हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३५४ – अगले बरस तू जल्दी आ… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३५४ ☆ अगले बरस तू जल्दी आ… ?

श्री गणेश विसर्जन के अवसर पर पुनर्पाठ के अंतर्गत यह उवाच।🙏

कल अनंत चतुर्दशी थी। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी के विग्रह की प्रतिष्ठा से आरम्भ गणेशोत्सव विसर्जन के साथ ही कल समाप्त हो गया। यूँ देखें तो सृजन, प्रतिष्ठा और विसर्जन के माध्यम से जीवन की सम्पूर्ण यात्रा हमारे अनेक त्योहारों में अंतर्निहित है। आगमन से गमन तक का पर्व है, गणेशोत्सव।

घर में अतिथि का आगमन एक सामान्य घटना है। अतिथि के आने का दूसरा पहलू है कि वह लौट जाएगा। भूलोक भी प्रकृति का घर है। हम सब अतिथि हैं। मर्त्यलोक में देह धारण करके जो आया, उसका लौटना अवश्यंभावी है। कीर्ति तो अक्षुण्ण रह सकती है, अमर हो सकती है पर देह का नष्ट होना  अनिवार्य है।

नश्वर जगत में प्रदत्त समय का सदुपयोग करना, अपनी भूमिका का समुचित निर्वहन करना मनुष्य से अपेक्षित है। समय बीतने के बाद पश्चाताप के अलावा कुछ शेष नहीं रह जाता।

किसी राज्य में राजा द्वारा आयोजित संगीतोत्सव में भाग लेने के लिए एक युवा सितारवादक को आमंत्रित किया गया। सितारवादक के लिए अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का यह स्वर्णिम अवसर था। उसने विचार किया कि वह ऐसा सितार बजाएगा जिससे श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाएँगे और राजा उससे प्रसन्न होकर बहुत सारा धन देगा। 

संगीतोत्सव आरम्भ हुआ। हर कलाकार की प्रस्तुति के लिए समय निर्धारित था। समय पूरा होने पर पर्दा गिर जाता और फिर नया कलाकार आता। सितारवादक की प्रस्तुति का समय आया। वह मंच पर पहुँचा। वादन आरम्भ करने से पहले सितार की ट्यूनिंग के लिए उसकी खूँटियाँ मरोड़ कर सुर मिलाने लगा। इस प्रक्रिया में ऐसा खोया कि उसे प्रदत्त समय समाप्त हो गया और पर्दा गिरा दिया गया। सितारवादक को वादन के बिना ही लौटना पड़ा। अवसर तो मिला था पर प्रस्तुति नहीं दे पाया, तैयारी में ही रह गया। डॉ. हरिवंशराय बच्चन के शब्दों में लिखूँ तो ‘जीवन सब बीत गया, जीने की तैयारी में।’

समय रहते वह सितार बजा लेता तो संभव था कि उसकी सितार के सुर वर्षों तक याद किए जाते और देहातीत होकर भी अपनी प्रतिभा के बल पर वह चिरंजीवी हो जाता।

अष्ट चिरंजीवी व्यक्तित्वों में से एक हैं महर्षि वेदव्यास। उन्हें ज्ञान का मूर्तिमान स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि महर्षि ने भगवान गणेश को दस दिन तक निरंतर महाभारत की कथा सुनाई और श्री गणेश उसे लिपिबद्ध करते गए। तत्पश्चात महर्षि ने पाया कि श्री गणेश के शरीर का तापमान बहुत अधिक बढ़ गया है। महर्षि ने गणेश जी को समीप के एक सरोवर में स्नान कराया ताकि उनके शरीर का तापमान सामान्य हो सके। यह काल गणेशोत्सव के रूप में मनाया जाता है और उत्कर्ष के रूप में विग्रह का जल में विसर्जन होता है।

श्री गणेश बुद्धि के देवता हैं। स्वाभाविक है कि उनके लिए मनाया जानेवाला उत्सव ज्ञान की प्रतीति कराने वाला हो। महर्षि वेदव्यास इसी शाश्वत ज्ञान के अविनाशी प्रसारक हैं। ज्ञान के प्रचार-प्रसार में लगे साधकों में महर्षि का यही जाग्रत अंश देखने को मिलता है।

सृजन, प्रतिष्ठा और विसर्जन के माध्यम से गणेशोत्सव, जीवनचक्र की प्रतिकृति बनकर सामने आता है। स्मरण रहे, ‘अगले बरस तू जल्दी आ’ आगमन से गमन की सतत और अखंड यात्रा का घोष है। काया धारण करने वाला हर जीव इसी अटल यात्रा का पथिक है। ..इति।

 

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना कल संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी।🕉️

💥 💥

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ११०३ ⇒ ढ, ढक्कन का ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ढ, ढक्कन का…“।)

?अभी अभी # ११०३ ⇒ आलेख – ढ, ढक्कन का ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारी गीता प्रेस वाली बाल भारती भाग १,जो अमर घर चल से शुरू होती थी,उसमें अक्षर ज्ञान भी था,स्वर और व्यंजन भी थे, और बारहखड़ी भी थी । अ,आ,इ,ई और क,का,कि, की ,का कक्षा में समवेत पाठ,वेद की ऋचाओं की तरह होता था ।

ट गण और भ गण बड़ा रोचक होता था । ट,टा,टि,टी, टं टः पर,और भ,भा,भि,भी सीधा भौ,भं,भः पर जाकर रुकता था । अक्षर ज्ञान किसी वस्तु अथवा व्यक्ति की तस्वीर से शुरू होता था । अ के नीचे एक अनार बना होता था,और उ के नीचे एक उल्लू ।।

सरकारी स्कूल में टाटपट्टी पर बैठकर जब अ अनार का,आ,आम का,इ इमली और अं अंगूर का बोलते थे,तो मानो सभी फलों का स्वाद मिल जाता था । ककड़ी, तरबूज और खरबूज भले ही खाने को न मिले,इनका अक्षर ज्ञान तो हो ही जाता था ।।

एक सङ्गीत के शिक्षक ने रिटायरमेंट के बाद पाठ्य पुस्तक लिख मारी ! जो त्,तरबूज का था, उसे तबले का कर दिया, अच्छा भला स सड़क का था,उसे स सारंगी का कर दिया । जो ग गधे का था ,वह गणेश जी का हो गया ।केवल क तब भी कमल का था, आज भी कमल का ही है ।

बच्चों को तो अक्षर ज्ञान से मतलब है । फिर भले ही ढ ढक्कन का हो या ढपली का ।

वैसे भी अक्षर ज्ञान और व्याकरण से होता क्या है । ज़िन्दगी में जो आगे बढ़ गया वह इंसान बन गया और जो पिछड़ गया वह ढ ढक्कन का ।।

इंसान हो या कोई वस्तु,उसे ढँकना ज़रूरी होता है । हम अपना शरीर वस्त्रों से ढँकते हैं,और खाने पीने की वस्तुओं को ढँककर रखते हैं, ताकि उसमें धूल और मक्खी-मच्छर न गिरे । यह जिम्मेदारी एक ढक्कन ही निभाता है ।

एक समय था, हर पेन का एक ढक्कन होता था ! अगर कोई आपसे पेन माँगता है और आप उदारतापूर्वक उसे झट से अपना पेन निकालकर दे देते हैं,तो उसके वापस आने की संभावना क्षीण हो जाती है । आप ढक्कन अपने पास रखिये, पेन जहाँ भी होगा, खुद चलकर आएगा । बिना ढक्कन के पेन की ज़िंदगी भी क्या ज़िन्दगी ।।

 ♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३९ ☆ महाभारत नहीं रामायण… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख महाभारत नहीं रामायण। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण लेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – इंसाप्नरभु मिलन की आस  / योगाश्रम प्रस्तुति , सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३९ ☆

☆ महाभारत नहीं रामायण… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘जब तक सहने की चरम सीमा रहेगी, रामायण लिखी जाएगी। मांगा हक़, जो अपने हित में महाभारत हो जाएगी।’ जी हाँ! यही सत्य है जीवन का, जो सदियों से धरोहर के रूप में सुरक्षित है। इसलिए नारी को सहन करने की शिक्षा दी जाती है, क्योंकि मौन सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम निधि है। वैसे तो यह सबके लिए वरदान है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने मौन रहकर व चित्त को एकाग्र कर अपने अभीष्ठ को प्राप्त किया है और जीव-जगत् व आत्मा-परमात्मा के रहस्य को जाना है। जब तक आप में सहन करने की शक्ति व त्याग करने का सामर्थ्य है; परिवारजन व संसार के लोग आपको सहन करते हैं, अन्यथा जीवन से बेदखल करने में पल-भर भी नहीं लगाते। विशेष रूप से नारी को तो बचपन से यह शिक्षा दी जाती है, ‘तुम्हें सहना है, कहना नहीं’ और वह धीरे-धीरे उसे जीने का मूलमंत्र बना लेती है तथा पिता, पति व पुत्र के आश्रय में सदैव मौन रहकर अपना जीवन बसर करती है।

वास्तव में नारी धरा की भांति क्षमाशील व सहनशील है; गंगा की भांति निर्मल व निरंतर गतिशील है; पापियों के पाप धोती है; पर्वत की भांति अटल है, परंतु कभी उफ़् नहीं करती। इसी प्रकार नारी भी ता-उम्र सबके व्यंग्य-बाणों के असंख्य भीषण प्रहार व ज़ुल्म हंसते-हंसते सहन करती है… यहां तक कि वह कभी भी अपना पक्ष रखने का साहस  नहीं जुटा पाती। वैसे तो पुरुष वर्ग द्वारा यह अधिकार नारी-प्रदत्त हैं ही नहीं। सो! वह दोयम दर्जे की प्राणी समझी जाती है– एक हाड़-मांस की जीवित प्रतिमा, जिसे दु:ख-दर्द होता ही नहीं, क्योंकि उसका मान-सम्मान नहीं होता। इसलिए आजीवन कठपुतली की भांति दूसरों के इशारों पर नाचना उसकी नियति बन जाती है। वह आजीवन समस्त दायित्व-वहन करती है; उसी आबोहवा में स्वयं को ढाल लेती है; दिन-भर घर को सजाती-संवारती व व्यवस्थित करती है और वह उस अहाते में स्वयं को सुरक्षित अनुभव करती है। बच्चों को जन्म देकर ब्रह्मा व उनकी परवरिश कर विष्णु का दायित्व निभाती है और उसके एवज़ में उसे उस घर में रहने का अधिकार प्राप्त होता है; जिसे वह कभी अपना कह ही नहीं सकती। यदि वह संतान को जन्म देने में असमर्थ रहती है, तो बाँझ कहलाती है और उससे उस घर में रहने का अधिकार भी छीन लिया जाता है, क्योंकि वह वंश-वृद्धि नहीं कर पाती। परिणाम-स्वरूप पति के पुनः विवाह की तैयारियां प्रारंभ की जाती हैं। इस स्थिति में साक्षर-निरक्षर का भेद नहीं किया जाता है… भले ही वह अपने पति से अधिक धन कमा रही हो; अपने सभी दायित्वों को सहर्ष वहन कर रही हो। मुझे स्मरण हो रही है ऐसी ही एक घटना…जहां एक शिक्षित नौकरीशुदा महिला को केवल बाँझ कह कर ही तिरस्कृत नहीं किया गया; उसे पति के विवाह में जाने को भी विवश कर लिया गया, ताकि उसकी मांग में सिंदूर व गले में मंगलसूत्र धारण करने का अधिकार कायम रह सके और उसे विवाहिता के रूप में उस छत के नीचे रहने का अधिकार प्राप्त हो सके। परंतु एक अंतराल के पश्चात् घर में बच्चों की किलकारियां गूंजने के पश्चात् घर- आँगन महक उठा और वह खुशी से अपना पूरा वेतन घर में खर्च करती रही। धीरे-धीरे उसकी उपस्थिति नव-ब्याहता को अखरने लगी और वह उस घर छोड़ने को विवश हो गयी। परंतु फिर भी वह मांग में सिंदूर धारण कर पतिव्रता नारी होने का स्वांग रचती रही। है न यह उसके प्रति अन्याय…. परंतु उस पीड़िता को सब मूर्ख समझते हैं, जिसने घर फूंक कर तमाशा देखा है। इसलिए उसके पक्ष में कोई भी आवाज़ नहीं उठाता।

सो! जब तक सहनशक्ति है, आपकी प्रशंसा होगी और रामायण लिखी जाएगी। परंतु जब आपने अपने हित में हक़ मांग लिया, तो महाभारत होना निश्चित है। वैसे भी अधिकारों की मांग करना–संघर्ष का आह्वान करना है और संघर्ष से महाभारत हो जाता है और जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं रहता। राजनीति हो या धर्म; घर-परिवार हो या समाज; हर जगह इसका दबदबा कायम है। राजनीति तो सबसे बड़ा अखाड़ा है, परंतु आजकल तो सबसे अधिक झगड़े धर्म के नाम पर होते हैं।

घर-परिवार में भी अब इसका पूर्ण हस्तक्षेप है। पिता-पुत्र, भाई-भाई व पति-पत्नी के जीवन से स्नेह-सौहार्द इस प्रकार नदारद है, जैसे चील के घोंसले से माँस। जहां तक पति-पत्नी का संबंध है, उनमें समन्वय व सामंजस्य है ही नहीं… वे दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में अपना क़िरदार निभाते हैं, जिसका मूल कारण है अहं; जो मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। इसी कारण वे आजकल एक-दूसरे के अस्तित्व को भी नहीं स्वीकारते; जिसका परिणाम अलगाव व तलाक़ के रूप में हमारे समक्ष है। वैसे भी आजकल संयुक्त परिवार-व्यवस्था का स्थान एकल परिवार- व्यवस्था ने ले लिया है, परंतु फिर भी पति-पत्नी आपस में प्रसन्नता से अपना जीवन बसर नहीं कर पाते और एक-दूसरे से निज़ात पाने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते। वैसे भी आजकल ‘तू नहीं, और सही’ का बोलबाला है। लोग संबंधों को वस्त्रों की भांति बदलने लगे हैं, जिसका मूल कारण ‘लिव-इन व प्रेम विवाह’ है। अक्सर बच्चे भावावेश में संबंध तो स्थापित कर लेते हैं और चंद दिन साथ रहने के पश्चात् एक-दूसरे की कमियाँ-ख़ामियाँ उजागर होने लगती हैं; जिन्हें वे स्वीकार नहीं पाते और परिणाम होता है तलाक़–जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा बच्चों को भुगतना पड़ता है। वैसे आजकल सिंगल पेरेंट का प्रचलन भी बहुत बढ़ गया है। सो! इन विषम परिस्थितियों में बच्चों का सर्वांगीण विकास कैसे संभव है? एकांत की त्रासदी झेलते बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। वे असामान्य हो जाते हैं; सहज नहीं रह पाते और वह सब दोहराते हुए अपना जीवन नरक-तुल्य बना लेते हैं।

ग़लत लोगों से अच्छी बातों की अपेक्षा कर हम आधे ग़मों को प्राप्त करते हैं और आधी मुसीबतें हम अच्छे लोगों में दोष ढूंढ कर प्राप्त करते हैं। ग़लत साथी का चुनाव करके हम अपने जीवन के सुख-चैन को दाँव पर लगा देते हैं और दोष-दर्शन हमारा स्वभाव बन जाता है, जिसके परिणाम- स्वरूप हमारा जीवन जहन्नुम बन जाता है। आजकल लोग भाग्य व नियति पर कहाँ विश्वास करते हैं? वे तो स्वयं को भाग्य-विधाता समझते हैं और यही सोचते हैं कि उनसे अधिक बुद्धिमान संसार में कोई दूसरा है ही नहीं। इस प्रकार वे अहंनिष्ठ प्राणी पूरे परिवार की जीवन भर की खुशियों को लील जाते हैं। संदेह व अविश्वास इसके मूल कारक होते हैं। सो! समाज में शांति कैसे व्याप्त रह सकती है? इसलिए बीते हुए कल को याद करके उससे प्राप्त सबक़ को स्मरण रखना श्रेयस्कर है। मानव को अतीत का स्मरण कर अपने वर्तमान को दु:खमय नहीं बनाना चाहिए, बल्कि उससे सीख लेकर अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहिए। जीवन में सफलता पाने का मूलमंत्र यह है कि ‘उस लम्हे को बुरा मत कहो, जो आपको ठोकर पहुँचाता है; बल्कि उस लम्हे की कद्र करो, क्योंकि वह आपको जीने का अंदाज़ सिखाता है। दूसरे शब्दों में अपनी हर ग़लती से सीख गहण करें, क्योंकि आपदाएं आपके धैर्य की परीक्षा लेती हैं और मज़बूत बनाती हैं। सो! ग़लती को दोहराओ मत। जो मिला है, उन परिस्थितियों को उत्तम बनाने की चेष्टा करो; न कि भाग्य को कोसने की। हर रात के पश्चात् सूर्योदय अवश्य होता है और अमावस के पश्चात् पूनम का आगमन भी निश्चित है। जीवन में आशा का दामन कभी मत छोड़ें, क्योंकि गया वक्त लौटकर कभी नहीं आता। हर पल को सुंदर बनाने का प्रयास करें। जीवन में सहन करना व त्याग करना सीखें, क्योंकि अगली सांस लेने के लिए मानव को पहली सांस का त्याग करना पड़ता है। संचय की प्रवृत्ति का त्याग करें। इंसान खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ ही इस संसार से लौट जाना है। सो! सदाशयता को अपनाएं और दूसरों के प्रति कर्तव्यनिष्ठता का भाव रखें, क्योंकि कर्त्तव्य व अधिकार अन्योन्याश्रित हैं। अधिकार-स्थापत्य अशांति- प्रदाता है, जो हृदय का सुक़ून छीन लेता है। इसलिए उसे अपने जीवन से बाहर का रास्ता दिखा दें, ताकि हर घर में रामायण की रचना हो सके। पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष व संघर्ष को जीवन में पदार्पण मत करने दें, क्योंकि ये महाभारत के जनक हैं, प्रणेता हैं। सो! अलौकिक आनंद से अपना जीवन बसर कर लें।                  

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

24.8.22

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # २६ ☆ आलेख – परशुराम जी – २ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘परशुराम जी – २‘।)

☆ मंजिरी साहित्य # २६ ☆

? आलेख – परशुराम जी – २ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

हमारे 18 पुराण हैंl इन सभी पुराणों में जीव, जगत, जगदीश और मोक्ष को बहुत ही अच्छी तरह समझाया हैl

सनातन धर्म में सतयुग, द्वापर युग, त्रेता युग और कलियुग का ज्ञान अलौकिक हैl हमारे सनातन धर्म का विज्ञान इतना परिपूर्ण है कि सृष्टि की निर्मिति कैसे हुई? प्रकृति और पुरुष क्या है? इसका विस्तृत वर्णन हमें पढ़ने को मिलता हैl काल गणना भी बहुत ही उत्तम तरीके से दर्शाई गई हैl हमारे सभी पुराण तत्व चिंतन, तत्व ज्ञान, भक्ति सभी दृष्टि से अपूर्व हैl खासियत ये है कि ये सभी संवाद रूप में हैंl

वेदों को अपौरुषेय कहते हैं क्यूंकि इन्हें किसी मानव ने नहीं लिखेl ये ईश्वर के श्वास से प्रकट हुए हैंl

कहते हैं समय के प्रारम्भ में परब्रह्म के दो भाग हुएl l पहला- पुरुष और दूसरी- प्रकृतिl पुरुष ने अपने आप को तीन भागों में विभाजित कियाl पहला ब्रह्म – सृजनकर्ता, दूसरा विष्णु – वहनकर्ता और तीसरा शिव – विलीनकर्ताl इन तत्वों को शक्ति प्रदान करने हेतु प्रकृति ने स्वयं को भी तीन भागों में विभाजित कियाl पहली लक्ष्मी, दूसरी सरस्वती और तीसरी शिवाl

पुरुष अर्थात आत्माl ये नाशरहित, नित्य एवं अजन्मी हैl इसे शस्त्र नहीं काट सकताl आग नहीं जला सकती और पवन भी इसे सुखा नहीं सकतीl इस तरह ये अच्छेद, अदाह्य, अकलेद्य एवं अशोध्य हैl साथ ही नित्य सर्वव्यापी, अचल और स्थिर हैl यह अचिन्त्य हैl विकार रहित हैl

पुरुष चेतन हैl चैतन्य जगाता हैl ऊर्जावान करता हैl यह त्रिगुणातीत हैl यह ज्ञान स्वरूप हैl जगत से परे हैl बंधन से मुक्त हैl वहीं प्रकृति पूरा ब्रम्हाण्ड, पूरी सृष्टि हैl प्रकृति में सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण साम्य अवस्था में थेl पर ईश्वर ने इसमें चेतना डाली और सृष्टि का निर्माण हुआl प्रकृति जड़ हैl नाशवान हैl यह भोग्य हैl यही बंधन का मूल कारण हैl अर्थात प्रकृति या सृष्टि कहें एवं पुरुष ये दोनों ही तत्व बुनियादी हैं, मौलिक हैं, चिरंतन हैं एवं नित्य हैंl दोनों एकदूसरे के अधीन हैं एक दूसरे पर आधारित हैंl

 – क्रमशः

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ “स्मृतिशेष कर्मयोगी डॉ.आनंद तिवारी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

मित्रवर गुंजन कला सदन ,मध्यप्रदेश के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. आनंद तिवारी जी का गत दिवस निधन हो गया। उनकी स्मृति में श्रद्धांजलि स्वरुप प्रस्तुत है यह विशेष आलेख.)

 ☆ “स्मृतिशेष कर्मयोगी डॉ.आनंद तिवारी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

(आज 24 सितम्बर को श्रद्धांजलि समारोह पर विशेष)

(ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से स्मृतिशेष डॉ. आनंद तिवारी जी को विनम्र श्रद्धांजलि)

उनके गांव के युवा शासकीय चिकित्सक का ट्रांसफर हो गया है, जैसे ही यह खबर गांव में फैली, न सिर्फ उस गांव के वरन आसपास के भी अनेक छोटे-छोटे गांव के लोगों में दुःख की लहर फैल गई। ग्रामवासी दूर-दूर से उस युवा चिकित्सक से मिलने और आग्रह करने आने लगे कि वे उन्हें छोड़कर न जाएं। अनेक ग्रामवासियों के हाथों में अपने प्रिय डॉक्टर के लिए प्रेम से भरी भेंटें भी थीं। एक वृद्धा अपनी पोटली में डॉक्टर के लिए गुड़ की एक छोटी डली लाई थी, उसकी आँखों में आँसू थे। डॉक्टर के विदा लेने का दिन भी आ गया। उन्हें विदा करने पास के छोटे से रेलवे स्टेशन पर आसपास के गांवों से सैकड़ों लोग उपस्थित थे। आपको लग रहा होगा कि यह किसी बम्बइया फिल्म की शुरूआत या अंत का दृश्य है। जी नहीं, यह दृश्य है सन 1980 में मध्यप्रदेश के सिवनी बानापुरा ने निकट, बाबडिया भाऊ गांव का। वहां के शासकीय चिकित्सक डॉ.आनंद तिवारी की विदाई का, जो अब हमारे बीच नहीं हैं।

श्यामवर्ण के ऊँचे-पूरे, खुशमिजाज, भव्य व्यक्तित्व के धनी डॉ आनंद तिवारी जितने खुलकर ठहाका लगाते थे उतनी ही सहजता से अपने प्रेम की अभिव्यक्ति भी करते थे और लोगों के दुःख में द्रवित भी होते थे। गांव से विदा लेते हुए उन्हें इस बात की प्रसन्नता थी कि वे अपने पिता पंडित नर्मदा प्रसाद तिवारी जो कि जबलपुर के विख्यात समाजसेवी, उद्योगपति एवं प्रतिष्ठित किसान के रूप में जाने जाते थे उन्हें व अपनी माता श्रीमती रेवारानी जी को सच्ची जनसेवा का जो वचन देकर आये थे उस संकल्प में खरे उतरे। लगभग 45 – 50 वर्ष पहले बाबडिया भाऊ गांव एवं आसपास के कुछ अन्य गांव प्रमुख रूप से पांडववंशी कौम की सीमित जनसंख्या वाले गांव थे। सीमित जनसंख्या वाली किसी भी कौम में कुछ विशिष्ट विकृतियां आ जाती हैं। उन्हें दूर करने के लिए डॉ.आनंद तिवारी ने क्षेत्र में पैदल घूम-घूम कर काम किया। बूढ़ों, बच्चों और युवाओं से व्यक्तिगत सम्बन्ध बनाये, कुछ ही दिनों में इन्हें पहचान कर आत्मीयता पूर्वक उनके नाम से संबोधित करना शुरू किया। सफाई और स्वास्थ्य का महत्व समझाया। काम के बदले अनाज योजना के अंतर्गत ग्रामीणों से ही श्रम करवाकर गांव में एक खेल का मैदान व स्कूल भवन तथा 3 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण करवाया। उल्लेखनीय है कि काम के बदले अनाज योजना में डॉ. तिवारी द्वारा इस गांव में कराए गए कार्य को “सर्वाधिक तेज गति से हुआ कार्य माना गया था तथा उन्हें मध्यप्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया था।

डॉ.तिवारी ने क्रमशः बड़ेरा एवं बड़वारा (कटनी) मैं भी समर्पित मन से पीड़ितों की सेवा की। सदा सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहे आनंद तिवारी के नगर के बाहर सेवारत हो जाने के कारण उनके सानिध्य से वंचित उनके मित्र और प्रशंसक चाहते थे कि वे जबलपुर आकर ही सेवा कार्य करें। अंततः मित्रों की इच्छा पूरी हुई, उन्होंने नगर में विक्टोरिया चिकित्सालय, गोरखपुर, हाईकोर्ट एवं सिटी डिस्पेंसरी कोतवाली में न केवल एक आदर्श चिकित्सक के रूप में सेवाएं दीं वरन अपने कार्यकाल में स्वास्थ्य संबंधी तमाम शासकीय योजनाओं को नगर की विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से प्रभावी ढंग से लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया। डॉ.तिवारी ने तत्कालीन राज्यसभा एवं लोकसभा सदस्यों श्रीमती रत्नकुमारी देवी, पं. चन्द्रिका प्रसाद त्रिपाठी, शिवकुमार चनपुरिया, श्रीमती जयश्री बैनर्जी एवं समाजसेवियों के साथ विभिन्न संस्थाओं अस्तु, समाज कल्याण परिषद, समाधान, सावधान एवं गुंजन कला सदन के विभिन्न पदों पर रहते हुए सामाजिक व सांस्कृतिक जागरण के कार्य किये। अनेक चिकित्सा शिविर लगाए। नगर में दवा एकत्रीकरण एवं वितरण योजना को अंजाम दिया। गन्दी बस्तियों में स्वच्छता अभियान चलाए। मित्रों के साथ दूध के दाम घटाने आंदोलन भी किया। डॉ.तिवारी के इन कार्यों में उनकी पत्नी श्रीमती ममता तिवारी एवं बाद में उनके सुपुत्रों हिमांशु-सुधांशु व पुत्र वधुओं डॉ.प्रियंका एवं डॉ.गार्गी का भी पूरा सहयोग मिला। सामाजिक कार्यों के बढ़ते दायरे और रोग मुक्त सुसंस्कृत समाज के निर्माण के संकल्प को पूरा करने के लिए डॉ.आनंद तिवारी ने दिसंबर 2003 में स्वयं को शासकीय सेवा से मुक्त कर लिया।

डॉ.आनंद तिवारी ने अपने मित्रों के साथ मिलकर गोलबाजार, जबलपुर में नेशनल हॉस्पिटल एवं ओमेगा चिल्ड्रंस हॉस्पिटल की स्थापना की जिसकी गिनती आज देश के उत्कृष्ट चिकित्सालयों में की जाती है। वे आजीवन भारतीय एवं क्षेत्रीय साहित्य, कला, संस्कृति के संरक्षण व विकास के लिए सजग और सक्रिय रहे। गुंजन कला सदन के प्रांतीय अध्यक्ष के रूप में उन्होंने नगर की तरुणाई को नई दिशा और प्रतिभा विकास के लिए एक सशक्त मंच दिया। विषम कोरोना काल में डॉ.आनंद तिवारी सभी परिचितों से निरंतर संपर्क में रहते हुए उन्हें हौसला और मार्गदर्शन देते रहे। नेशनल अस्पताल के माध्यम से उन्होंने रोगियों की सेवाएं जारी रखीं। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ. आनंद तिवारी के परामर्श न केवल रोग निवारण में वरन जीवन के विविध क्षेत्रों में आई समस्याओं का भी चुटकियों में समाधान करने वाले साबित होते थे। 13 सितंबर को उन्होंने इस नश्वर संसार को छोड़ दिया। उनके निधन से न सिर्फ चिकित्सा के क्षेत्र में वरन् साहित्य, कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में भी ऐसी रिक्तता आ गई है जिसकी पूर्ति संभव नहीं है।

उनके परिजनों, मित्रों, प्रशंसकों एवं नगर की संस्थाओं द्वारा आज उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है। ऐसे सहृदय, कला एवं संस्कृति प्रेमी चिकित्सक डॉ. आनंद तिवारी जी को सादर नमन।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # ३०२ ☆ अनंत चौदस पर्व: विदाई कहाँ हुई… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “अनंत चौदस पर्व: विदाई कहाँ हुई…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # ३०२ ☆

☆ अनंत चौदस पर्व: विदाई कहाँ हुई… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

☆

गौरी सुत प्रथमेश को, करिए नमन सुजान।

कृपा करें शुभ लाभ सह, रिद्धि-सिद्धि सम्मान।।

नमन पूज्य गणराज हैं, रिद्धि-सिद्धि के साथ।

लाभ सहित शुभ काज हों, मूषक वाहन नाथ।।

☆

गणेश जी का हमारे घर आना हर वर्ष किसी अपने के घर आने जैसा लगता है। गणेश चतुर्थी पर जब उन्हें सादगी से घर लाते हैं, तो स्वागत की तैयारी में बहुत कुछ नहीं चाहिए—दूर्वा, फूल, पान का पत्ता, धूप-दीप और घर के बने भोग से ही वातावरण में अपनापन उतर आता है। कुछ ही देर में लगता है, जैसे देवता के साथ घर का कोई अपना अतिथि आकर बैठ गया हो।

दस दिनों तक उनकी उपस्थिति घर की दिनचर्या में घुली रहती है। सुबह दर्शन, शाम की आरती और बीच-बीच में उनके सामने से गुजरते हुए अनायास ठहर जाना—सब सहज ही दिन का हिस्सा बन जाता है। आँगन की हरियाली भी जैसे इस संगत का हिस्सा बन जाती है। तुलसी, बेलें, गमलों में खिले फूल और पत्तियों के बीच से आती हवा—सब मिलकर उनके लिए अपना-सा परिवेश रच देते हैं।

फिर अनंत चौदस आती है।

विदाई की तैयारी करते हुए मन में एक अनकहा-सा खिंचाव होता है। जिनसे दस दिनों तक इतनी सहज निकटता रही, उन्हें अब विदा करना है। पर शायद यही जीवन का ढंग है—मिलना, साथ रहना और फिर अपने मूल की ओर लौट जाना।

हमारे यहाँ विसर्जन घर में ही होता है। स्वच्छ जल से भरे पात्र में गणेश जी को पूरे सम्मान के साथ धीरे-धीरे विदा करते हैं। पूजा की सामग्री में भी प्रकृति के जितना निकट रहा जा सके, उतना ही अच्छा लगता है। बाद में उस जल को घर के पेड़-पौधों में अर्पित कर देते हैं—कभी किसी पुराने पौधे की मिट्टी में, कभी किसी नए लगाए पौधे की जड़ों में। इस वर्ष विसर्जन के साथ कुछ नए पौधे लगाने का भी मन है। शायद यह संयोग नहीं कि गणपति की विदाई और किसी नए जीवन की शुरुआत एक ही दिन हो।

गणेश जी को विदा करने का यह ढंग किसी नियम से अधिक एक घरेलू अनुभूति है। जो हमारे घर आए, उसे प्रेम से स्थान दिया; जो लौटना है, उसे सहजता से लौटने दिया और जाते-जाते उसकी स्मृति को मिट्टी, जल और हरियाली में रहने दिया।

इसलिए अनंत चौदस के दिन जब गणेश जी जल में विलीन होते हैं, तो घर अचानक खाली नहीं लगता। पास ही कोई पत्ता हिल रहा होता है, कोई कली खिलने को होती है, किसी पौधे की मिट्टी में वही जल उतर रहा होता है।

तब मन चुपचाप पूछता है—

विदाई कहाँ हुई?

गणपति तो शायद रूप बदलकर यहीं रह गए।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४३२ ☆ एआई के क्या उपयोग हों ? ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३२ ☆

?  आलेख – एआई के क्या उपयोग हों ? ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

विश्व आर्थिक मंच की Future of Jobs Report 2025 पढ़ते हुए एक बात विशेष रूप से ध्यान खींचती है। तकनीकी बदलाव तेजी से हो रहे हैं। एआई और बिग डेटा से जुड़े कौशलों की मांग बढ़ रही है। साथ ही रचनात्मक सोच, जिज्ञासा और सीखते रहने की क्षमता को भी भविष्य के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। यानी मशीनें जितनी सक्षम होती जा रही हैं, मानवीय क्षमता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण बनी हुई है।

यहीं से एआई के बेहतर प्रयोग पर बात शुरू होती है। एआई हमारे लिए क्या-क्या कर सकता है, इसकी सूची लगातार लंबी हो रही है। लेकिन इससे भी जरूरी सवाल है, जो कुछ एआई कर सकता है, क्या वह सब कुछ उसे करने देना चाहिए?

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर पढ़ी एक पोस्ट इसी सवाल को बड़े रोचक व्यंग्यात्मक ढंग से सामने रखती है—“I want AI to do my laundry and dishes so that I can do my art and writing, not for AI to do my art and writing so that I can do my laundry and dishes.” अर्थात्, मैं चाहता हूं कि एआई मेरे कपड़े धोए और बर्तन साफ करे, ताकि मैं अपनी कला और लेखन के लिए समय निकाल सकूं। यह नहीं कि एआई मेरी कला और लेखन कर दे और मैं कपड़े धोने-बर्तन साफ करने में लगा रहूं।

बात मजाकिया है, किन्तु संदेश गंभीर है। आज कपड़े धोने की मशीन है। बर्तन साफ करने की मशीन है। खाना बनाने वाले स्वचालित उपकरण हैं। घर की सफाई करने वाले रोबोट हैं। इन उपकरणों को सेंसर, सॉफ्टवेयर और एआई से जोड़ना अब कोई दूर की कल्पना नहीं है। इसके लिए ए आई एजेंट बन चुके हैं।लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है, हमें मशीनों से केवल अपने बौद्धिक काम करवाना नहीं है, काम का सही बंटवारा  करना है।

यही एआई के बेहतर प्रयोग की पहली शर्त है। जो काम दोहराव वाले हैं, थकाऊ हैं, समय खाते हैं और जिनमें मानवीय विवेक की बहुत कम जरूरत है, उन्हें एआई को सौंपना समझदारी है। सूचनाएं छांटना, लंबे दस्तावेजों का सार निकालना, डेटा व्यवस्थित करना, नियमित रिपोर्ट तैयार करना, भाषा की त्रुटियां पकड़ना, अनुवाद में सहायता करना, बैठकों के नोट्स बनाना, यात्रा की योजना तैयार करना या सामान्य प्रश्नों के उत्तर देना, ऐसे अनेक काम हैं जिनमें एआई हमारा समय बचा सकता है।

और समय बचना मामूली उपलब्धि नहीं है। आज अधिकांश लोग समय की कमी से परेशान हैं। काम बढ़ते जाते हैं। सूचनाएं बढ़ती जाती हैं। संदेश बढ़ते जाते हैं। लेकिन दिन वही चौबीस घंटे का है। यदि एआई इस दबाव को कम कर सके तो उसका सबसे बड़ा लाभ यही होगा कि वह हमें अधिक रुचि के काम करने के लिए नहीं, बेहतर काम करने के लिए समय दे सकता है।

तकनीक का उपयोग करके यदि हम एक घंटे में वही दस काम करने लगें, जो पहले दो घंटे में करते थे, और फिर बचे हुए घंटे में दस नए काम जोड़ लें, तो हमने जिंदगी आसान नहीं की। हमने केवल अपनी व्यस्तता की गति बढ़ाई है। एआई का बेहतर प्रयोग इससे अलग होना चाहिए। वह हमें दक्ष बनाए, लेकिन लगातार व्यस्त नहीं। वह हमारी उत्पादकता बढ़ाए, लेकिन हमारी बेचैनी नहीं। वह हमारी स्मृति और गणना का बोझ कम करे, ताकि हमारी सोच अधिक गहरी हो सके।

रचनात्मकता के क्षेत्र में भी यही संतुलन जरूरी है। लेखक के लिए एआई विचारों को व्यवस्थित कर सकता है, शोध सामग्री खोजने में सहायता कर सकता है और भाषा सुधार सकता है, लेकिन लेखक की अपनी मौलिक आवाज बनी रहनी चाहिए। कलाकार के लिए एआई नए विकल्प दिखा सकता है और प्रयोगों को आसान बना सकता है, लेकिन कलाकृति की दृष्टि और अंतिम चयन कलाकार का ही होना चाहिए। शिक्षक के लिए एआई पाठ तैयार कर सकता है और विद्यार्थियों के स्तर के अनुसार अभ्यास बना सकता है, लेकिन विद्यार्थी की जिज्ञासा और उसकी व्यक्तिगत परिस्थिति को समझने वाला शिक्षक ही होगा।

यानी एआई को उत्तर देने वाली मशीन से आगे बढ़ाकर सोचने में मदद करने वाला साथी बनाना होगा। मशीन गति दे, मनुष्य दिशा दे। मशीन विकल्प दे, मनुष्य चयन करे। मशीन सूचना दे, मनुष्य उसका अर्थ समझे। मशीन दोहराव वाले काम संभाले, मनुष्य नया सृजन करे।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के 2025 के विश्लेषण में भी संकेत मिलता है कि जनरेटिव एआई का प्रभाव अनेक नौकरियों को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय उनके भीतर किए जाने वाले कार्यों को बदलने के रूप में अधिक दिखाई दे सकता है। इसलिए चुनौती केवल यह नहीं है कि मशीन क्या करेगी। चुनौती यह भी है कि मनुष्य की भूमिका किस दिशा में बदलेगी।

इस बदलाव को दिशा देना हमारे हाथ में है। यदि एआई से मिला अतिरिक्त समय हम और अधिक ईमेल, और अधिक मीटिंग और और अधिक काम में लगा देंगे, तो हमने मिला समय और  अवसर गंवा दिया। लेकिन यदि वही समय हम सीखने, सोचने, लिखने, परिवार, मित्रों, कला, प्रकृति और अपने भीतर के संसार को दे सकें, तो एआई का उपयोग कहीं बड़ा हो सकता है।

तब एआई केवल उत्पादकता का औजार नहीं रहता। वह समय को सार्थक बनाने का साधन बन जाता है।

भविष्य में एआई के मूल्यांकन का सबसे सार्थक प्रश्न शायद यही होगा ,उसने हमसे कितना काम करवाया, यह नहीं! उसने हमें कितना बेहतर काम और बेहतर जीवन जीने का अवसर दिया।

कपड़े धुल जाएं। बर्तन साफ हो जाएं। खाना बन जाए। कागज व्यवस्थित हो जाएं। आंकड़े समझ में आ जाएं। लेकिन कविता हम लिखें। चित्र हम बनाएं। सपने हम देखें। निर्णय हम लें। जीवन हम जिएं।

क्योंकि एआई का सर्वोत्तम उपयोग मनुष्य की जगह लेना नहीं है। मनुष्य को उसकी बेहतर संभावनाओं तक पहुंचाना है।

ए आई का हौआ वे ही खड़ा कर रहे दिखते हैं, जो उसे समझते नहीं है, ए आई को दोस्त बनाना   समय की जरुरत है।

एआई काम संभाले, हम दिशा संभालें।

एआई समय बचाए, हम उस समय को जीवन में बदलें।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ११०१ ⇒ सुदामा चरित्र… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सुदामा चरित्र…“।)

?अभी अभी # ११०१ ⇒ आलेख – सुदामा चरित्र ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सुदामा भगवान कृष्ण के बचपन के सखा थे। वे श्री कृष्ण के अनन्य भक्त तो थे ही लेकिन कुछ कथा वाचकों और भजन गायकों ने उनके साथ गरीब ब्राह्मण का विशेषण भी लगा दिया। कृष्ण और सुदामा की कहानी सिर्फ एक अमीर और गरीब मित्र की दास्तान बनकर रह गई। आज भी हर सुदामा यही चाहता है उसे भी जीवन में कोई श्री कृष्ण जैसा सखा, मित्र अथवा दोस्त मिले।

सांसारिक मित्रता में दोस्ती तक तो ठीक है लेकिन किसी अमीर मित्र के प्रति सुदामा की तरह भक्ति भाव अथवा अनन्य भाव का होना बड़ा मुश्किल है। हमने तो मित्रता की एक ही परिभाषा बना रखी है सच्चा दोस्त वही जो मुसीबत में काम आए।।

सुदामा चरित, कवि नरोत्तमदास द्वारा ब्रज भाषा में लिखा गया एक काव्य ग्रंथ है. इसमें निर्धन ब्राह्मण सुदामा की कहानी है, जो भगवान कृष्ण के बचपन के मित्र थे. सुदामा की कहानी श्रीमद् भागवत महापुराण में भी मिलती है।

आज की सांसारिक परिभाषा में सुदामा दीनता, निर्धनता, साधुता और सरलता का प्रतीक है। सुदामा के सखा श्रीकृष्ण की ऊंचाइयों तक तो खैर यह इंसान कभी पहुंच ही नहीं सकता, केवल उनके गुणगान कर, भक्ति भाव में आकंठ डूब, शरणागत हो सकता है।।

मेरे शहर में शिक्षक कल्याण संघ ने पहले एक गृह निर्माण संस्था बनाई और फिर शिक्षकों के लिए सुदामा नगर का निर्माण शुरू हो गया। सरकार भी इन शिक्षकों पर मेहरबान हुई और सस्ते दर पर इन्हें जमीन उपलब्ध करा दी गई और जल्द ही इस सुदामा नगर का नाम एशिया की सबसे बड़ी अवैध कॉलोनी के रूप में विख्यात हो गया।

वैसे तो हर भक्त पर द्वारकाधीश मेहरबान होते हैं, लेकिन जब उनके मित्र सुदामा की बारी आती है तब तो वे कुछ खास ही मेहरबान हो ही जाते हैं। आज की तारीख में सुदामा नगर एक सुव्यवस्थित, सुविधा संपन्न कॉलोनी है, जहां किसी तरह का अभाव नहीं। आपको लगेगा आप मानो कृष्ण की द्वारका में ही आ गए हैं। सुदामा नगर के बढ़ते प्रभाव के कारण पास की फूटी कोठी के भी भाग जाग गए, वह पुखराज कोठी हो गई।

और हमारे ठाकुर जी अपने परम मित्र सुदामा को तो महल में रखते हैं और खुद बालस्वरूप में मथुरा, वृंदावन गोकुल, नंदगांव और मथुरा में बाल लीलाएं करते हैं, गोपियों संग रास रचाते हैं, और बांसुरी बजाते हैं।

आज के कलयुग में भी अगर आपको कृष्ण और सुदामा की लीला देखना हो तो कभी सुदामा नगर चले जाएं, वहां आपको दिव्यता और भव्यता के ही दर्शन होंगे। उसी सुदामा नगर के आसपास एक द्वारकापुरी कॉलोनी भी है, जो सुदामानगर की तुलना में बहुत छोटी है। उस कृपानिधान की लीला ही कुछ ऐसी है। उसका बस चले तो अपने भक्त पर तीनों लोक वार दे। सुदामा नगर बनाना आसान है, सुदामा बनना नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वंदेमातरम् : औपनिवेशिक प्रतिरोध की साहित्यिक आवाज़ ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – वंदेमातरम् : औपनिवेशिक प्रतिरोध की साहित्यिक आवाज़।)

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय

☆ आलेख – वंदेमातरम् : औपनिवेशिक प्रतिरोध की साहित्यिक आवाज़ ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

साहित्य केवल मनोरंजन या सौन्दर्य की अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं होता,वह इतिहास के निर्णायक क्षणों में समाज व राष्ट्र के अंतर्मन को भी स्वर प्रदान करता है। भारत के ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर में साहित्य ने इसी प्रकार राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 07 नवम्बर 1875 ई० को बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित राष्टगीत ‘ वंदेमातरम् ‘ साहित्यिक पत्रिका ‘ बंग दर्शन ‘ में प्रकाशित हुआ था तदन्तर सन् 1882 ई० में उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘ आनंदमठ ‘ में शामिल किया गया था। सन् 1896 ई० में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में संगीत के साथ गाया था। सन् 1905 ई० में बंग-भंग विरोधी आंदोलन में यह व्यापक राजनीतिक उद्घोष बन गया और संविधान सभा द्वारा स्वतन्त्रता के पश्चात् 24 जनवरी 1950 ई० को इसे राष्ट्रगीत का दर्ज़ा दिया गया। उन्नीसवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक पराधीनता, आर्थिक शोषण और सामाजिक-सांस्कृतिक संक्रमण से गुजर रहा था। अंग्रेजी शासन ने प्रशासनिक और राजनीतिक  नियंत्रण के साथ-साथ ऐसी औपनिवेशिक दृष्टि भी विकसित की, जिसमें भारतीय समाज को पिछड़ा और अक्षम सिद्ध करने की प्रवृत्ति दिखाई देती थी। ऐसे संक्रमणशील वातावरण में बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने उपन्यास, निबंध और कविता के माध्यम से भारतीय समाज के सम्मुख उसकी सांस्कृतिक शक्ति और आत्मबोध के प्रश्न रखे। ‘ वंदेमातरम् ‘ इसी वैचारिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण परिणाम था।

‘वंदेमातरम्’ की सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक विशेषता मातृभूमि का मानवीकरण है। माता का सम्बोधन राष्ट्र के साथ भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित करता है। उन्होंने राष्ट्र को केवल भौगोलिक भूखण्ड न मानकर भावनात्मक,सांस्कृतिक और नैतिक सम्बन्ध में रूपांतरित किया। मातृभूमि के प्रति ये श्रद्धा का भाव धीरे-धीरे औपनिवेशिक शासन के प्रति असहमति और स्वतंत्रता की आकांक्षा से जुड़ गया। इस राष्ट्रगीत में  प्रकृति और राष्ट्र एक-दूसरे के पूरक हैं। धरती मातृरूप में आती है, हरे-भरे खेत राष्ट्र  समृद्धि का संकेत बनते हैं, जल जीवन और उर्वरता का प्रतीक बनता है, वायु स्वतंत्र और जीवंत जीवन का बिम्ब बनती है ,शक्ति और सौन्दर्य राष्ट्र की सामर्थ्य तथा सांस्कृतिक गरिमा को व्यक्त करते हैं। इस प्रकार प्रकृति वर्णन राजनीतिक अर्थ ग्रहण करता है। जिस भूमि पर विदेशी सत्ता का अधिकार है,वही भूमि साहित्य में माता के रूप में प्रतिष्ठित होती है। यही परिवर्तन औपनिवेशिक सत्ता की वैधता के सामने एक सांस्कृतिक प्रतिप्रश्न उपस्थित करता है। वंदेमातरम् का उद्घोष इसलिए भी प्रभावशाली बना क्योंकि वह तर्क से पहले संवेदना को सम्बोधित करता था। वह व्यक्ति को नागरिक या प्रजा के रूप में नहीं अपितु मातृभूमि की संतान के रूप में देखने की प्रेरणा देता था। यही साहित्यिक रणनीति उसे जनचेतना में गहराई तक ले गई। आनंदमठ उपन्यास में भी मातृभूमि की कल्पना राष्ट्रीय मुक्ति के विचार से जुड़ती है परिणामस्वरूप वंदेमातरम् केवल गीत न रहकर कथा के वैचारिक वातावरण का प्रतिनिधि बन पाता है। साहित्य की यही शक्ति है कि वह विचार को पात्रों,घटनाओं,प्रतीकों और भावनाओं के माध्यम से पाठक को अनुभव का हिस्सा बना देता है।

     सन् 1896 ई०को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा संगीत के साथ वंदेमातरम् का गायन एक महत्वपूर्ण घटना है,जिसने इस गीत को केवल साहित्यिक पाठक वर्ग तक सीमित नहीं रखा अपितु वह राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर पहुँच गया। महान कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का गायन इस गीत के साहित्यिक व सांस्कृतिक प्रभाव को विस्तृत करता है, संगीत ने स्मरणीय बनाया, सामूहिक गायन ने इसे सामाजिक अनुभव में बदल दिया। इसी प्रकार 1905 ई० में बंगाल विभाजन भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के इतिहास में महत्वपूर्ण घटना थी,जिसमें वंदेमातरम् एक प्रभावशाली प्रतिरोध उद्घोष के रूप में सामने आया। 07 अगस्त 1905 ई०को वंदेमातरम् का राजनीतिक नारे के रूप में प्रयोग हुआ और अक्टूबर 1905 ई०में इसके प्रसार के लिए ‘ वंदेमातरम् सम्प्रदाय ‘ जैसी संस्था बनी, जिसके सदस्य प्रभात फेरियों में इसे गाते थे। इन गतिविधियों के कारण यह गीत जनसंस्कृति का हिस्सा बन गया। यही सामूहिकता औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध जनमनोबल का आधार बनी। गीत से उद्घोष बनने की यात्रा में वंदेमातरम् की भाषिक संक्षिप्तता और भावनात्मक तीव्रता की विशेषता भी है,जिसके कारण छोटा-सा उद्घोष सामूहिक भावनाओं को व्यक्त करने में सक्षम हुआ। जब कोई व्यक्ति अकेले वंदेमातरम् गाता है तो वह अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान व्यक्त करता है और जब हजारों लोग उद्घोष करते हैं तो वही शब्द सामूहिक अस्मिता का प्रतीक बन जाता है। धीरे-धीरे यही गीत स्वतंत्रता आन्दोलन की पहचान से जुड़ गया।

      अंतत: हम कह सकते हैं कि साहित्य प्रत्यक्ष राजनीतिक कार्यवाही का विकल्प नहीं होता किन्तु वह उन भावनाओं और विचारों को जन्म दे सकता है, जिनसे सामाजिक परिवर्तन की ऊर्जा उत्पन्न होती है। एक राजनीतिक आंदोलन को केवल संगठन नहीं बल्कि साझा कल्पना की भी आवश्यकता होती है। वंदेमातरम् ने भारत की ऐसी कल्पना प्रस्तुत की, जिसमें राष्ट्र एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई था। औपनिवेशिक शासन के सामने प्रतिरोध करने के लिए केवल राजनीतिक संगठन पर्याप्त नहीं था। जनता के भीतर यह विश्वास उत्पन्न करना भी आवश्यक था कि वह स्वयं को बदल सकती है और स्वतंत्र भविष्य की कल्पना कर सकती है। वंदेमातरम् ने इसी मनोवैज्ञानिक स्तर पर प्रभाव डाला और औपनिवेशिक प्रतिरोध की साहित्यिक आवाज़ बन गया। मातृभूमि की प्रतिष्ठा, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, सामूहिकता,स्वतंत्रता की आकांक्षा तथा भारत को हीन मानने वाली दृष्टि के सामने भारतीय आत्मसम्मान को स्थापित करना आदि अनेक प्रतिरोध के आयाम हैं। इन तत्वों ने ही स्वतंत्रता आन्दोलन की सांस्कृतिक भाषा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया था। इस प्रकार वंदेमातरम् भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का केवल एक गीत ही नहीं था अपितु उस युग के आत्मसम्मान, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वतंत्रता आकांक्षा की साहित्यिक अभिव्यक्ति था।

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©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ११०० ⇒ आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह…“।)

?अभी अभी # ११०० ⇒ आलेख – आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ लोग आग्रह के तो बहुत कच्चे होते हैं, लेकिन पूर्वाग्रह के बहुत पक्के । आग्रह एक ऐसा ग्रह है जो खुशामद पसंद है, आपका पेट भरा है फिर भी कोई प्यार से आपको एक रसगुल्ला खिला दे, रास्ते में एक अनजान सज्जन मिलते हैं, परिचय होता है, दिल मिलता है, और ऐसा आग्रह होता है कि आप उनके घर चाय के प्याले का आमंत्रण ठुकरा नहीं पाते । हमारे घर आना राजा जी ! क्या इस गीत में आपको आग्रह नजर नहीं आता ।

पूर्वाग्रह और दुराग्रह तो नाम से ही राहु केतु अथवा जुड़वा भाई लगते हैं । पूर्वाग्रह शब्द से ऐसा भ्रम होता है मानो यह आग्रह से पूर्व की स्थिति है । लेकिन ऐसा कुछ नहीं है । पूर्वाग्रह का आग्रह से कोई लेना देना नहीं है । अगर आग्रह का बस चले तो वह अख़बार में ज़ाहिर सूचना प्रकाशित करवा दे कि मेरा पूर्वाग्रह और दुराग्रह से दूर का भी रिश्ता नहीं है ।।

किसी व्यक्ति अथवा वस्तु के बारे में पहले से ही कोई गलत धारणा बना लेना पूर्वाग्रह है । अज्ञान, अंध विश्वास और सही जानकारी के अभाव में भी यह स्थिति निर्मित हो सकती है । सिक्के के केवल एक ही पहलू की जानकारी रखना पूर्वाग्रह की स्थिति है । लगातार एक ही प्रकार की विचारधारा से प्रभावित होने के कारण भी व्यक्ति पूर्वाग्रह से ग्रसित हो सकता है ।

संकुचित मानसिकता, संकीर्ण विचार और मन की अनुदार स्थिति से भी व्यक्ति पूर्वाग्रह का शिकार हो सकता है । यह एक लाइलाज बीमारी है । हमने कुछ ऐसे भ्रम जीवन में पाले हुए हैं, जिन्हें हम अपना आदर्श समझने लगे हैं । जब भी स्वस्थ, उन्मुक्त विमर्श होता है, हमारा दुराग्रह झलकने लगता है । जी हां, जो कभी पूर्वाग्रह था, उसने अब तक जड़ पकड़ ली है । दुराग्रह का वृक्ष फल फूल रहा है । घृणा और नफरत की भावना के अलावा और कुछ नहीं पनपता पूर्वाग्रह और दुराग्रह के जंगल में।।

आप जिस व्यक्ति से सहमत होते हैं वहां एक आग्रह होता है प्रेम, आस्था और विश्वास का । आपका मन जिस बात को स्वीकार नहीं कर रहा, वहां भी आपका उदार दृष्टिकोण नजर आता है । अच्छा, ऐसा है क्या । मैं तो कुछ और ही समझा था । कहीं कहीं तो भरोसा नहीं होने पर भी बात बिगड़ती नहीं । पहले तथ्यों को परखा जाता है।

लेकिन जहां पहले से ही असहमति है, मनमुटाव है, वहां किसी भी बात पर सच के पहले पूर्वाग्रह झांकने लग जाएगा । क्योंकि वहां भावना नहीं, दुर्भावना काम कर रही है । राजनीति और धर्म जो कभी आग्रह के सोपान थे, आज पूर्वाग्रह और दुराग्रह के रास्ते में भटक रहे हैं । यहां स्वस्थ संवाद, खुली बहस और पारदर्शिता वर्जित है । लकीर के फ़कीर बने रहें अथवा कुएं के मेंढक । बहुत सुखी रहेंगे ।।

इन तीन ग्रहों से भी ऊपर, एक ग्रह और है जिसका पेटेंट गांधीजी के पास था । जी हां, सत्याग्रह ! उन्होंने केवल सत्य के प्रयोग ही नहीं किए, सत्य का आग्रह भी किया । अंग्रेजों के खिलाफ यह हथियार कारगर भी हुआ हो, लेकिन आजादी के बाद यह आग्रह बहुत भारी पड़ने लगा । जगह जगह धरना, भूख हड़ताल, आमरण अनशन और आत्म दाह की धमकी ।

याद कीजिए, राजनीतिक पदयात्राएं, रथयात्राएं और अन्ना हजारे का सन 2011 में लोकपाल विधेयक आंदोलन । जिसमें जंतर मंतर पर अनशन में इनके साथ अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और सुप्रीम कोर्ट के आज के मानहानि पुरुष प्रशांत भूषण भी शामिल थे। लेकिन इसी आग्रह ने देश की तस्वीर बदल दी और जनता ने देश को कांग्रेस के पजों से छीनकर मोदी जी को तश्तरी में पेश कर दिया ।।

चार ग्रहों की यह तस्वीर आपको कैसी लगी । आपसे आग्रह है पूर्वाग्रह और दुराग्रह से मुक्त हो, केवल सत्य का आग्रह करें, सत्याग्रह, धरने अथवा अनशन का नहीं । जब तक सत्य का पता न चले, पूर्वाग्रह न पालें, दुराग्रह तो कतई नहीं ।

जहां शुद्धता की कोई गारंटी नहीं, नीर, क्षीर, विवेक का कोई संसाधन नहीं, केवल पूर्वाग्रह मुक्त हीरे की पारखी नजर ही काम आ सकती है । हम जानते हैं आप भी आग्रह के कच्चे हैं ..मन के सच्चे हैं ..!!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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