image_print

आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (42) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन)   संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ।।42।। कुलघाती संतान से पितृ पिण्ड का दान हो पाता नियमित नहीं पितरों का सम्मान।।42।। भावार्थ :  वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं।।42।। Confusion of castes leads to hell the slayers of the family, for their forefathers fall, deprived of the offerings of rice-ball and water. ।।42।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
Read More

आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (41) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन) अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥41॥ होता सदा अधर्म से कुल स्त्रियों में दोष दुष्टाओं में वर्ण संकरों से बढता जन रोष।।41।। भावार्थ :  हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है॥41॥ By prevalence of impiety, O Krishna, the women of the family become corrupt and, women becoming corrupted, O Varsneya (descendant of Vrishni), there arises intermingling of castes. ॥41॥   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
Read More

आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (40) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन) कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥40॥ कुल विनाश से सहज है कुल धर्मो का नाश धर्म नष्ट होता तो फिर सहज अधर्म विकास।।40।। भावार्थ :  कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है ॥40॥   In the destruction of a family, the immemorial religious rites of that family perish; on the destruction of spirituality, impiety overcomes the whole family. ॥40॥   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
Read More

आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (38-39) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन)   यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌।।38।।   कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ।।39।।   लोभ भरी हुई दृष्टि से हो ये अंधे आप इन्हें न दिखता ,मित्र वद्य कुल विनाश में पाप।।38।।   कुल विनाश के दोष का लखकर फिर सरकार पाप से बचने के लिये क्यों न करें उपचार।।39।।   भावार्थ :  यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए?॥38-39॥   Though they, with intelligence overpowered by greed, see no evil in the destruction offamilies, and no sin in hostility to friends. Why should not we, who clearly see evil in the destruction of a family, learn to turn away from this sin, O Janardana (Krishna)?...
Read More

आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (37) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन) तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌। स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ।।37।। इन स्वजनों धृतराष्ट्रों का तो उचित नही वध तात कैसे सुख दे पायेगा,अपनों का आघात।।37।। भावार्थ :  अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?॥37॥ Therefore, we should not kill the sons of Dhritarashtra, our relatives; for, how can we be happy by killing our own people, O Madhava (Krishna)? ।।37।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
Read More

आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (36) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन) निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । पापमेवाश्रयेदस्मान्‌हत्वैतानाततायिनः।।36।। धृतराष्ट्रों को मारकर क्या हित होगा श्याम वध इन आताताइयों का होगा पाप का काम।।36।। भावार्थ :  हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा॥36॥   By killing these sons of Dhritarashtra, what pleasure can be ours, O Janardana? Only sin will accrue by killing these felons.।।36।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
Read More

आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (35) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन) एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ।।35।। इन्हें मारना कब उचित,चाहे खुद मर जाऊं धरती क्या,त्रयलोक का राज्य भले मैं पाऊं।।35।।   भावार्थ :  हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है?॥35॥   These I do not wish to kill, though they kill me, O Krishna, even for the sake of dominion over the three worlds, leave alone killing them for the sake of the earth! ।।35।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yah oo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
Read More

आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (34) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन)   आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा ॥   पिता,पितामह,पुत्र औ" सब गुरूजन हो अंध भूल ससुर साले तथा मामा के संबंध।।34।।   भावार्थ :  गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी संबंधी लोग हैं ॥34॥   There are teachers, fathers, sons and also grandfathers, grandsons, fathers-in-law, maternal uncles, brothers-in-law and relatives.।।34।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yah oo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
Read More

आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (33) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन ) येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ सुख,भोगों औ" राज्य की जिनके हित थी चाह वे सब उतरे युद्ध में तज,तन धन परवाह।।33।।   भावार्थ :  हमें जिनके लिए राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं॥33॥   Those for whose sake we desire kingdoms, enjoyments and pleasures, stand here in battle, having renounced life and wealth ।।33।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yah oo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
Read More

आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (32) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन )   न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा ॥32॥ नहीं विजय की कामना, न ही राज सुख चाह न ही राज्य वैभव तथा जीवन की परवाह।।32।। भावार्थ :  हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविंद! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है?॥32॥   For I desire neither victory, O Krishna, nor pleasures nor kingdoms! Of what avail is a dominion to us, O Krishna, or pleasures or even life? ॥32॥   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yah oo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
Read More
image_print