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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ भूकंप ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) ☆ संजय दृष्टि  ☆ भूकंप ☆ पहले धरती में कंपन अनुभव हुआ। फिर तने जड़ के विरुद्ध बिगुल फूँकने लगे। इमारत हिलती-सी प्रतीत हुई। जो कुछ चलायमान था, सब डगमगाने लगा। आशंका का कर्णभेदी स्वर वातावरण में गूँजने लगा, हाहाकार का धुआँ अस्तित्व को निगलने हर ओर छाने लगा। उसने मन को अंगद के पाँव-सा स्थिर रखा। धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य होने लगा। अब...
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English Literature ☆ Stories ☆ Weekly Column – Samudramanthanam – 21 – Lakshmi ☆ Mr. Ashish Kumar

Mr Ashish Kumar (It is difficult to comment about young author Mr Ashish Kumar and his mythological/spiritual writing.  He has well researched Hindu Philosophy, Science and quest of success beyond the material realms. I am really mesmerized.  I am sure you will be also amazed.  We are pleased to begin a series on excerpts from his well acclaimed book  “Samudramanthanam” .  According to Mr Ashish  “Samudramanthanam is less explained and explored till date. I have tried to give broad way of this one of the most important chapter of Hindu mythology. I have read many scriptures and take references from many temples and folk stories, to present the all possible aspects of portrait of Samudramanthanam.”  Now our distinguished readers will be able to read this series on every Saturday.)     Amazon Link – Samudramanthanam  ☆ Weekly Column – Samudramanthanam – 21 – Lakshmi☆  Now green color lotus emerges from ocean over which another form of Goddess was sitting.  She was Santana Lakshmi ("Progeny Lakshmi ") is the goddess of...
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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – पंचदश अध्याय (20) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ पुरूषोत्तम योग (संसार वृक्ष का कथन और भगवत्प्राप्ति का उपाय) (क्षर, अक्षर, पुरुषोत्तम का विषय)   इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद्‍बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ।।20।।   इस प्रकार यह शास्त्र गुण मुझे बताया पार्थ जिसे जान सब विज्ञजन लेते अमित कृतार्थ।।20।।   भावार्थ :  हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह अति रहस्ययुक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको तत्त्व से जानकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है।।20।।   Thus, this most secret science has been taught by Me, O sinless one! On knowing this, a man becomes wise, and all his duties are accomplished, O Arjuna!।।20।।   ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥15॥   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – पंचदश अध्याय (6) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ पुरूषोत्तम योग (संसार वृक्ष का कथन और भगवत्प्राप्ति का उपाय)   न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।।6।। सूर्य, शषी, पावक की भी आभारहित मुकाम जिसे प्राप्त कर लौटते नहीं वो सेवा धाम ।।6।।   भावार्थ :  जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम ('परम धाम' का अर्थ गीता अध्याय 8 श्लोक 21 में देखना चाहिए।) है।।6।।   Neither doth the sun illumine there, nor the moon, nor the fire; having gone thither they return not; that is My supreme abode.।।6।।   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (26) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ चतुर्दश अध्याय गुणत्रय विभाग योग (भगवत्प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण)   मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्येतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ।।26।।   अचल भक्ति रस जो सदा करता मेरा ध्यान वह ही है गुणातीत सच होता ब्रह्म समान।।26।। भावार्थ :  और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर वासुदेव भगवान को ही अपना स्वामी मानता हुआ, स्वार्थ और अभिमान को त्याग कर श्रद्धा और भाव सहित परम प्रेम से निरन्तर चिन्तन करने को 'अव्यभिचारी भक्तियोग' कहते हैं) द्वारा मुझको निरन्तर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिए योग्य बन जाता है ।।26।।   And he who serves me with unswerving devotion, he, crossing beyond the qualities, is fit for becoming Brahman.।।26।।   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (24) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ चतुर्दश अध्याय गुणत्रय विभाग योग (भगवत्प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण) समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ।।24।।   सुख दुख को सम मानता, मिट्टी स्वर्ण समान प्रिय अप्रिय में तुल्यता, निंदा स्तुति समान।।24।। भावार्थ :  जो निरन्तर आत्म भाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निन्दा-स्तुति में भी समान भाव वाला है।।24।।   Alike in pleasure and pain, who dwells in the Self, to whom a clod of earth, stone and gold are alike, to whom the dear and the unfriendly are alike, firm, the same in censure and praise,।।24।।   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (22) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ चतुर्दश अध्याय गुणत्रय विभाग योग (भगवत्प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण) श्रीभगवानुवाच प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ।।22।। भगवान ने कहा- सत,रज,तम गुण किसी से जिसे न दुःख न द्वेष होने न होने से भी जिसे न कोई कलेश।।22।। भावार्थ :  श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश (अन्तःकरण और इन्द्रियादि को आलस्य का अभाव होकर जो एक प्रकार की चेतनता होती है, उसका नाम 'प्रकाश' है) को और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को तथा तमोगुण के कार्यरूप मोह (निद्रा और आलस्य आदि की बहुलता से अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतन शक्ति के लय होने को यहाँ 'मोह' नाम से समझना चाहिए) को भी न तो प्रवृत्त होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है। (जो पुरुष एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही नित्य, एकीभाव से स्थित हुआ इस त्रिगुणमयी माया के प्रपंच रूप संसार से सर्वथा अतीत हो...
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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (21) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ चतुर्दश अध्याय गुणत्रय विभाग योग (भगवत्प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण) अर्जुन उवाच कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ।।21।। अर्जुन ने पूछा-  तीनों गुणो से परे जो उसकी क्या पहचान गुणातीत हो सकने का भगवन क्या है ज्ञान ।।21।।   भावार्थ :  अर्जुन बोले- इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन-किन लक्षणों से युक्त होता है और किस प्रकार के आचरणों वाला होता है तथा हे प्रभो! मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है?।।21।।   What are the marks of him who has crossed over the three qualities, O Lord? What is his conduct and how does he go beyond these three qualities?।।21।।   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८...
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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (20) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ चतुर्दश अध्याय गुणत्रय विभाग योग (भगवत्प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण) गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ।।20।। देह जनित तीनों गुणो से उपर उठ प्राण जन्म-मृत्यु दुखजस सेपा सकता निर्वाण।।20।।   भावार्थ :  यह पुरुष शरीर की (बुद्धि, अहंकार और मन तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत, पाँच इन्द्रियों के विषय- इस प्रकार इन तेईस तत्त्वों का पिण्ड रूप यह स्थूल शरीर प्रकृति से उत्पन्न होने वाले गुणों का ही कार्य है, इसलिए इन तीनों गुणों को इसी की उत्पत्ति का कारण कहा है) उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है।।20।।   The embodied one, having crossed beyond these three Gunas out of which the body is evolved, is freed from birth, death, decay and pain, and attains to immortality.।।20।।   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८...
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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (18) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ चतुर्दश अध्याय गुणत्रय विभाग योग (सत्, रज, तम- तीनों गुणों का विषय)   ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ।।18।। सतोगुणी की उच्च गति, रजोगुणी की मध्य धृवित वृतित क तामसी, अधोगति बीच विरूद्ध ।।18।।   भावार्थ :  सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं, रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते हैं और तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं।।18।।   Those who are seated in Sattwa proceed upwards; the Rajasic dwell in the middle; and the Tamasic, abiding in the function of the lowest Guna, go downwards.।।18।।   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८ vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८    ...
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