं।
साहित्यिक और शैक्षणिक क्षेत्र के ऐसे श्रद्धेय और प्रेरणा स्रोत पितृ पुरुष स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे जी की पुण्यतिथि पर सादर स्मरण के साथ शत शत प्रणाम।
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरण – “साइकिल वाले सर… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६१ ☆
संस्मरण – साइकिल वाले सर… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
बात 1994-95 की है। लवलेश सोलापुर में तैनात थे, दो चार महीने ही हुए थे। हिंदी कार्यशाला का आयोजन था। पैंसठ सत्तर वर्ष के एक वृद्ध करीब साढ़े छह फुट लंबे चोडा सीना, रंग गोरा ऑफिस में प्रविष्ट हुए। हिंदी कार्यशाला में व्याख्यान देने के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया था। वे डी.ए.वी. कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल थे और एन.सी.सी. के कमांडेंट। हालांकि अंग्रेजी के विद्वान थे पर हिंदी ऐसी बोलते थे कि सुनने वाले के दिल में उतर जाए। पंजाबी थे और उनके संभाषण में पंजाबी टोन और अधिक रस घोल देती।
उन्हें देखते ही मिलने की एक सहज उत्कंठा जागृत हो जाती। व्याख्यान समाप्त होने के बाद लवलेश उनके सामने हाजिर हुआ और जैसे दृष्टि मिली तो वह एक विद्यार्थी की तरह उनके चरणों में झुक गया। उन्होंने उसे बाँह पकड़ कर उठाया और खाली पड़ी कुर्सी पर बिठाया तथा स्वयं भी एक कुर्सी पर बैठ गए। लवलेश का परिचय पूछा, कहाँ के निवासी हो, रुचियाँ क्या क्या हैं, सोलापुर में कहाँ रहते हो। वे पूछते गए और वहउत्तर देता गया।
वे भसीन सर के नाम से विख्यात थे। पूरा नाम पुराने लोग ही जानते होंगे। साइकिल पर हमेशा चलते और साइकिल पर एक झोला टंगा रहता। साइकिल वाले सर। रविवार का दिन था। लवलेश परिवार के साथ नाश्ता करने वाला था । घर के नाम पर एक ही कमरा था और उससे अटैच टॉयलेट बाथरूम। बेटे ने बताया कोई वृद्ध अंकल हैं साइकिल लिए हुए। लवलेश बाहर निकला और उन्हें प्रणाम करके अंदर ले आया। चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। उनके सामने नाश्ते की प्लेट रखी, उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। बातचीत में बताया कि उनकी दो बेटियाँ हैं। एक बेटी मुंबई में डॉक्टर है दामाद भी डॉक्टर हैं। छोटी बेटी डॉक्टरी पढ़ रही थी कि अचानक बीमार पड़ी तो आज तक पड़ी है। उसके इलाज पर सब कुछ चला गया। पैंशन से जैसे तैसे खर्च चल जाता है। ट्यूशन भी कर लेता हूँ। फिर मुस्कुरा कर तनाव झटक दिया और बच्चों से उनकी पढ़ाई के बारे में पूछते रहे। चलते चलते बोले कि मैं यहाँ से गुजर रहा था तो सहज ही साइकिल आपकी ओर मुड़ गई। वैसे मैं किसी के घर बहुत कम जाता हूँ।
कई बार बाजार में मिले तो उसी साइकिल पर। बाजार में भी लोग उनकी बहुत इज्जत करते। वे सबसे उनके बच्चों की पढ़ाई लिखाई की बात करते और कोई कठिनाई होती तो उसे दूर करने के लिए साइकिल पर ही उस बच्चे के स्कूल या कॉलेज में पहुंच जाते। प्राचार्य से बात करके समस्या सुलझा देते। सभी प्राचार्य उनका बहुत सम्मान करते क्योंकि अधिकांश उनके विद्यार्थी रहे थे या एनसीसी कैडेट्स।
उनके बहुत सारे विद्यार्थी आईएएस करके उच्च पदों पर आसीन थे। लवलेश के एक मित्र ओबीसी कैडर के थे और उनके बेटे को इंजीनियरिंग में एडमिशन के लिए कास्ट वेलीडिटी सर्टिफिकेट चाहिए था। बहुत भागा दौड़ की पर सफलता नहीं मिली। वे दोनों घर पर हताश बैठे थे कि भसीन सर आ गए। हमारी चिंता सुनकर बोले कि मैं एक पत्र लिखता हूँ। आप उसे भेज दीजिए। उनकी हैंड राइटिंग इतनी सुंदर थी बिल्कुल मोती जैसी। टाइपिंग की जरूरत नहीं थी क्योंकि उनकी हैंड राइटिंग उनकी पहचान थी। उनके पत्र का यह असर हुआ कि बच्चे का प्रोवीजनल एडमिशन हो गया और कॉलेज को अनुदेश प्राप्त हुए कि इस प्रमाण पत्र के लिए योग्य विद्यार्थियों का एडमिशन रोका न जाए और उनसे लिखित ले लिया जाए कि भविष्य में वे प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर देंगे।
एक बार सुबह-सुबह आए। अब उनका लवलेश के घर पर आना आम बात हो गई थी। आकर कुर्सी पर बैठ गए। उनके चेहरे पर बहुत चिंता के भाव थे। लवलेश ने चाय का प्याला हाथ में दिया तो कांपते हाथों ले लिया, बोले कुछ नहीं। फिर लवलेश ने व्यग्रता से पूछा कि सर क्या बात है। उनकी आंखों में आँसू छलक आए। बोले, “घर की अंदरूनी बातें किसी से नहीं कहता, आपसे भी नहीं कहूंगा। किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया, न उधार मांगा। ट्यूशन करता रहा। पर आज ऐसी नौबत आ गई है कि उधार मांगना पड़ेगा। बिजली का बिल छह हजार का आ गया है। बिजली वाले कहते हैं कि पहले बिल भरिए, फिर देखेंगे। फिर लवलेश से सीधे बोले, “मुझे छह हजार उधार दे दीजिए, मैं वापस कर दूंगा। ” लवलेश ने कहा कि सर उधार तो नहीं दे पाऊंगा पर आपका बिल अवश्य भर दूंगा। उनके चेहरे पर संतोष के भाव देखकर लवलेश को बहुत खुशी हुई।
लवलेश को कुछ पुस्तकें व एक शब्दकोश चाहिए था। सोलापुर में कहीं मिल नहीं रहे थे। एक पुस्तक तो भसीन सर की ही लिखी हुई थी पर उनके पास उसकी प्रति नहीं थी। सारी पुस्तकें चाँद प्रकाशन की थी। मुंबई वीटी (अब सीएसएमटी) के सामने चाँद प्रकाशन का बोर्ड लगा देखता था। भसीन सर बोले, “जब भी मुंबई जाओ तो चाँद प्रकाशन में जाना और मेरा नाम लेकर बोलना कि ये पुस्तकें मैंने मंगाई हैं।” दो लाइन शायद लिख कर भी दी थीं। खैर लवलेश चाँद प्रकाशन में गया और उनका लिखा कागज देते हुए पुस्तकें बता दीं। वह व्यक्ति अंदर केबिन में गया और लौटकर आया तो लवलेश के हाथ में पुस्तकें थमा दीं। पैसे पूछने पर मना कर दिया कि आप ले जाकर उन्हें दे दीजिए। लवलेश आश्चर्य में था कि इतने बड़े प्रकाशक ने बिना मूल्य लिए कैसे दे दीं। बाद में पता चला कि चाँद वाले और भसीन सर पंजाब के प्रसिद्ध आनंद परिवार से ताल्लुक रखते थे। पर किसी को बताते नहीं थे।
ऐसे थे भसीन सर। लवलेश के मन मस्तिष्क पर आज भी छाए हुए हैं।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ संस्मरण – “बहुत कठिन है ज्ञानरंजन हो पाना”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
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प्रसिद्ध कथाकार व पहल पत्रिका के यशस्वी संपादक ज्ञानरंजन का जाना, हिंदी साहित्य के लिए बड़ी क्षति है। संयोग देखिये कि व्यावसायिक पत्रिकाओं को पहल ने कड़ी टक्कर दी और जनपक्षीय रचनाओं को प्रमुख तौर पर स्थान दिया। मात्र पैंतीस कहानियां लिखकर कथा का नया स्वरूप सामने ला दिया।
नैनीताल के जिस अशोका होटल नयी नवेली शादी पर भाग कर पहुंचे, वह होटल मालिक राजीव लोचन साह थे और नैनीताल में उनसे मिलने पर इंटरव्यू की उसी होटल में, तब यह बात सामने आई थी। अंतिम दिनों में एक इंटरव्यू में लेकर बहुत चर्चा में भी रहे।
बहुत कठिन है ज्ञानरंजन हो पाना और पहल जैसी आंदोलित करने वाली पत्रिका निकाल पाना। एक बार तो ज्ञानरंजन को पूरा पढ़ने की कोशिश की, इलाहाबाद के अमरूदों की मिठास जैसी, बहुत कुछ नयी दुनिया खोल तीस कहानियां पढ़कर बहुत कुछ सीखा। ज्ञानरंजन नहीं रहे पर कहानियों में, पहल के अंकों में मिलते रहेंगे।
ज्ञानरंजन को सुनने का मौका शिमला में मिला था जब उन्होंने दूर की बात कही कि जल्दी ही कलम का स्थान कम्प्यूटर का माउस लेने वाला है। यह थी दूरदर्शिता ज्ञानरंजन की। आज सबसे ज्यादा उनकी कहानी पिता के साथ साथ उनकी प्रेमकथा को याद करते नमन् करता हूं।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ संस्मरण – “भगवान् का कितना अंश बचा डाॅक्टर में?”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
हरियाणा के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने रोहतक पीजीआई के दीक्षांत समारोह में कहा कि- “डाॅक्टर को जनता भगवान् मानती है। ऐसे में डाॅक्टर को अपने पेशे को समाजसेवा का माध्यम बना लेना चाहिए। सेवाभाव से किये हर कार्य से परिवार में समृद्धि आती है।” इस तरह महामना राज्यपाल ने डाॅक्टर के रूप में उन्हें भगवान् के बहुत करीब माना। पर आजकल आप जो स्थिति बड़े या छोटे अस्पतालों में देखते हैं, क्या वह डाॅक्टर को इसी रूप में, इसी छवि में प्रस्तुत करती है? मुझे याद है वह सन् 1999 का तेइस सितम्बर, जब मेरी बेटी के जीवन में भयंकर तूफान आया था और मैं उसे एम्बुलेंस में पीजीआई रोहतक में लेकर पहुंचा था। बेटी का छह घंटे लम्बा ऑपरेशन चला और वह ज़िंदगी की लड़ाई जीत गयी। डाॅक्टर एन के शर्मा ने पूछा कि क्या आपको विश्वास था कि बेटी का ऑपरेशन सफल होगा ? मैंने जवाब दिया कि डाॅक्टर शर्मा आप भी नहीं जानते, जब आप मेरी बेटी का ऑपरेशन कर रहे थे तब आपके नहीं वे हाथ भगवान् के हाथ थे, उस समय आप भगवान् के बिल्कुल करीब थे, जिससे मेरी बेटी को भगवान् ज़िंदगी लौटा गये। डाॅक्टर शर्मा की आंखों में भी खुशी के आंसू थे और मेरी आँखों में भी ! इसमें उन दिनों मंत्री और मेरे मित्र प्रो सम्पत सि़ह का भी योगदान रहा, जो पता चलते ही दूसरे दिन वे पीजीआई, रोहतक के डायरेक्टर के पास पहुंचे और मुझे भी बुला लिया ! इस तरह हम तीन माह के बाद पीजीआई से मुक्त हुए लेकिन सचमुच भगवान् के दर्शन हो गये।
आजकल क्या ऐसे भगवान् बच रहे हैं? प्राइवेट अस्पताल अब पांच सितारा होटल जैसे हो गये हैं और इनका सारा खर्च मरीज के परिजनों से ही वसूला जाता है। बड़े बड़े अस्पतालों की खबरें आती हैं कि लाखों लाखों रुपये का बिल बना दिया और परिजन परेशान हो रहे हैं घर तक बिकने की नौबत आ जाती है, बैंक बेलेंस खाली हो जाते हैं। एक घटना और याद आ रही है! बेटी डेंगू से पीड़ित थी और डाॅक्टर अजय चौधरी ने उसका इलाज करना शुरू किया और बड़े विश्वास से कहा, कि मैं इसे ठीक कर दूंगा और उपचार शुरू किया। एक दिन बेटी के प्लेटलेट्स चढ़ाये जा रहे थे कि मुझे अज्ञात नम्बर से फोन आया और कहा गया कि आप फलाने अस्पताल पहु़ंच जाइये ! हम तोशाम के निकट खानक के मज़दूर हैं और हमारे एक साथी की मृत्यु इलाज के दौरान हो गयी है, डाॅक्टर हमें शव ले जाने नहीं दे रहे। मैं चलने लगा तो पत्नी ने रोकने की कोशिश की कि आपकी बेटी ज़िंदगी से लड़ रही है और आप दूसरों के लिए भाग रहे हो ? मैंने कहा कि क्या पता उनकी दुआ मेरी बेटी को लग जाये और मैंं उस अस्पताल गया, जहां वे लोग मेरी राह देख रहे थे, डाॅक्टर के चैम्बर में उनके साथ गया और विनती की कि आप इनके साथी का पार्थिव शरीर दे दीजिए लेकिन डाॅक्टर का कहना था कि ये हमारे पैसे नहीं दे रहे, इस पर मजदूरों ने बताया कि हमारी यूनियन ने चंदा इकट्ठा किया है और वही हमारे पास है, इससे ज्यादा की हमारी हिम्मत नहीं। डाॅक्टर ने कहा कि मैं तो अपनी फीस छोड़ दूंगा लेकिन मेरे सहयोगी डाॅक्टर नहीं मानेंगे। मैंने कहा कि फिर ठीक है, मेरे सहयोगी पत्रकार मेरी बात मान जायेंगे और अभी आकर लाइव चला देंगे, फिर आपका क्या होगा, यह विचार कर लीजिए ! बस, वे सयाने और अनुभवी थे, उन्होंने बिना एक रुपया लिए उन्हें उनके साथी का शव सौंप दिया लेकिन ऐसी नौबत अनेक अस्पतालों में आती है और आये दिन ऐसी शर्मसार करने वाली खबरें भी पढ़ने को मिलती हैं ! कृपया भगवान् का रूप बने रहिये !
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी की दूसरी पुण्यतिथि पर संस्मरण – मेरी स्मृतियों में- मेरे पिता।)
☆ संस्मरण – मेरी स्मृतियों में – मेरे पिता ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆
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द्वितीय पुण्यतिथि पर शत-शत नमन🙏🙏
पिता केवल एक संबंध नहीं होते, वे जीवन की वह दृढ़ पहचान होते हैं जिन पर व्यक्तित्व की पूरी इमारत खड़ी रहती है। मेरे पिता मेरी जान थे, मेरी पहचान थे और वो मेरे जीवन का अभिमान थे । उनका अस्तित्व मेरे लिए केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक विरासत के रूप में भी सदा जीवित रहेगा।
उनका व्यक्तित्व अत्यंत प्रखर था-बिना शोर किए, बिना स्वयं को सामने रखे। वे उस वटवृक्ष की भाँति थे जिसकी जड़ें गहराई में छिपी रहती हैं, पर छाया सबको मिलती है। जीवन की आँधियाँ, तपन और बारिश वे स्वयं झेलते रहे, किंतु संतान को उसका आभास तक नहीं होने दिया। अंतर्मन की पीड़ा, अनगिनत आहें और असह्य मौन—सब कुछ उन्होंने अपने भीतर समेट लिया। पिता का यही मौन उनका सबसे बड़ा त्याग था।
मेरे जीवन की शान, आत्मविश्वास और संस्कार पिता से ही बढ़े। वे हर समय तट पर खड़े उस प्रहरी की तरह थे, जो भले ही दिखाई न दे, पर उसकी उपस्थिति से ही यात्रा सुरक्षित हो जाती है। आज वे भौतिक रूप से पास नहीं हैं, किंतु उनकी स्मृति हर क्षण दिलासा देती है-
“बेटा, हम हमेशा तुम्हारे साथ हैं. हमने तुम्हारा हाथ पकड़ा है।”
मेरे पिता का साहित्य से गहरा नाता था। घर में साहित्यकारों का आना-जाना, विचारों की चर्चा, कविताओं में रस का बस जाना-यह सब मेरे संस्कार का हिस्सा बना। उन्होंने शब्दों के प्रति सम्मान सिखाया, विचारों को उड़ान दी और अभिव्यक्ति को पहचान। उनके सान्निध्य में कविता केवल रचना नहीं रही, वह जीवन का स्वभाव बन गई। जो पहचान मुझे साहित्य में मिली, वह माता- पिता के दिए संस्कारों की ही देन है।
पिता ने कभी उपदेश नहीं दिए, उन्होंने जीवन जिया-और वही जीवन मेरी सबसे बड़ी शिक्षा बना। उनका प्यार आशीर्वाद की तरह था, जो बिना कहे, बिना जताए हर क्षण साथ रहा। आज उनकी पुण्यतिथि पर मन पीड़ा से भरा है, पर साथ ही गर्व से भी-कि ऐसे पिता मिले, जो जीवन भर खजाने की तरह संजोए जाने योग्य रहा।
पिता नहीं हैं, पर उनका व्यक्तित्व, उनके संस्कार और उनकी स्मृतियाँ आलोक की तरह हमारे साथ सदा रहेगा यह शाश्वत है –
☆ संस्मरण ☆ गाँव से शहर तक☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
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तब मैं गाँव के स्कूल से पढ़कर नया-नया शहर कालेज की पढ़ाई करने पहुँचा था। चूंकि मुझे कविताएं लिखने का शौक था, इसलिए मैं शहर आने के बाद विभिन्न अवसरों पर कविताएँ लिखकर अखबारों -पत्रिकाओं में छपने भेजने लगा। ऐसे ही क्रिसमस पर मैंने ईसामसीह पर कविता लिखकर “करुणा के मसीहा- ईसामसीह” अखबारों को छपने भेज दी। जो ठीक क्रिसमस के दिन प्रकाशित हुई, तो मुझे बहुत अच्छा लगा।
शाम को मुझे उसी शहर के चर्च के फादर का अर्जेंट बुलावा आया। इस पर मैं चिंतित हुआ कि कहीं मुझसे कोई मिस्टेक तो नहीं हो गई। तो मैं डरता-झिझकता शाम को चर्च के फादर से मिलने पहुंचा। वहां मेरे पहुंचते ही फादर ने पूछा कि तुम मिस्टर खरे हो। मेरे हां करते ही वे बोले आपने ही ईसा मसीह जी पर कविता लिखी है। मेरे हां कहते ही वे बोले वेरी नाइस। आपने बहुत ही शानदार कविता लिखी है। आपको यहाँ अभी होने जा रहे कार्यक्रम में सम्मानित करने बुलाया गया है। आपको अपनी कविता स्टेज से सबके सामने पढ़ना है, और सम्मान भी लेना है।
स्टेज से मैंने कविता सबको तरन्नुम में सुनाई, सबसे खूब वाहवाही मिली, और बुके के साथ मोमेंटो भी मिला, जो ईसा की कांच के शो-केस में मढ़े ईसा मसीह की फायबर की मूर्ति थी।
यह सम्मान पाकर मैं हर्ष में भर गया। आज भी उस क्रिसमस की याद आने पर मैं झूम उठता हूं। इस तरह मेरा गाँव से शहर आना मेरे लिए बहुत बड़ा वरदान बन गया।
☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – दक्षिण कोरिया का युवा, शिक्षा और फैशन ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆
दक्षिण कोरिया के सियोल स्थित हांकुक विश्वविद्यालय, सियोल में मेरी अतिथि प्रोफेसर के रूप में डेप्युटेशन में नियुक्ति हुई थी वहाँ जाने से पहले मुझे सियोल से एक छात्र का फोन आया था। उसने मुझे कहा कि “मैं आपका सहायक बोल रहा हूँ… और आप अपने आने का सारा विवरण दें ताकि हम आपको लेने के लिए वहाँ आ जाए।” उसका नाम मुन इल दो था और भारतीय विभाग में हम सब उसे समीर नाम से संबोधित करते थे। उसका व्यवहार, उसकी विनम्रता, भारत और हिंदी के प्रति उसका प्रेम उल्लेखनीय था। प्रारंभ में हम सभी भारतीय प्रोफेसरों के लिए वही एक जरिया था जिसके सहारे हम कोरिया को जान रहे थे। मुन इल दो हम सबकी स्मृति का एक अटूट हिस्सा रहा है। दक्षिण कोरिया के युवाओं का प्रारंभ में वही प्रतिनिधि था..बाद में फिर कई युवा छात्रों से मिली… नाम याद नहीं रहें… पर उनकी बातचीत उनका व्यवहार…मेरी स्मृति का आज भी हिस्सा है।
शिक्षिका होने के कारण मैं हमेशा युवाओं के बीच रही। युवाओं के साथ युवा बनी और उनके माध्यम से अपने सपने, अपनी आकांक्षाओं को साकार होते देखा। किसी भी देश के युवा हों, उनके प्रति मेरे मन में हमेशा स्वीकार्यता और जिज्ञासा का भाव रहा है। उनका उत्साह, कुछ कर गुजरने की आकांक्षा मुझे आकर्षित करती रही है। यही भाव कोरिया में रहते हुए युवाओं को समझने में मेरे लिए सहायक बना। एक बात तो तय हैं कि युवा बच्चों को सीख अच्छी नहीं लगती, उपदेश अच्छे नहीं लगते..इससे बचकर अगर हम उनके साथ रहेंगे तो उनकी दुनिया को जान सकते, समझ सकते हैं। उनसे काफी कुछ सीख सकते हैं। विश्वविद्यालय के परिसर में ही युवाओं को पढ़ते, लिखते, खेलते, गाते, खाते, पीते देखा तो लगा कि यही तो है कोरिया का वर्तमान और भविष्य भी! चमकती आँखों में आत्मविश्वास, हाथों में स्मार्टफोन, कानों में हेडफोन, और कदमों में एक अद्भुत तेजी जैसे समय से आगे चलने की आकांक्षा उनके व्यक्तित्व का स्वभाव बन चुकी हो। दक्षिण कोरिया का युवा एक जीवंत संस्कृति, एक तकनीकी चेतना और एक अनुशासित जीवन-दृष्टि का प्रतीक है।
आज से लगभग पंद्रह साल पहले जब मैं कोरिया पहूँची थी तो यह देश उस समय भी अत्याधुनिक हा था। मैंने देखा था कि यहाँ लोग बहुमंज़िला अपार्टमेंट्स में रहते हैं, जहाँ स्मार्ट होम सिस्टम, हाई-स्पीड इंटरनेट, डिजिटल उपकरण और अत्याधुनिक सुविधाएँ उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैबलेट, स्मार्टवॉच और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उनके लिए केवल उपकरण नहीं, बल्कि जीवन की भाषा हैं। इसलिए इस देश का युवा ऑनलाइन पढ़ता है, काम करता है, संवाद करता है और मनोरंजन करता है। डिजिटल दुनिया उसके लिए वास्तविक दुनिया का विस्तार बन चुकी है। किन्तु इस तकनीकी आधुनिकता के बीच भी कोरियाई युवा अपने सांस्कृतिक मूल्यों से कट नहीं जाता। परिवार उसके जीवन का केंद्र बना रहता है। माता-पिता और बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान, सामूहिक हितों को प्राथमिकता देना उसकी सामाजिक चेतना का अभिन्न अंग है। कन्फ्यूशियस दर्शन से प्रभावित कोरियाई समाज में आज भी अनुशासन, शिष्टाचार और पारिवारिक मर्यादा को अत्यंत महत्त्व दिया जाता है। युवा पीढ़ी आधुनिक जीवन जीते हुए भी इन मूल्यों को अनदेखा नहीं करती, बल्कि उन्हें अपने जीवन में नए रूप में समाहित करती है। मैंने हमेशा देखा है ये बच्चे अपने प्रोफेसर के प्रति बहुत श्रद्धा रखते हैं। हमेशा झुककर अभिवादन करना, बोलना उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है।
मैंने इनमें अनुकरणीय ऐसा अनुशासन देखा है। उनका दिन एक सुव्यवस्थित कार्यक्रम के अनुसार चलता है। सुबह जल्दी उठना, विद्यालय या विश्वविद्यालय जाना, अतिरिक्त अध्ययन या प्रशिक्षण लेना, पार्ट-टाइम काम करना, कोई कोई तो रात में भी काम कर लेते हैं। मुझे एक छात्र याद आता है जो दिन में विश्वविद्यालय की कक्षाओं में उपस्थित रहता और शाम को एक कैफ़े में अंशकालिक कार्य करती था। एक दिन बातचीत में उसने बताया कि वह अपनी उच्च शिक्षा के लिए स्वयं आर्थिक रूप से तैयार होना चाहता है ताकि परिवार पर बोझ न पड़े। उसकी आँखों में थकान अवश्य दिखती थी, पर उससे कहीं अधिक दृढ़ता और आत्मनिर्भर बनने का संकल्प दिखाई देता था। उस क्षण मुझे लगा कि इन युवाओं के लिए करियर केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि आत्मसम्मान अर्जित करने की प्रक्रिया भी है। समय का सदुपयोग उनके लिए सफलता की शर्त है। वे जानते हैं कि प्रतिस्पर्धा के इस युग में समय ही सबसे बड़ा संसाधन है। आत्म-विकास की प्रवृत्ति कोरियाई युवाओं के जीवन का केंद्रीय तत्व है। वे केवल शैक्षणिक सफलता तक सीमित नहीं रहते, बल्कि व्यक्तित्व विकास, शारीरिक स्वास्थ्य, तकनीकी दक्षता और सामाजिक कौशल पर भी ध्यान देते हैं। जिम जाना, भाषा सीखना, ऑनलाइन कोर्स करना, करियर स्किल्स विकसित करना, ये सब उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। ऐसा लगता है मानो उनके लिए जीवन एक निरंतर परियोजना है, जिसे हर दिन बेहतर बनाना आवश्यक है।
इन सब अनुभवों के बीच मुझे बार-बार यह एहसास होता रहा कि कोरियाई युवाओं के जीवन का मूल आधार केवल शिक्षा या अनुशासन नहीं, बल्कि उनका विशिष्ट मूल्य-तंत्र है। दक्षिण कोरिया के युवाओं के मूल्य-बोध में सामूहिकता का विशेष स्थान है। वे स्वयं को समाज का अंग मानते हैं। परंतु आधुनिकता के प्रभाव से व्यक्तिवाद की प्रवृत्ति भी उभर रही है। युवा सफल होना चाहता है, पर समाज से कटना नहीं जहाँ कोरियाई युवा सामूहिक अनुशासन में सुरक्षा खोजता है, वहीं भारतीय युवा विविधता में स्वतंत्रता तलाशता है। मुझे लगा कि दोनों देशों के युवाओं के जीवन में एक ही द्वंद्व उपस्थित है, परंपरा और आधुनिकता का, किंतु उसकी अभिव्यक्ति भिन्न है।
कोरिया में रहते हुए एक बात मैंने यह महसूस की यहाँ शिक्षा को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। पढ़े लिखों का बहुत सम्मान और आदर भी होता है। यहाँ शिक्षा को भविष्य की कुंजी, सामाजिक उन्नति का साधन और जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व माना जाता है। संभवतः कन्फ्यूशियस परंपरा से प्रभावित समाज में ज्ञान को नैतिक श्रेष्ठता से जोड़ा जाता हो। शिक्षित व्यक्ति को केवल कुशल नहीं, बल्कि नैतिक रूप से श्रेष्ठ भी माना जाता है। एक बात और ध्यान के थी कि हमारे यहाँ विश्वविद्यालय में प्रवेश प्राप्त करने के लिए NEET JEE, CET आदि परिक्षाएं पास करनी होती हैं और बच्चे उसके लिए पहले से ही तैयारी करते रहते हैं, वैसे ही कोरिया में विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (CSAT) (सुंगुन) को जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा माना जाता है। अच्छे विश्वविद्यालय में प्रवेश पाना केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि पूरे परिवार की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। युवा जानते हैं रोजगार सम्मान और स्थिर जीवन प्रदान कर सकता है। इसी कारण वे अत्यधिक मानसिक दबाव, तनाव और थकान के बावजूद पढ़ाई से पीछे नहीं हटते। जहाँ तक मुझे याद है यह परीक्षा हर वर्ष नवंबर के महीने में होती है और इस दिन पुरे देश में छुट्टी रहती है। यह मात्र एक परीक्षा नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की सामूहिक चेतना का प्रतीक बन चुका है। यह आठ घंटे तक चलने वाली परीक्षा देश के लाखों युवाओं के भविष्य का निर्धारण करती है और इसलिए इस दिन दक्षिण कोरिया के लिए किसी राष्ट्रीय पर्व या ऐतिहासिक आयोजन से कम नहीं होता। इस दिन पूरा देश मानो एक ही लक्ष्य के लिए धड़कता है कि परीक्षा शांत, व्यवस्थित और बिना किसी बाधा के संपन्न हो। शिक्षक, अभिभावक और वरिष्ठ छात्र परीक्षा देने जा रहे विद्यार्थियों को प्रेरणा देते हैं, शुभकामनाएँ देते हैं और उन्हें मानसिक रूप से तैयार करते हैं। राजनीतिक नेता, प्रसिद्ध कलाकार और विद्वान लोग मीडिया के माध्यम से छात्रों के लिए संदेश जारी करते हैं, मानो राष्ट्र स्वयं अपने युवाओं के साथ खड़ा हो। परीक्षा के दिन सामाजिक जीवन की गति धीमी पड़ जाती है। कई बैंक और दुकानें देर से खुलती हैं या बंद रखी जाती हैं। पुलिस प्रशासन विशेष रूप से सक्रिय रहता है, यातायात नियंत्रण किया जाता है, सड़कों को सुगम बनाया जाता है, और देर से पहुँचने वाले छात्रों को पुलिस वाहन उपलब्ध कराए जाते हैं, ताकि उनका भविष्य किसी छोटे व्यवधान से प्रभावित न हो। परीक्षा के श्रवण (Listening) खंड के दौरान शांति बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। छात्रों की एकाग्रता में कोई व्यवधान न पड़े, इसके लिए हवाई यातायात तक को नियंत्रित कर दिया जाता है। सुना था कि देश भर में उड़ानों को भी उस दिन स्थगित कर दिया जाता है, ताकि आकाश की गड़गड़ाहट भी परीक्षा कक्षों तक न पहुँचे।
मैंने यह सब देखा तो लगा कि यह परीक्षा केवल शैक्षणिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामूहिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय संकल्प का उत्सव है। कोरियाई समाज शिक्षा को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार मानता है। जहाँ एक ओर यह परीक्षा युवाओं के लिए अत्यंत कठोर और तनावपूर्ण अनुभव है, वहीं दूसरी ओर यह समाज के उस अद्वितीय अनुशासन और एकजुटता का प्रतीक भी है, जो आधुनिक कोरिया की पहचान बन चुका है। यह तो तय बात है कि परीक्षा केवल ज्ञान का मूल्यांकन नहीं होती, बल्कि किसी समाज की मानसिकता, मूल्य-व्यवस्था और भविष्य-दृष्टि का प्रतिबिंब होती है। दक्षिण कोरिया की (CSAT, सुंगुन) परीक्षा और भारत की प्रतियोगी परीक्षाएँ दोनों ही अपने-अपने देशों में युवाओं के जीवन को दिशा देने वाली निर्णायक घटनाएँ हैं, किंतु इनके स्वरूप, सामाजिक प्रभाव और सांस्कृतिक अर्थ में गहरा अंतर दिखाई देता है
हालाँकि इस शिक्षा-प्रणाली के भीतर कई अंतर्विरोध भी छिपे हैं। अत्यधिक प्रतिस्पर्धा युवाओं को मानसिक रूप से थका देती है। कई युवा अपनी रुचियों और रचनात्मक क्षमताओं को दबाकर केवल परीक्षा-केंद्रित जीवन जीने को मजबूर होते हैं। उनके सामने विकल्प सीमित होते हैं या तो सफल होना, या पीछे रह जाना। इस स्थिति में शिक्षा स्वतंत्रता का माध्यम कम और सामाजिक दबाव का साधन अधिक प्रतीत होती है। फिर भी, कोरियाई युवा शिक्षा को केवल बोझ नहीं मानते। उनके लिए यह आत्म-विकास का मार्ग भी है। मैंने एक बार क्लाय में पूछा था कि आप आगे क्या करेंगे.. तो छात्र मुझसे बोला कि वह भले ही हिंदी और अंग्रजी की पढ़ाई कर रहा है, पर उसका मन संगीत में अधिक रमता है। उसने मुस्कराकर कहा—“मैम, करियर दिमाग चुनता है और शौक दिल।” तो एक ने कहा मैं तो लॉजिस्टिक का काम करूँगा…वहाँ पैसा अधिक है..। उनकी यह बातें मेरे मन में लंबे समय तक गूँजती रहीं थी। यह युवा केवल सामाजिक अपेक्षाओं से ही नहीं, बल्कि अपने भीतर चल रहे द्वंद्व से भी जूझता है, और इसी संघर्ष में उसकी परिपक्वता आकार लेती है। वे अध्ययन के माध्यम से वे स्वयं को बेहतर, सक्षम और आत्मविश्वासी बनते हुए देखते हैं। शिक्षा उन्हें यह विश्वास देती है कि वे अपने भविष्य को स्वयं गढ़ सकते हैं।
मेरी कक्षा में कुछ छात्र ऐसे थे जो एकदम से हट्टे कट्टे, कदकाठी में लंबे… छात्रों से अधिक पुरूष ही लगते। उनको देखकर तो मैं पहली बार झिझक ही गयी थी…उनके सामने तो मैं यूँ पिद्दी सी लगती। पर उनका मेरे प्रति अच्छा व्यवहार था। समय रहते जब मैं सहज हो गयी थी तब मुझे पता लगा था कि वे अपना सैन्य प्रशिक्षण समाप्त कर आए हैं। वहाँ अनिवार्य सैन्य सेवा (Mandatory Military Service) को युवा जीवन की एक ऐसी परीक्षा माना जाता है, जो व्यक्ति को बाल्यावस्था से परिपक्व नागरिकता की ओर ले जाती है। लगभग हर युवा पुरुष को दो वर्ष के लिए सैन्य प्रशिक्षण आवश्यक है। सैन्य प्रशिक्षण का यह अनुभव उसके व्यक्तित्व, सोच और जीवन-दृष्टि को गहरे रूप में रूपांतरित कर देता है। दक्षिण कोरियाई युवाओं के लिए सैन्य सेवा केवल दायित्व नहीं, बल्कि गौरव का विषय है। वे इसे केवल कानूनी बाध्यता के रूप में नहीं देखते, बल्कि राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता और सम्मान के रूप में स्वीकार करते हैं। कोरियाई युद्ध और उत्तर कोरिया के साथ निरंतर तनाव की ऐतिहासिक स्मृति ने सैन्य चेतना को सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बना दिया है। इसलिए सेना में सेवा करना वहाँ सामाजिक सम्मान और नैतिक उत्तरदायित्व का प्रतीक माना जाता है। इसमें कुछ अंतर्विरोध भी हैं। दो वर्षों की सैन्य सेवा कई युवाओं के करियर और शिक्षा की निरंतरता को बाधित करती है। कुछ युवा इसे अपने सपनों से दूरी के रूप में भी महसूस करते हैं। फिर भी, अधिकांश कोरियाई युवा इसे जीवन का अनिवार्य चरण मानकर स्वीकार करते हैं, क्योंकि उनके लिए राष्ट्र के प्रति कर्तव्य व्यक्तिगत आकांक्षाओं से ऊपर है। आधुनिक तकनीक और वैश्विक संस्कृति के बीच जीने वाला कोरियाई युवा जब सैन्य सेवा से गुजरता है, तो वह केवल आधुनिक नागरिक नहीं रहता, बल्कि राष्ट्र की चेतना से जुड़ा हुआ उत्तरदायी नागरिक बन जाता है।
जहाँ मैं यह सब देख रही थी वहीं मैं उन युवाओं को भी देख रही थी जो चित्र विचित्र हेअर स्टाईल में आते थे। उनकी हेअर स्टाईल अजिबोगरीब होती.. मैं अचंबित होती.. कैसे? पर धीरे धीरे कोरिया की कुछ बातें खुलती गयीं। मैंने लडकों को हमेशा हुडी.. कार्गो पैंट.. ओवर साईज्ड शर्ट और स्निकर्स, क्रॉस-बॉडी बैग, चेन नेकलेस, और सिल्वर इयररिंग्स पहने देखा… साथ ही मैंने ऐसे युवाओं को भी देखा है जो सुटेड बुटुडे भी थे… मुझे आश्चर्य लगता कितना ही तो अंतर्विरोध है यहाँ…। एक बार मेरी कक्षा में एक छात्र आया जिसके बाल आधे गुलाबी और आधे सुनहरे रंग में रंगे हुए थे। पहले तो मुझे यह अटपटा लगा और अनायास ही मेरी दृष्टि बार-बार उसी की ओर चली जाती रही। एक और छात्र था जिसने अपने बालों के बीच में ही स्पाईक्स् रखे थें और सिर के दोनों ओर के बाल एकदम नही थे। ये कैसी फैशन है..मेरे मन में सवाल आता…पर जब वही छात्र अत्यंत गंभीरता से कक्षा में चर्चा करते और विषय पर गहरी समझ प्रस्तुत करते, तब मुझे एहसास हुआ कि बाहरी रूप केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है, व्यक्तित्व का मापदंड नहीं। उस दिन मैंने समझा कि कोरियाई युवा फैशन को केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि अपनी पहचान और आत्मविश्वास के प्रतीक के रूप में अपनाता है ।वैसे भी आज सौंदर्य और मेकअप उद्योग अरबों डॉलर का उद्योग बन चुका है। परंपरागत रूप से यह उद्योग केवल महिलाओं से जुड़ा माना जाता था, लेकिन हाल के वर्षों में मेकअप ने लैंगिक सीमाओं को पार कर लिया है। पुरुषों और महिलाओं के लिए सौंदर्य और मेकअप की जो कठोर और अलग-अलग सीमाएँ निर्धारित थीं, वे अब धीरे-धीरे ढीली पड़ रही हैं। आज अधिक संख्या में पुरुष भी मेकअप में रुचि लेने लगे हैं। परिवर्तन की कड़ी में दक्षिण कोरिया सबसे आगे ही होगा। वैसे भी आज कोरियाई पॉप संस्कृति (के-पॉप) ने वैश्विक स्तर पर ‘कोरियाई लहर’ को जन्म दिया, कोमल पुरुषत्व (फ्लावर बॉय) की अवधारणा को दुनिया भर में तेजी से फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘फ्लावर बॉय’ ऐसे पुरुष को कहा जाता है जिसकी बाहरी छवि कोमल हो, त्वचा चिकनी हो, व्यवहार सभ्य हो और जो फैशनेबल कपड़े तथा मेकअप पहनता हो। एक सामान्य फ्लावर बॉय, पितृसत्तात्मक समाज के ‘कठोर’ पुरुष की छवि के विपरीत होता है। मैंने वहाँ रहते वहाँ के युवावर्ग को देखा है… जो अपनी ऐसी छवि बनाने में भी लगे हैं। पर ऐसा हम सामान्यतः नहीं कह सकते। मैंने युवाओं के फैशन और जीवन-शैली में भी अद्भुत अंतर्विरोध देखा। एक दिन विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रम में मैंने देखा कि कुछ छात्र पारंपरिक कोरियाई परिधान हनबोक या जागोरी- बाजी ( जैकेट और ठिली पैंट) में आए थे, जबकि वही छात्र सामान्य दिनों में अत्याधुनिक पश्चिमी परिधान पहनते थे। मुझे यह देखकर आश्चर्य भी हुआ और प्रसन्नता भी कि आधुनिकता को अपनाने के साथ-साथ वे अपनी सांस्कृतिक पहचान को अवसर मिलने पर गर्व से प्रदर्शित करते हैं। उस क्षण लगा कि उनके लिए फैशन केवल ट्रेंड नहीं, बल्कि परिस्थिति के अनुसार अपनी जड़ों से जुड़ने का माध्यम भी है। कुछ युवा पारंपरिक अनुशासन में भी ढले थे, तो कुछ के-पॉप संस्कृति से प्रभावित आधुनिक शैली में। पर यह भी एक सच ही है कि ‘फ्लावर बॉय’ जैसी अवधारणा ने पुरुषत्व की पारंपरिक छवि को चुनौती दी है।
मैं यही सोच रही थी कि यह युवा पीढी केवल आधुनिक तकनीक का उत्पाद नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन साधने वाला एक जीवंत व्यक्तित्व है। वह अनुशासन और स्वतंत्रता, सामूहिकता और व्यक्तिवाद, परंपरा और परिवर्तन इन सबके बीच अपनी पहचान गढ़ रहा है। …और शायद यही दक्षिण कोरिया के युवाओं की सबसे बड़ी शक्ति है।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – आज से सात वर्ष पहले 2 फरवरी 2019 का एक संस्मरण
रात के 2:37 का समय है। अलीगढ़ महोत्सव में कविता पाठ के सिलसिले में हाथरस सिटी स्टेशन पर कवि मित्र डॉ. राज बुंदेली के साथ उतरा हूँ। प्लेटफॉर्म लगभग सुनसान। टिकटघर के पास लगी बेंचों पर लगभग शनैः-शनैः 8-10 लोग एकत्रित हो गए हैं। आगे की कोई ट्रेन पकड़नी है उन्हें।
बाहर के वीराने में एक चक्कर लगाने का मन है ताकि कहीं चाय की कोई गुमटी दिख जाए। शीतलहर में चाय संजीवनी का काम करती है। मित्र बताते हैं कि बाहर खड़े साइकिल रिक्शावाले से पता चला है कि बाहर इस समय कोई दुकान या गुमटी खुली नहीं मिलेगी। तब भी नवोन्मेषी वृत्ति बाहर जाकर गुमटी तलाशने का मन बनाती है।
उठे कदम एकाएक ठिठक जाते हैं। सामने से एक वानर-राज आते दिख रहे हैं। टिकटघर की रेलिंग के पास दो रोटियाँ पड़ी हैं। उनकी निगाहें उस पर हैं। अपने फूडबैग की रक्षा अब सर्वोच्च प्राथमिकता है और गुमटी खोजी अभियान स्थगित करना पड़ा है।
देखता हूँ कि वानर के हाथ में रोटी है। पता नहीं ठंड का असर है या उनकी आयु हो चली है कि एक रोटी धीरे-धीरे खाने में उनको लगभग दस-बारह मिनट का समय लगा। थोड़े समय में सीटियाँ-सी बजने लगी और धमाचौकड़ी मचाते आठ-दस वानरों की टोली प्लेटफॉर्म के भीतर-बाहर खेलने लगी। स्टेशन स्वच्छ है तब भी एक बेंच के पास पड़े मूंगफली के छिलकों में से कुछ दाने वे तलाश ही लेते हैं। अधिकांश शिशु वानर हैं। एक मादा है जिसके पेट से टुकुर-टुकुर ताकता नन्हा वानर छिपा है।
विचार उठा कि हमने प्राणियों के स्वाभाविक वन-प्रांतर उनसे छीन लिए हैं। फलतः वे इस तरह का जीवन जीने को विवश हैं। प्रकृति समष्टिगत है। उसे व्यक्तिगत करने की कोशिश में मनुष्य जड़ों को ही काट रहा है। परिणाम सामने है, प्राकृतिक और भावात्मक दोनों स्तर पर हम सूखे का सामना कर रहे हैं।
अलबत्ता इस सूखे में हरियाली दिखी, हाथरस सिटी के इस स्टेशन की दीवारों पर उकेरी गई महाराष्ट्र की वारली या इसके सदृश्य पेंटिंग्स के रूप में। राजनीति और स्वार्थ कितना ही तोड़ें, साहित्य और कला निरंतर जोड़ते रहते हैं। यही विश्वास मुझे और मेरे जैसे मसिजीवियों को सृजन से जोड़े रखता है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – दक्षिण कोरिया की महिलाएं ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆
सियोल के इंनचॉन एअरपोर्ट से बाहर आते ही जो सर्द हवा चेहरे को छूकर गुज़री, उसके स्पर्श में ही मैंने आधुनिकता और अनुशासन का संगीत महसूस किया था। लंबी साफ सुथरी सड़कें संवरे हुए मन की तरह स्वच्छ, भीड़ में भी व्यवस्था और चेहरों पर एक गहरा एकाग्र भाव। पहली नज़र में लगा, यह देश जैसे समय से आगे चल रहा है। पर उसकी चमक के भीतर, जीवन की गहराइयाँ हैं… यह बात यहाँ रहते रहते पता चली थी।
यूँ तो यहाँ रहते रहते मैं जिन कोरियाई महिलाओं से मिली उन्होंने मुझपर एक छाप छोड़ दी। शिक्षिका होने के कारण सह शिक्षिकाओं, छात्राओं, ऑफिस स्टाफ, काम करनेवाली महिलाएँ.. आदि से मिलना होता ही था। साथ ही जब शाम को वॉक के लिए जाती थी तो आते जाते कुछ चेहरे परिचित हो गए थे.. किसी के साथ कभी कॉफ़ी या फिर चॉकलेट का रिश्ता भी अपने आप बन ही गया था…इन महिलाओं को देखकर मैं जितना जान पायीं.. समझ पायीं..उस पर आधारित ही मेरे ये शब्द हैं।
सियोल की सड़कों पर प्रत्येक स्त्री तेज़ कदमों से चलती है, जैसे समय की लय से उसके कदम बँधे हों। भारत की सड़कों पर चलती स्त्री के चेहरे पर जैसे थोड़ी बातचीत छिपी होती है कोरिया की स्त्रियों की नज़रें संयम और चैतन्य से भरी दिखतीं हैं। उनकी चाल में गति अधिक है, पर स्वर धीमे। शायद स्त्री का यह धीमा मौन ही उसके जीवन का दस्तावेज़ होता है।
कोरिया की स्त्रियाँ एक अद्भुत विरोधाभास को जीती हैं। एक तरफ़ वे विकसित, शिक्षित, विशाल बाज़ारों और तकनीक के बीच घूमती, पढ़ती–लिखती, नई पहचान रचती नज़र आतीं हैं तो दूसरी तरफ़, परंपरा और पितृसत्ता के सूक्ष्म तंतुओं से बंधी सी प्रतीत होतीं हैं। यह द्वंद्व मुझे भारत की स्त्रियों के जीवन में दिखने मिलता है। हालाँकि दोनों देशों की परिस्थितियाँ भिन्न हैं, पर जीवन की अंतर्धारा कहीं गहरी समानता रचती है।
कोरिया के विश्वविद्यालयों में पढ़ती लड़कियाँ विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। उनका सौंदर्य केवल बाहरी सजावट नहीं, बल्कि अपने देश की एक सांस्कृतिक उपस्थिति है। के–ब्यूटी की छवि, चेहरे की चमक, सुव्यवस्थित पोशाकें, नपे–तुले कदमों से चलना—सब एक कला की तरह है। सुबह विश्वविद्यालय की ओर भीड़ में जाती छात्राएँ अक्सर बेहद सजी सवंरी होतीं हैं। देखने में यह एक सौंदर्य–उत्सव जैसा लगता।
परंतु धीरे–धीरे जाना कि यह उत्सव कई बार दबाव में बदल जाता है। दक्षिण कोरिया में सुंदरता के कड़े मानदंड हैं—गोरा रंग, आकर्षक चेहरा, पतला शरीर! यह सौंदर्य केवल व्यक्तिगत चुनाव नहीं, सामाजिक मांग भी है। लड़कियाँ बतातीं कि यह सुंदरता उन्हें अवसर देती भी है, और बाँधती भी। उनकी आँखों में चमक होती हैं, पर कभी–कभी थकान भी। अपनी क्षमता साबित करने के ऊपर सौंदर्य का होना एक और बोझ बनकर रहता है। भारत में भी सुंदरता को महत्व दिया जाता है, पर इस हद तक नहीं। वहीं कोरिया में यह पहचान का मूल तत्व बनता जा रहा है। मैंने अक्सर इतने ज़ाडे में भी लडकियों को जैकट, टोपी पहने देखा है पर अक्सर वे स्कर्ट, फ्राक, या छोटी जिन्स में होती… उनकी पतली निथरी टांगे उनके सौंदर्य का मानदंड है यह मुझे बाद में पता चला था… और मैं उन लडकियों को देखकर दंग रह जाती कि ये इतनी कडाके की ठंड में ये इतने आराम से कैसे रह सकती है.. मैंने एकाध बार पूछ भी लिया था.. पर जबाव में उनकी मात्र मुस्कुराहट थी..सौंदर्य बोध के मेरे अज्ञान पर वे मुस्कुराती होगीं।
दक्षिण कोरिया में ‘presentable’ होना केवल उचित पहनावे तक सीमित नहीं है; शारीरिक रूप-रंग को भी सम्मान और परिश्रम का प्रतीक माना जाता है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपनी व्यक्तित्व-छवि के माध्यम से प्रदर्शित करना चाहता है। कुछ पेशों में विशेष रूप से फ्लाइट अटेंडेंट के लिए आवेदकों से स्पष्ट रूप से ‘शारीरिक आवश्यकताओं’ का उल्लेख किया जाता है। जिसने भी कभी कोरियन फ्लाइट में यात्रा की होगी, उसे यह अवश्य याद होगा कि सभी फ्लाइट अटेंडेंट के चेहरे-मोहरे लगभग एक जैसे हते हैं, त्वचा बेदाग होती है, और वे एक-सी वर्दी में सजी होती हैं, जो उनके सुघड़, पतले शरीर पर सटी हुई प्रतीत होती है।
इसके विपरीत कोरिया की गलियों–मोहल्लों में मुझे बिल्कुल अलग स्त्री–जगत दिखा..जहाँ चमक कम थी, पर जीवन अधिक था। फुटपाथों पर अनेक माँएँ एक हाथ से बच्चे की गाड़ी धकेलतीं और दूसरे हाथ में घर का सामान उठाए चलतीं। उनका चेहरा शांत, पर आँखों में गहरी थकान। लगता कि जीवन का पूरा बोझ उनके कंधों पर है, पर उनके कदमों में अदम्य आत्मबल भी था। उनमें कोई नाटकीयता नहीं थी बस सादगी और श्रम था। यह दृश्य मुझे भारत की गलियों–बाज़ारों में चलती महिलाओं की याद दिलाता—एक हाथ में बच्चा, दूसरे में थैला—जीवन की अनेक डोरियाँ सँभालती हुईं। मातृत्व की कोमलता और कठोरता दोनों इन स्त्रियों में थी।
दक्षिण कोरिया की स्त्रियों का सबसे बड़ा संघर्ष विवाह, मातृत्व और करियर के त्रिकोण में नज़र आता है। वहाँ महिलाओं की शिक्षा और क्षमताओं में कोई कमी नहीं; पर मातृत्व अक्सर करियर को सीमित कर देता है। बच्चा होने के बाद अनेक महिलाएँ नौकरी छोड़ देती हैं, या छोटे पदों तक ही सिमट जाती हैं। “डबल बर्डन” यानी घर और नौकरी दोनों की ज़िम्मेदारी स्त्रियों को थका देती है। भारत में संयुक्त परिवार स्त्री को कुछ सहारा देते हैं, पर कोरिया में न्यूक्लियर परिवार होने से यह बोझ अक्सर अकेले उसके कंधों पर आ गिरता है। आज भारत में भी कहीं कहीं यह परिदृश्य नज़र आता है।
फिर भारत लौटने के बाद मैंने अखबारों में पढ़ा कि वर्ष 2018 के आसपास कोरिया में #MeToo आंदोलन ने चुप्पी की दीवार तोड़ी। सालों से दबे–दबे स्वर पहली बार मुखर हुए। राजनीति, मीडिया, कला, शिक्षण हर क्षेत्र में स्त्रियाँ आगे आईं। आवाज़ें काँपती थीं, पर निर्णय दृढ़। भारत की तरह वहाँ भी विरोध हुआ, पर नई चेतना भी जन्मी। इस आंदोलन ने मुझे यह बताया कि स्त्री–स्वर जब उठते हैं, तो ऐतिहासिक होते हैं।
भारत और कोरिया, दोनों देशों में स्त्री के संघर्षों में समानता है। भारत में विवाह और परिवार सामाज केंद्रित हैं, कोरिया में व्यक्ति केंद्र में है, पर बोझ फिर भी स्त्री पर ही टिक जाता है। दोनों देशों में स्त्री अपने सपनों के साथ, परिवार, समाज और अपने भीतर के संशयों से जूझ रही है। भारत में प्रेम और सामूहिकता कुछ सहारा देते हैं जबकि कोरिया में अनुशासन और आत्मसंयम! पर संघर्ष दोनों में समान है..सम्मान और पहचान की खोज।
कोरिया में मैं सबसे पहले मिलनेवाली महिला थी प्रोफेसर वू जो किम! गोरी, छरहरी, आँखों पर चष्मा, अच्छे से कटे, सधे बाल…काले वेलवेट का स्कर्ट ब्लाउज.. स्कीन कलर के टाइट मोजे…ऊंची एडी के चमचमाते काले शूज और अपनी ड्रेस से मैच करती कीमती पर्स हाथ में लिए वे मेरे क्वार्टर्स आयी थीं.. साथ में थे प्रो. सो हेंगे जो…..उनको पहली बार मिलते ही मै जान गयी थीं कि वे अनुशासन प्रिय है। उन्होंने अपना कार्ड मेरे हाथ में दिया और कहा.. ज़रूरत पड़े तो अवश्य फोन करना… हमारा सारा वार्तालाप शुद्ध हिंदी में था। वैसे प्रोफेसर वू जो–किम से मिलना, कोरिया–समाज को देखने का एक पहला और नया द्वार था। उनका व्यक्तित्व सौम्यता, बुद्धिमत्ता और गहन चिंतन का अद्भुत संगम था। सादगी, अनुशासन, अनुसंधान-निष्ठा और मानवीय संवेदनशीलता—ये चार विशेषताएँ उन्हें एक आदर्श शिक्षक और प्रभावशाली अकादमिक व्यक्तित्व बनाती हैं। पर बाद में उनके साथ रहते यह जाना यह महिला भले ही बाहर से सख्त दिखती हैं… पर भीतर से बहुत ही मुलायम और स्नेहिल है। वैसे कोरिया के लोग अपने घर में बहुत कम आमंत्रित करते हैं.. पर वु जो किम जी ने मुझे अपने घर बुलाया अपने हाथों से खाना बनाया ओर खिलाया… उनका घर कोरियाई पद्धति से सजा था… पर कई जगह पर भारत के निशान थे… जिससे पता चलता कि वे भारत को अपने में बसाए रखती है। सबसे अच्छी बात यह लगी थी उनके घर का छोटा सा पुस्तकालय.. जहाँ… हिंदी कोरियाई और अंग्रेजी के उत्कृष्ट साहित्य की पुस्तकें करीने सजी हुई थी। पुस्तक प्रेम वैसे कोरिया के लोंगों में है ही.. कारण मैंने मेट्रो में सफर करते हुए कई कोरियाई लोगों में हाथ में मोटी मोटी पुस्तकें लिए पढ़ते देखा था।
कवयित्री किम यांग–शिक से मुलाक़ात, मेरे लिए कोरिया का दूसरा गहरा परिचय था। उनके घर की दीवारों पर लगे रवीन्द्रनाथ टेगोर का तैलचित्र, संस्कृत के उद्धरण, और कोरिया की काव्य–परंपरा से जुड़े प्रतीक साथ–साथ विराजमान थे। ऐसा लगा, जैसे भारत और कोरिया की आत्माएँ उनके कक्ष में एक ही धारा में बहती हों। वे अद्भुत अपनत्व से बातें करतीं, जैसे वर्षों का परिचय हो। उनकी वजह से ही मैं कोरियाई साहित्यकारों से मिल पायीं… कवयित्रियों के साथ घूम पायी और कोरियाई कविता का आनंद ले सकीं। वे मानती थीं कि स्त्री का जीवन, कविता की तरह, कदापि रैखिक नहीं होता—उसमें अनेक मोड़, अनेक रंग, अनेक ध्वनियाँ होती हैं। किम यांग–शिक भी अपने भीतर के मौन को कविता में बदल देती हैं। उनसे मिलकर लगा कि स्त्री–अनुभव की जड़ें दोनों देशों में एक–सी हैं—बस उनकी पत्तियाँ अलग–अलग ऋतुओं में खिलती हैं।
एक और स्त्री थी..नाम आज मेरी स्मृति में धुंधुला गया है, पर उसकी उपस्थिति मेरी स्मृति-यात्रा का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। कुछ नाम समय के साथ मिट जाते हैं, पर कुछ चेहरे, कुछ क्षण—मन की गहराइयों में रह जाते हैं। एक दिन अचानक मुझे फोन आया। फोन के उस पार से एक स्त्री की आवाज़ थी..संकोच भरी, पर दृढ़। उसने कहा कि वह मुझसे मिलना चाहती है…वह हिंदी सीखना चाहती थी। मैंने सहज भाव से उसे घर आने का निमंत्रण दे दिया। निश्चित दिन वह आई। दरवाज़ा खुला तो सामने छोटे बाल, छरहरी देह, अधेड़ उम्र की एक स्त्री खड़ी थी.. जिसकी आँखों में एक अनोखी फुर्ती थी, जैसे जीवन से थककर भी जीवन से हार न मानने की ज़िद। वह खाली हाथ नहीं आई थी। उसके हाथ में कुछ फूल थे और एक छोटा-सा केक। यह देखकर मन भीतर तक छू गया। विदेशी धरती पर, एक अनजान घर में इतनी आत्मीय तैयारी…यह केवल शिष्टाचार नहीं था, यह किसी रिश्ते की पहली ईंट थी। परिचय हुआ। चाय रखी। कुछ औपचारिक बातें हुईं।
फिर मैंने सहज जिज्ञासा से पूछा—“आप क्या करती हैं?” उसने बिना किसी हिचक के कहा—“मैं रंगरेज़ हूँ…मकानों को पेंट करने का काम करती हूँ।” एक क्षण के लिए मैं चौंक गई। अपने देश में ऐसे काम अक्सर पुरुषों से जुड़े होते हैं। पर उसके चेहरे पर न गर्व था, न संकोच—बस एक सहज स्वीकार था, जैसे वह कह रही हो—यह मेरा काम है, और यही मेरी पहचान है। उसी क्षण उसके प्रति मेरे मन में सम्मान की एक नई परत जुड़ गई। वह केवल हिंदी सीखने आई हुई कोई विदेशी महिला नहीं रही..वह श्रम की गरिमा की प्रतिमूर्ति बन गई। वह कभी-कभार मुझसे मिलने आती। भारतीय चाय पीती। शायद उसके स्वाद में उसे अपने जीवन की थोड़ी गर्माहट मिलती होगी। अपनी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में अपने छोटे-छोटे सुख और बड़े-बड़े दुःख बाँट लेती। कोई शिकायत नहीं, कोई आत्मदया नहीं—बस जीवन को जैसा है, वैसा कह देने की सादगी। कुछ देर बैठती, मुस्कुराती, और फिर उसी सहजता से चली जाती, जैसे आई थी। आज उसका नाम याद नहीं आता, पर उसका होना याद आता है। उसका वह छोटा-सा केक, फूलों की वह चुप भेंट, और श्रम से रंगे हुए हाथ—सब मेरी स्मृति में अब भी जीवित हैं। वह स्त्री मुझे यह सिखा गई कि सम्मान पदों से नहीं, डिग्रियों से नहीं, बल्कि उस साहस से जन्म लेता है जिससे कोई स्त्री अपने जीवन को अपने तरीके से रंगती है। और शायद…वह रंगरेज़ आज भी कहीं किसी दीवार पर रंग चढ़ा रही होगी—और अनजाने में, किसी के जीवन को थोड़ा उजला कर रही होगी।
इसके बाद विश्वविद्यालय में की कई छात्राओं से मिलीं… युवा… सुंदर… अल्हड… जागरुक… तकनीक से लैस, विनय से भरी… और हमेशा मदद के लिए तैयार! कोरिया की इन स्त्रियों को देखते हुए मुझे बार–बार लगा कि स्त्री कहीं भी हो, उसका मूल एक है.. वह अपने भीतर एक निरंतर एक यात्रा छिपाए रहती है..एक खोज की, एक धुन की, एक तड़प की…।
यहाँ कि करिअर ओरिएंटेड स्त्रियाँ मुझे बहुत भायी। उनका लेवल ऑफ कान्फिडन्स अलग ही है। वे आधुनिकता सशक्त प्रतीक हैं। वे अत्यंत अनुशासित, मेहनती और लक्ष्य-केंद्रित होती हैं। कोरिया जैसे प्रतिस्पर्धी समाज में उन्होंने शिक्षा, तकनीक, कॉरपोरेट, चिकित्सा और रचनात्मक क्षेत्रों में अपनी स्पष्ट पहचान बनाई हैं। कार्यस्थल पर वह दक्षता, समयबद्धता और पेशेवर नैतिकता के लिए जानी जाती है। मुझे याद पड़ता है… एक छात्रा की क्लास रात के आठ बजे मेरे घर पर होती थी…वहाँ ऐसा सिस्टम है कि आप अपनी और विद्यार्थी की सुविधा के अनुसार क्लास कभी भी ले सकते है। हमने तय किया था कि हर बुधवार को रात आठ बजे मेरे घर क्लास होगी.. कारण पोस्ट ग्रैजुएट में उस समय केवल एक ही छात्रा थी। उस दिन काफी ज्यादा बारिश थी। तापमान 6 तक आ गया था। बाहर काफी ज्यादा ठंड थी। मैंने सोचा शायद ये नहीं आएगी… पर ठीक आठ बजकर पांच मिनट पर वह कडाके ठंड में मेरे घर पहूँच गयी थी। मुझे उनकी यह समय प्रतिबद्धता बडी भाती थी। यही बात मैंने अस्पताल में भी देखी थी। वहाँ की नर्सेस स्नेहिल और कन्सर्न है। यही बात डॉक्टर्स की भी हैं।
कोरिया में रहते मेरे पैर में चोट आयी थी और मुझे प्लास्टर लगवाना पड़ा था… मैं लंगडाती जाती… आते जाते कुछ चेहरे परिचित हो गए थे..उन्हीं में से एक महिला मुझे रोज़ रोकती और कोरियाई भाषा में पूछती..बाल आपायो? जिगुम् ओत्तेयो? जिगुमुन ओत्तेयो? (अर्थात् पैर में दर्द है? अब कैसा है? अपना ध्यान रखिए?) उसके हाव भाव से मैं उसकी भावनाओं को समझती… और हंसते हंसते हात मिलाते हुए हाँ हाँ (ye. Ye.) कहती। ये महिला मुझे अपनी गली की कोई मासी, मामी, चाची सी लगती।
किम यांग–शिक की कविता, प्रो. वू जो–किम का चिंतन, विश्वविद्यालय की छात्राओं का सौंदर्य और स्वप्न, और फुटपाथ की माताओं का मौन श्रम—इन सबने मिलकर मेरे भीतर कोरिया का एक अद्भुत चित्र बना दिया। ये स्त्रियाँ केवल इतिहास की पंक्तियों में नहीं रहतीं। वे रोज़मर्रा जीवन की धड़कनों में हैं। कोई शब्दों से दुनिया बनाती है, कोई प्रश्नों से, कोई अपनी आँखों की चमक से, और कोई अपने श्रम से। इन सभी में एक साझा सूत्र है—दृढ़ता।
वास्तव मे स्त्री अपनी मौन में भी साधना रचती है। वह घर में हो या कक्षा में, सड़क पर हो या नौकरी के दफ़्तर में, वह हर जगह जीवन गढ़ रही है और इस रचना में वह अपनी पहचान ढूँढती, गढ़ती और फिर उसे सौंप देती है..अपनी अगली पीढ़ी को। कोरिया से लौटते समय मेरे मन में केवल स्मृतियाँ नहीं थीं, बल्कि एक नई समझ थी—स्त्री का संघर्ष, उसकी संवेदना और उसका आत्म–प्रकाश किसी भूगोल से बंधा नहीं—वह सार्वभौमिक है। कोरिया की स्त्रियों में मैंने भारत की स्त्रियों को देखा, और कहीं–कहीं अपने–आप को भी। मुझे लगा, स्त्री–जीवन संसार भर में एक ही बात कहता है— “मैं हूँ, और यही मेरी पहली और अंतिम सच्चाई है।”
सुप्रसिद्ध साहित्य साधिका – श्रीमती गायत्री तिवारी जी श्री यशोवर्धन पाठक☆
सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार श्रीमती गायत्री तिवारी जी की पुण्य तिथि पर प्रति वर्ष के अनुसार इस वर्ष भी आज 27 दिसम्बर को कला वीथिका भवन में उनकी स्मृति में एक वृहद कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है।
श्रीमती गायत्री तिवारी जी का समाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में एक आदर्श शिक्षिका के रुप में उन्होंने अपने कर्तव्यों और दायित्वों का निष्ठा पूर्वक निर्वाह किया तो सामाजिक गतिविधियों में भी उनकी सक्रिय भूमिका ने उन्हें मान सम्मान से महिमा मंडित किया।
जबलपुर में हिन्दी साहित्य के विकास में महिला साहित्यकारों की सक्रिय भूमिका रही है। गद्य हो या पद्य सभी में यहाँ की महिला साहित्यकारों ने संस्कारधानी को राष्ट्रीय क्षितिज पर गौरवान्वित किया है। जबलपुर के साहित्यिक जगत को अपनी लेखनी से गौरवान्वित करने में श्रीमती गायत्री तिवारी जी ने भी सृजन धर्म का सक्रियता पूर्वक निर्वाह किया था। गद्य और पद्य दोनों में ही उन्होंने अपनी कलम चलाई और साहित्यिक क्षेत्र को उल्लेखनीय और पठनीय रचनाएँ दी। । उन्होंने जहाँ प्रभावी और उद्देश्य परक कहानियों की रचना की वहीं उन्होंने भावनात्मक रूप से कविताओं का भी सृजन किया। उनका लिखा उपन्यास कोबरा मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग से पुरस्कृत और सम्मानित भी किया जा चुका है। जबलपुर और प्रदेश की साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के विकास के लिए श्रीमती गायत्री तिवारी जी ने समर्पित भाव से महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई और त्रिवेणी परिषद और महिला लेखिका संघ के विभिन्न पदों पर कार्य करते हु साहित्यिक क्षेत्र में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के लिए प्रशंसनीय प्रयास किये। साहित्य और पत्रकारिता क्षेत्र के सशक्त हस्ताक्षर के रुप में सर्वत्र प्रतिष्ठित श्रद्धेय डा राजकुमार जी सुमित्र की सफलता और सक्रियता के पीछे उनकी जीवन संगिनी श्रीमती गायत्री तिवारी जी का सराहनीय योगदान था। अपनी साहित्य साधना , शिक्षकीय जीवन और पारिवारिक गतिविधियों के साथ सुमित्र जी के जीवन में प्रत्येक सुख और दुख की साथी के रुप में उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया और यही कारण था कि सुमित्र जी ने अपने साहित्यिक और सामाजिक जीवन में एक प्रेरणा दायक और उल्लेखनीय कीर्तिमान स्थापित किया।
साहित्य साधक श्री राजेश पाठक प्रवीण ने कथा कृति कोबरा में श्रीमती गायत्री तिवारी के पारिवारिक, सामाजिक और शैक्षणिक जीवन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उनके साहित्य सृजन का विश्लेषण कुछ इस प्रकार किया है-
प्रातः सूरज के अर्घ्य से दिन को प्रणाम करते हुए, गृहस्थी के श्रृंगार के साथ शिक्षण कर्म में संलग्न श्रीमती गायत्री तिवारी ने हर सांझ तुलसी पर दिया रखकर घर के आंगन को प्रकाशित किया है।
तमस और चांदनी के नैरन्तर्य को कर्म और विश्वास के बोध के साथ जीवन की इबारत रचने वाली कथा लेखिका का सृजन जीवन का तत्व दर्शन है।
नारी जीवन के अंधेरे उजालों के मध्य दरकते मनके व्याकरण को कथाकार ने अपनी कहानियों के माध्यम से आलोक दिया है। कोबरा की कहानियां जीवन चेतना को व्यंजित करने वाली श्रेष्ठ कहानियां हैं।
आज श्रीमती गायत्री तिवारी जी हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी स्मृतियां हमारे मानस पटल पर सदा अमिट रहेंगी। कविवर श्री जयशंकर प्रसाद की ये प्रेरक काव्य पंक्तियां शायद ऐसी ही नारी शक्ति के लिए लिखी गई है –