हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 16 – संजीवनी ☆ – श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

 

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “संजीवनी।)

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 16 ☆

 

☆ संजीवनी

 

रावण ने उत्तर दिया, “एक राक्षस है जो यह कर सकता है और वह है मेरा चाचा कालनेमि (अर्थ : काल का अर्थ है समय और नेमि का अर्थ नियम है, इसलिए कालनेमि का अर्थ हुआ काल का शासक या जो काल या समय के नियमों को बदल सकता है)

रावण स्वयं ही कालनेमि के महल की ओर गया, और पहुँचने के बाद, उसने कालनेमि से कहा, “चाचा कालनेमि, आप बहुत विशेष प्रकार के राक्षस हैं। समय के नियम आपको बांध नहीं सकते हैं। आप समय से परे जाने के लिए अपने नियम स्वयं बना सकते हैं। आप वायुमंडल की समानांतर परतों के बीच उड़ान भर सकते हैं। आप दूर स्थानों पर खुद को परिवहन कर सकते हैं । संक्षेप में, आप समय को पूर्ण रूप से नियंत्रण कर सकते है क्योंकि आपके नाम ‘कालनेमि’ का अर्थ ही है वह जो अपने लिए समय के अलग नियम बना सके? आज लंका को आपकी सहायता की आवश्यकता है। आप जानते हैं कि हमने आज तक आपको परेशान नहीं किया है, और अब हमारे और राम के बीच युद्ध बहुत ही महत्वपूर्ण चरण में है । लंका के लगभग सभी योद्धा मर चुके हैं, और अब केवल मेघनाथ और मैं ही जीवित हैं । मेघनाथ ने राम के भाई लक्ष्मण को मार दिया है। लेकिन उस दोषपूर्ण विभीषण और सुषेण वैद्य ने हनुमान को कुछ सुझाव दिया है जो लक्ष्मण के जीवन को बचा सकता है और वापस ला सकता है। हनुमान पहले ही सुषेण वैद्य द्वारा बतायी हुई जड़ी बूटी लेने के लिए हिमालय की ओर कूच कर चूका है। समय के नियमों को बदलने के लिए विशेष गुणों के कारण आप हनुमान से तेज़ी से आगे बढ़ सकते हैं। तो यह हमारा आदेश है आप सूर्योदय तक वहीं कहीं हनुमान को रोक कर रखें। आपको उसके साथ लड़ने की आवश्यकता नहीं है। आपको बस उसे कुछ समय के लिए रोकना होगा”

कालनेमि ने उत्तर दिया, “हवा के प्रवाह अर्थात हनुमान को कौन रोक सकता है? लेकिन मैं विभीषण की तरह आपको और लंका को धोखा नहीं दे सकता, मैं जाऊँगा और हनुमान को रोकने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करूँगा”

 

© आशीष कुमार  

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – 7. राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

हम  “संजय दृष्टि” के माध्यम से  आपके लिए कुछ विशेष श्रंखलाएं भी समय समय पर प्रकाशित  करते रहते हैं। ऐसी ही एक श्रृंखला दीपोत्सव पर “दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप” तीन दिनों तक आपके चिंतन मनन के लिए प्रकाशित  की गई थी।  31 अक्टूबर 2019 को स्व सरदार वल्लभ भाई पटेल जी का जन्मदिवस  था जो राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं।  इस अवसर पर श्री संजय भारद्वाज जी का आलेख  “राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका”  एक विशेष महत्व रखता है।  इस लम्बे आलेख की यह अंतिम कड़ी है ।  हमें पूर्ण विश्वास है आप इसमें निहित विचारों को गंभीरता पूर्वक आत्मसात करेंगे।

– हेमन्त बावनकर

☆ संजय दृष्टि  –  7.  राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका 

लोकसंस्कृति, सृष्टि को युग्मराग मानती है। सृष्टि, प्रकृति और पुरुष के युग्म का परिणाम है। स्त्री प्रकृति है। स्त्री एकात्मता की दूत है। मायके से ससुराल आती है, माँ से, मायके से स्वाभाविक रूप से एकात्म होती है। इसी एकात्म भाव से ससुराल से एकरूप हो जाती है। स्त्रियाँ केवल समझती नहीं अपितु माँ बनकर विस्तार करती हैं एकात्मता का। लोक में वस्तुओं के विनिमय की पद्धति का विकास महिलाओं ने बहुतायत से किया। आवश्यकता पड़ने पर पुरुषों से छिपकर ही सही, कथित निचले वर्ग  या विजातीय स्त्रियों के साथ लेन-देन किया। त्योहारों में मिठाई के आदान-प्रदान में विधर्मियों के साथ व्यवहार की वर्जना को स्त्रियों ने सूखे अनाज के बल पर कुंद किया। तर्क यह कि अनाज, धरती की उपज है और धरती तो सबके लिए समान है। यह अद्वैत दृष्टि, यह एकात्मता अनन्य है।

मनुष्य विकारों से मुक्त नहीं हो सकता। स्वाभाविक है कि लोक भी इसका अपवाद नहीं हो सकता लेकिन वह गाँठ नहीं बांधता। किसी कारण से किसी से द्वेष हो भी गया तो उसकी नींव पक्की होने से पहले विरोधी से होली पर गले मिल लेता है, दिवाली पर धोक देने चला जाता है। जैन दर्शन का क्षमापना पर्व भी इसी लोकसंस्कृति का एक गरिमापूर्ण अध्याय है।

लोक और प्रकृति में समरसता है, एकात्म है। लोक ‘क्षिति, जल, पावक, गगन, सरीरा, पंचतत्व से बना सरीरा’ के अनुसार इन्हीं तत्वों को सृष्टि के विराट में देखता है। सूक्ष्म को विराट में देखना, आत्मा को परमात्मा का अंश मानना, एकात्मता की इससे बेहतर कोई परिभाषा हो सकती है क्या?

प्रकृति के साथ की इसी एकात्मता के चलते महाराष्ट्र में ‘देवराई’ अर्थात संरक्षित वनों की परंपरा बनी। कोंकण और अन्य भागों में देवराई के वृक्षों को हाथ नहीं लगाया जाता। देश के पहाड़ी अंचलों में भी ‘देव-वन’ हैं, जिनमें रसोईघर की तरह चप्पल पहन कर आना वर्जित है।

राजस्थान का बिश्नोई समाज काले मृग के रूप में अपने पूर्वज का पुनर्जन्म देखता है। प्राणी को हत्या से बचाने का यह विश्वास प्रकृति के घटकों के संरक्षण में अद्भुत भूमिका निभाते हैं।

आदिवासियों की अनेक जनजातियाँ, पेड़ की नीचे गिरी सूखी लकड़ी और टपके फल के सिवा पेड़ से कुछ नहीं लेतीं।  कैम्प फायर में पेड़ की हरी डाली तोड़कर डालने वाले और शौकिया शिकार कर किसी भी प्राणी को भूनकर खाने के शौकीन ‘आदिवासी बचाओ’ के कथित प्रणेता इस लोक-संस्कृति की सतह तक भी नहीं पहुँचते, तल तो बहुत दूर की बात है।

मनोविज्ञान कहता है कि मनुष्य के मानसपटल पर जमेे चित्र उसके व्यवहार में दीखते हैं। जैसे लेखक अपने शब्दों या चित्रकार अपने मन के चित्रोेंं को कैनवास पर उतारता है। इसे सीधे लोकवास में देखिए। छोटे-बड़े हर घर के आगे गेरू-चूने से प्रकृति के पात्रों के चित्र बने हैं। जो पिंड में, वही बिरमांड में।
इसी की अगली प्रचिती है कि लोक के व्यवहार में  सकारात्मकता दिखती है। लोकसंवाद में कुछ वाक्यांशों/ वाक्यों का प्रयोग देखिये- दीपक के अस्त होने को ‘दीया बड़ा होना’ कहना, दुकान बंद करने को ‘दुकान बढ़ाना’ कहना, प्रस्थान के समय जाने का उल्लेख न करते हुए ‘ आता हूँ’ कहना आदि।

संस्कृति अंतर्चेतना है, सभ्यता वाह्य व्यवहार। वस्त्र, खानपान, नृत्य, गीत, सब अलग पर भीतर से जुड़ा हुआ है। लोकसभ्यता, संस्कृति से अनुप्रेरित होती है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि सभ्य आदमी चम्मच से भोजन तो करने लग गया पर स्वाद से वंचित हो गया। संस्कृति को सभ्य/असभ्य नहीं किया जा सकता। संस्कृति स्थिर मूल्य है। परंपराएँ परिवर्तित होती रहती हैं। सतयुग से सत्य बोलना आदर्श या स्थिर मूल्य है। आज भी मूल्य वही है। हाँ कालानुसार नैतिकता बदलती रहती है। जैसे द्वापर में युधिष्ठिर ने ‘अश्वत्थामा मारा गया किंतु हाथी’ कहते समय ‘किंतु हाथी’इतना धीमा कहा कि द्रोणाचार्य तक उनका स्वर न पहुँच सके। यह नैतिकता का अवमूल्यन था, अलबत्ता सत्य कहना तब भी स्थिर मूल्य था। यही कारण रहा कि युधिष्ठिर के भय ने उन्हें प्रत्यक्ष असत्य वचन न कहलाते हुए चालाकी बरतने को विवश किया। यह परोक्ष असत्य परिवर्तित नैतिकता का द्योतक था।

वस्तुत: लोकसाहित्य उतना ही पुराना है, जितना कि मनुष्य। साहित्य पर समाज का प्रभाव होता है, फलत: साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। लोक को जहाँ से जो उदात्त मिलता है, वह उसे ग्रहण कर लेता है। साहित्य, संस्कृति से उपजता है। अध्ययन और अनुसंधान के केंद्र में संस्कृति होनी चाहिए न कि सभ्यता।

शिक्षा और सभ्यता के विकास का प्रत्यक्ष अनुपात का सम्बंध सामान्यत: स्वीकृत है जिसके चलते स्थूल रूप में शिक्षा को अक्षरज्ञान का विकल्प समझ लिया गया है। अक्षर की समझ साक्षर भले ही करे, शिक्षित बनाये, यह आवश्यक नहीं। दीक्षित तो कागज़ी ज्ञान से हुआ ही नहीं जा सकता। हर आदमी का जीवन एक उपन्यास है। इस संदर्भ में देखें तो साक्षर हो या निरक्षर, हर क्षण कुछ नया रच रहा होता है। अत: मात्र अक्षर ज्ञान किसीको सभ्य, असभ्य, शिक्षित जैसे विशेषणों से जोड़े तो यह बेमानी होगा। पढ़ना, बाँचना भी दो तरह का होता है। एक आदमी पर लिखी किताबों को, दूसरा आदमी को। इस सम्बंध में इन पंक्तियों के लेखक की एक कविता प्रासंगिक है-

उसने पढ़ी
आदमी पर लिखी किताबें
मैं आदमी को पढ़ता रहा,
होना ही था
उसके पास लग गया ढेर
कागज़ी डिग्रियों का
मैं रहा खाली हाथ,
पर राज़ की बात बताऊँ
उसे जब कुछ
नया जानना हो
वह, मुझसे मिलने
आता ज़रूर है!

शिक्षा, केवल अक्षरज्ञान तक सीमित रहे तो व्यर्थ है। ‘साक्षरा’ शब्द के वर्ण उल्टे क्रम में लगाएँ तो ‘राक्षसा’ बनता है। शिक्षा को दीक्षा का साथ न मिले तो साक्षरा और राक्षसा में अंतर नहीं होता। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि न्यूक्लिअर तकनीक सीखना साक्षरता है। इस तकनीक से बम बनाकर निर्दोषों का रक्त बहाना दीक्षा का अभाव है।

शिक्षा और दीक्षा का विरोधाभास ‘ग’ से ‘गणेश’ को  हटाने की सोच में ही दृष्टिगोचर होती है। ‘श्री गणेश’ सांस्कृतिक प्रतीक हैं। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म से दूर जाना नहीं अपितु अध्यात्म सापेक्षता है। दुनिया का सबसे बड़ा सच विज्ञान है और विज्ञान का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सापेक्षता का है। हर मत-संप्रदाय के प्रति समभाव, धर्मनिरपेक्षता है। धर्मनिरपेक्षता नास्तिक होना नहीं है, धर्मनिरपेक्षता हरेक के लिए आस्तिक होना है। बेहतर होता कि ‘ग’ से ‘गणेश’ के साथ बारहखड़ी में ‘खु’ से ‘खुदा’, ‘बु’ से ‘बुद्ध’, ‘म’ से महावीर, ‘न’ से ‘नानक’, ‘जी’ से ‘जीजस’ भी पढ़ाये जाते। विडंबना है कि छोटी त्रिज्या वाली आँखों की परिधि, शिक्षा को और छोटी करती चली गई।  अलबत्ता ताल ठोंककर खड़ा लोक अनंत त्रिज्या वाली अपनी आँखों की परिधि से दीक्षा का निरंतर विस्तार करता रहा। किसी पाखंड में पड़े बिना वह आज भी बच्चे की शिक्षा का ‘श्रीगणेश’, ‘श्री गणेश’ से ही करता है। यही लोक की दृढ़ता  है, यही लोकत्व का विस्तार है। लोक का बखान पारावार है, लोक की महिमा अपरम्पार है।

प्रकृति ही लोक है, लोक ही प्रकृति है। प्रकृति का अपना लोक है, लोक की अपनी प्रकृति है। प्रकृति की प्रकृति ही मनुज की संस्कृति है। संस्कृति और मनुज का सम्बंध आत्मा और परमात्मा का सम्बंध है, एकात्मता का सम्बंध है।  यह एकात्मता ही लोक का जीवन है, लोकजीवन है। लोकजीवन अथाह सिंधु है। इसे समझने के लिए दूर से देखने या बाहर खड़े रहने से काम नहीं चलेगा। सिंधु में उतरना होगा, इसके साथ एकात्म होना होगा।

समाप्त

©  संजय भारद्वाज, पुणे

रात्रि 11:21 बजे, 21.9.19

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – 6. राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

हम  “संजय दृष्टि” के माध्यम से  आपके लिए कुछ विशेष श्रंखलाएं भी समय समय पर प्रकाशित  करते रहते हैं। ऐसी ही एक श्रृंखला दीपोत्सव पर “दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप” तीन दिनों तक आपके चिंतन मनन के लिए प्रकाशित  की गई थी।  31 अक्टूबर 2019 को स्व सरदार वल्लभ भाई पटेल जी का जन्मदिवस  था जो राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं।  इस अवसर पर श्री संजय भारद्वाज जी का आलेख  “राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका”  एक विशेष महत्व रखता है।  इस लम्बे आलेख को हम कुछ अंकों में विभाजित कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वास है आप इसमें निहित विचारों को गंभीरता पूर्वक आत्मसात करेंगे।

– हेमन्त बावनकर

☆ संजय दृष्टि  –  6.  राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका 

 

जैसा पहले कहा जा चुका है कि भारतीय लोक में दहाई के बिना इकाई का मान नहीं है। समूह के बिना व्यक्ति का अस्तित्व यहाँ अग्राह्य है। यही कारण है कि लोक का क्रियाकलाप सामूहिक है। लोक में नृत्य सामूहिक है। लोक में गायन सामूहिक है। समूह में हर किसी का निबाह हो जाता है। समूह हर किसी को प्रतिभा प्रदर्शन  हेतु मंच देता है तो हरेक के विरेचन के लिए सेतु भी बनता है। सामूहिकता ऐसी कि भोजन भी पंगत में बैठकर सबके साथ ही होगा। भोजन के समय किसी अतिथि के घर आ जाने पर मानसिक विचलन का शिकार हो जाने वाली आधुनिकता की किसी शायर ने लोक से सटीक तुलना करते हुए लिखा है,

एक वो दौर था, सोचता था मेहमान आये तो खाना खाऊँ
लानत है इस दौर पर, सोचता हूँ मेहमान जाये तो खाना खाऊँ

शादी-ब्याह में गाँव जुटता था। जातिप्रथा को लेकर आज जो अरण्यरुदान है, सामूहिकता में हर जाति समाविष्ट है। हरेक अपना दायित्व निर्वहन करता है। ब्याह बेटी का है तो बेटी सबकी है। आज चलन कुछ कम हो गया है पर पहले मोहल्ले के हर घर में विवाह पूर्व बेटी को भोजन के लिए आमंत्रित किया जाता, हर घर बेटी के साथ यथाशक्ति कुछ बाँध देता।

लोकगीत का अपना सनातन इतिहास है। सत्य तो यह है कि लोकगीतों ने इतिहास बचाया। घर-घर बाप-दादा का नाम याद  रखा, घर-घर श्रुत वंशावलियाँ बनाईं और बचाईं। केवल वंशावली ही नहीं, कुल, गोत्र, शासन, गाँव, खेत, खलिहान, कुलदेवता, कुलदेवी, ग्रामदेवता, आचार, संस्कार, परंपरा, राग, विराग, वैराग्य, मोह, धर्म, कर्म, भाषा, अपभ्रंश, वैराग्य की गाथा, रोमांस के किस्से, सब बचाया। इतना ही नहीं 1857 के स्वाधीनता संग्राम के में कमल और रोटी के चिह्न को अँग्रेजों ने दस्तावेज़ों के रूप में भले जला दिया पर लोकगीतों के मुँह पर ताला नहीं जड़ सका। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रणबाँकुरों के बलिदान को लोकगीतों ने ही जीवित रखा। इसी तरह अनादि काल से चले आ रहे सोलह संस्कारों को धर्मशास्त्रों के बाद  प्रथा में लोगों की ज़ुबान पर लोकगीतों ने ही टिकाये रखा।

त्योहार सामूहिक हैं, एकात्म हैं। व्रत-पर्व, धार्मिक अनुष्ठान, भजन-कीर्तन सब सामूहिक हैं। एकात्मता ऐसी कि त्योहारों में मिठाई का आदान-प्रदान हर छोटा-बड़ा करता है। महिलाएँ व्रत का उद्यापन करें, त्यौहार या अनुष्ठान हरेक में यथाशक्ति एक से लेकर इक्यावन महिलाओं के भोजन/ जलपान का प्रावधान है। लोक-परम्परा भागीदारी का व्रत, त्यौहार  और भागीदारी का अनुष्ठान है। धार्मिक ग्रंथों का पाठ और पारायण भी इसी संस्कृति की पुष्टि करते हैं। श्रीरामचरितमानस का पाठ तो जोड़ने का माध्यम है ही अपितु जो पढ़ना नहीं जानते उन्हें भी साथ लेने के लिए संपुट तो अनिवार्यत: सामूहिक है।

लोकपरंपराओं, लोकविधाओं- गीत, नृत्य, नाट्य, आदि का जन्मदाता कोई एक नहीं है। प्रेरणास्रोत भी एक नहीं है। इनका स्रोत, जन्मदाता, शिक्षक, प्रशिक्षक, सब लोक ही है। गरबा हो, भंगड़ा हो,  बिहू हो या होरी, लोक खुद इसे गढ़ता है, खुद इसे परिष्कृत करता है। यहाँ जो है, समूह का है। जैसे ॠषि परंपरा में सुभाषित किसने कहे, किसने लिखे का कोई रेकॉर्ड नहीं है, उसी तरह लोकोक्तियों, सीखें किसी एक की नहीं हैं। परंपरा की चर्चा अतीतजीवी होना नहीं होता। सनद रहे कि अतीत के बिना वर्तमान नहीं जन्मता और भविष्य तो कोरी कल्पना ही है। जो समुदाय अपने अतीत से, वह भी ऐसे गौरवशाली अतीत से अपरिचित रखा जाये. उसके आगे का प्रवसन सुकर कैसे होगा? विदेशी शक्तियों ने अपने एजेंडा के अनुकूल हमारे अतीत को असभ्य और ग्लानि भरा बताया। लज्जित करने वाला विरोधाभास यह है कि निरक्षरों का ‘समूह’, प्राय: पढ़े-लिखों तक आते-आतेे ‘गिरोह’ में बदल जाता है। गिरोह निहित स्वार्थ के अंतर्गत कृत्रिम एकता का नारा उछालकर उसकी आँच में अपनी रोटी सेंकता है जबकि समूह एकात्मता को आत्मसात कर, उसे जीता हुआ एक साथ भूखा सो जाता है।

लोक का जीवन सरल, सहज और अनौपचारिक है। यहाँ छिपा हुआ कुछ भी नहीं है। यहाँ घरों के दरवाज़े सदा खुले रहते हैं। महाराष्ट्र के शिर्डी के पास शनैश्वर के प्रसिद्ध धाम शनि शिंगणापुर में लोगों के घर में सदियों से दरवाज़े नहीं रखने की लोकपरंपरा है। कैमरे के फ्लैश में चमकने के कुछ शौकीन ‘चोरी करो’(!) आंदोलन के लिए वहाँ पहुँचे भी थे। लोक के विश्वास से कुछ सार्थक घट रहा हो तो उस पर ‘अंधविश्वास’ का ठप्पा लगाकर विष बोने की आवश्यकता नहीं। खुले दरवाज़ों की संस्कृति में पास-पड़ोस में, मोहल्ले में रहने वाले सभी मामा, काका, मामी, बुआ हैं। इनमें से कोई भी किसीके भी बच्चे को अधिकार से डाँट सकता है, अन्यथा मानने का कोई प्रश्न ही नहीं। इन आत्मीय संबोधनों का परिणाम यह कि सम्बंधितों के बीच  अपनेपन का रिश्ता विकसित होता है। गाँव के ही संरक्षक हो जाने से अनैतिक कर्मों और दुराचार की आशंका कम हो जाती है। विशेषकर बढ़ते यौन अपराधों के आँकड़ों पर काम करने वाले संबोधन द्वारा उत्पन्न होने वाले नेह और दायित्व का भी अध्ययन करें तो तो यह उनके शोध और समाज दोनों के लिए हितकर होगा।

क्रमशः…….7

©  संजय भारद्वाज, पुणे

रात्रि 11:21 बजे, 21.9.19

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – 5. राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

हम  “संजय दृष्टि” के माध्यम से  आपके लिए कुछ विशेष श्रंखलाएं भी समय समय पर प्रकाशित  करते रहते हैं। ऐसी ही एक श्रृंखला दीपोत्सव पर “दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप” तीन दिनों तक आपके चिंतन मनन के लिए प्रकाशित  की गई थी।  31 अक्टूबर 2019 को स्व सरदार वल्लभ भाई पटेल जी का जन्मदिवस  था जो राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं।  इस अवसर पर श्री संजय भारद्वाज जी का आलेख  “राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका”  एक विशेष महत्व रखता है।  इस लम्बे आलेख को हम कुछ अंकों में विभाजित कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वास है आप इसमें निहित विचारों को गंभीरता पूर्वक आत्मसात करेंगे।

– हेमन्त बावनकर

☆ संजय दृष्टि  –  5.  राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका 

 

एक आख्यान के अनुसार व्यास जी जब संन्यास के लिए वन जाते हुए अपने पुत्र का पीछा कर रहे थे, उस समय जल में स्नान करने वाली स्त्रियों ने नग्न शुकदेव को देखकर वस्त्र धारण नही किया, परन्तु वस्त्र पहने हुए व्यासजी को देखकर लज्जा से कपड़े पहन लिए। व्यास जी ने आश्चर्य करते हुए जब पूछा तो उन स्त्रियों ने जवाब दिया कि आपकी दृष्टि में तो अभी स्त्री पुरुष का भेद बना हुआ है, पर आपके पुत्र की दृष्टि में यह भेद नही है। आपमें वासना शेष है, आपके पुत्र में उपासना अशेष है।
वासना द्वैत का प्रतीक है, उपासना अद्वैत जगाती है। लोक जैसा होने के लिए मनसा वाचा कर्मणा निर्वसन होना होगा। लोक में कुछ भी कृत्रिम नहीं है।

लोक सहजता से जीवन जीता है। लोकसंस्कृति में श्लील-अश्लील की रेखा विभाजक और विघातक रूप में नहीं है। यहाँ किसी कथित अश्लील चुटकुले पर एक स्त्री भी उतने ही खिलखिलाकर हँस लेती है जितना एक पुरुष। लोक स्त्री विमर्श के ढोल नहीं बजाता पर युवतियों को स्वयंवर का अवसर देता है, अपना साथी चुनने के लिए युवक-युवतियों के लिए ‘घोटुल’ बनाता है। 1600 ईस्वी में गोस्वामी जी के दोहे ‘ ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारि, सकल ताड़ना के अधिकारी’ में ‘ध्यान देने योग्य’ के बजाय ‘ताड़ना’ का अर्थ प्रताड़ना बताने वाले भूल गये कि द्वापरनरेश श्रीकृष्ण ने अपनी बहन सुभद्रा को अर्जुन के साथ भाग जाने की सलाह दी थी। पनघट पर महिलाओं का साथ जाना प्रचलन में रहा। सुरक्षा के साथ-साथ, साथ बतियाने, संवाद करने,  मन की गाँठें खोलने वाला घाट याने पनघट। पनघट याने स्त्रियों के भीतर जमे को तरल कर प्रवाहित होने, उन्हें हल्का करने का स्पेस। आज आधुनिकता में भी अपने ‘स्पेस’ के लिए संघर्ष करती स्त्री को लोक ‘गारियों’ के माध्यम से हर किसी पर टिप्पणी कर विरेचन का अवसर प्रदान करता है।

लोक के उदात्त भाव को विदेशी लेखकों ने भी रेखांकित किया। कुछ कथन द्रष्टव्य हैं-

“भारत मानव जाति का पालना है, मानवीय वाणी का जन्म स्थान है, इतिहास की जननी है और विभूतियों की दादी है और इन सब के ऊपर परम्पराओं की परदादी है। मानव इतिहास में हमारी सबसे कीमती और सबसे अधिक अनुदेशात्मक सामग्री का भण्डार केवल भारत में है!’

– मार्क ट्वेन (लेखक, अमेरिका)

‘यदि पृथ्वी के मुख पर कोई ऐसा स्थान है जहां जीवित मानव जाति के सभी सपनों को बेहद शुरुआती समय से आश्रय मिलता है, और जहां मनुष्य ने अपने अस्तित्व का सपना देखा, वह भारत है।!‘

– रोम्या रोलां (फ्रांसीसी विद्वान) 

‘हम सभी भारतीयों का अभिवादन करते हैं, जिन्होंने हमें गिनती करना सिखाया, जिसके बिना विज्ञान की कोई भी खोज संभव नहीं थी।!‘

– एल्बर्ट आइनस्टाइन (सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी, जर्मनी) 

‘यदि हम से पूछा जाता कि आकाश तले कौन सा मानव मन सबसे अधिक विकसित है, इसके कुछ मनचाहे उपहार क्या हैं, जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं पर सबसे अधिक गहराई से किसने विचार किया है और इसकी समाधान पाए हैं तो मैं कहूंगा इसका उत्तर है भारत।‘

– मेक्स मुलर (जर्मन विद्वान)

‘भारत ने शताब्दियों से एक लम्बे आरोहण के दौरान मानव जाति के एक चौथाई भाग पर अमिट छाप छोड़ी है। भारत के पास उसका स्थान मानवीयता की भावना को सांकेतिक रूप से दर्शाने और महान राष्ट्रों के बीच अपना स्थान बनाने का दावा करने का अधिकार है। पर्शिया से चीनी समुद्र तक साइबेरिया के बर्फीलें क्षेत्रों से जावा और बोरनियो के द्वीप समूहों तक भारत में अपनी मान्यता, अपनी कहानियां और अपनी सभ्यता का प्रचार प्रसार किया है।‘

– सिल्विया लेवी (फ्रांसीसी विद्वान) 

‘भारत ने चीन की सीमापार अपना एक भी सैनिक न भेजते हुए बीस शताब्दियों के लिए चीन को सांस्कृतिक रूप से जीता और उस पर अपना प्रभुत्व बनाया है।‘

– हु शिह (अमेरिका में चीन के पूर्व राजदूत)

दुनिया के कुछ हिस्से ऐसे हैं जहां एक बार जाने के बाद वे आपके मन में बस जाते हैं और उनकी याद कभी नहीं मिटती। मेरे लिए भारत एक ऐसा ही स्थान है। जब मैंने यहां पहली बार कदम रखा तो मैं यहां की भूमि की समृद्धि, यहां की चटक हरियाली और भव्य वास्तुकला से, यहां के रंगों, खुशबुओं, स्वादों और ध्वनियों की शुद्ध, संघन तीव्रता से अपने अनुभूतियों को भर लेने की क्षमता से अभिभूत हो गई। यह अनुभव कुछ ऐसा ही था जब मैंने दुनिया को उसके स्याह और सफेद रंग में देखा, जब मैंने भारत के जनजीवन को देखा और पाया कि यहां सभी कुछ चमकदार बहुरंगी है।

– किथ बेलोज़ (मुख्य संपादक, नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी)

‘ मैं भारत के अनेक राज्यों में घूमा. वहाँ मैंने एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं देखा जो भिखारी हो, चोर हो. ऐसी विलक्षण सम्पदा देखी है मैंने इस देश में, ऐसे उच्चतम मौलिक विचार, इतने काबिल/गुणी व्यक्ति देखे हैं कि मुझे नहीं लगता कि हम कभी इस देश को गुलाम बना पाएँगे, जब तक कि हम इस देश की अध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को नष्ट ना कर दें, जो इस देश की वास्तव में रीढ़ है।

और इसलिए मेरा प्रस्ताव है कि इस देश की वर्षों पुरानी ‘शिक्षा प्रणाली‘ और यहाँ की ‘संस्कृति‘ को बदल दिया जाए, क्यूंकि जब भारतीय ये सोचेंगे कि जो कुछ भी विदेशी है और ब्रिटेन का है, वह अच्छा और बेहतर है उनके स्वयं से, तब ये भारतीय अपना अपनी पौराणिक संस्कृति और स्वाभिमान को खो बैठेंगे और तब ये लोग वो बन जाएंगे जो हम उन्हें बनाना चाहते हैं, एक वास्तविक गुलाम भारत !‘

 – भारत का दौरा करने के बाद 1835 में ब्रिटिश संसद में दिए गये अँग्रेज मैकाले के भाषण के अंश। ( ये दस्तावेज संग्रहित हैं ) 

भारत में बीस लाख देवी-देवता हैं और वे सभी की पूजा करते हैं। धर्म के मामले में बाकी सभी देश कंगाल हैं, भारत ही करोड़पति है।

 – मार्क ट्वेन

कोई भी अध्याय जिसका आरम्भ पश्चिमी है, यदि उसे मानव जाति के विनाश में समाप्त नहीं होना है तो उसका अंत भारतीय होना ही चाहिए। इतिहास के इस बेहद खतरनाक क्षण में मानव जाति की मुक्ति का एकमात्र तरीका भरतीय तरीक है।

– डॉ. अर्नॉल्ड टोयनबी

इसी संदर्भ में महान दार्शनिक स्वामी विवेकानंद का यह कथन भी भी ज्योतिपुँज-सा है-

भारत में हजारों वर्षों से शांति पूर्वक अपना अस्तित्व बनाए रखा। यहां जीवन तब भी था जब ग्रीस अस्तित्व में नहीं आया था . . . इससे भी पहले जब इतिहास का कोई अभिलेख नहीं मिलता, और परम्पराओं ने उस अंधियारे भूतकाल में जाने की हिम्मत नहीं की। तब से लेकर अब तक विचारों के बाद नए विचार यहां से उभर कर आते रहे और प्रत्येक बोले गए शब्द के साथ आशीर्वाद और इसके पूर्व शांति का संदेश जुड़ा रहा। हम दुनिया के किसी भी राष्ट्र पर विजेता नहीं रहे हैं और यह आशीर्वाद हमारे सिर पर है और इसलिए हम जीवित हैं. . .!‘

क्रमशः…….6

©  संजय भारद्वाज, पुणे

रात्रि 11:21 बजे, 21.9.19

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सकारात्मक सपने – #22 – भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई ☆ सुश्री अनुभा श्रीवास्तव

सुश्री अनुभा श्रीवास्तव 

(सुप्रसिद्ध युवा साहित्यकार, विधि विशेषज्ञ, समाज सेविका के अतिरिक्त बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी  सुश्री अनुभा श्रीवास्तव जी  के साप्ताहिक स्तम्भ के अंतर्गत हम उनकी कृति “सकारात्मक सपने” (इस कृति को  म. प्र लेखिका संघ का वर्ष २०१८ का पुरस्कार प्राप्त) को लेखमाला के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। साप्ताहिक स्तम्भ – सकारात्मक सपने के अंतर्गत आज अगली कड़ी में प्रस्तुत है  “भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई”।  इस लेखमाला की कड़ियाँ आप प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे।)  

 

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सकारात्मक सपने  # 22 ☆

 

☆ भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई 

 

नये नये विकास मंत्री विकास के गुर सीखने  अमेरिका गये, स्वाभाविक था कि वहां के विकास मंत्री ने उनका स्वागत सत्कार किया,मंत्री जी ने उनसे कहा कि वे उन्हें विकास के गुर सिखा दें, उन्होंने अमेरिकन मंत्री को आश्वस्त किया कि जो भी वे सिखायेंगे, उसे शत प्रतिशत तरीके से क्रियान्वित करके दिखायेंगे. अमेरिकन मंत्री  आग्रह पूर्वक उन्हें अपने घर ले गये,नदी के तट पर बने उनके शानदार बंगले की  शानशौकत देखकर  मंत्री जी ने इस सबका राज जानना चाहा, तो अमेरिकन मंत्री  उन्हें नदी की ओर खुलने वाली खिड़की की तरफ ले गये, खिड़की से बाहर नदी दिखाते हुये उन्होंने पूछा , वह पुल देख रहे हैं ? जबाब मिला जी हाँ ! तो अमेरिकन मंत्री जी ने शानदार बंगले का राज बताया बस २ प्रतिशत एडजस्टमेंट.

कोई दो बरस बाद अमेरिकन मंत्री भारत यात्रा पर आये इस बार हमारे मंत्री जी उन्हें अपनी कोठी पर ले गये, कोठी की लाजबाब रौनक देखकर अमेरिकन मंत्री जी ने इसका राज पूछा, तो हमारे मंत्री जी ने यमुना के तट पर बनी अपनी कोठी की यमुना की ओर खुलने वाली खिड़की खोली, पूछा वह पुल देख रहे हैं ? अमेरिकन मंत्री जी ने आंखें मली, चश्मा साफ किया, पर फिर भी जब उन्हें कुछ नही दिखा तो उन्होंने कहा कि पुल तो कहीं नही दिख रहा है ! मंत्री जी ने मुस्करा कर जबाब देते हुये कोठी का राज बताया १०० प्रतिशत एडजस्टमेंट…

देश में व्याप्त भ्रष्टाचार शायद इस चुटकुले से स्पष्ट हो.

भ्रष्ट व्यवस्था के पोषक बड़े विशेष अंदाज में कहते हैं अरे, काम हम तुम कहां करते हैं ? सारा काम तो गांधी जी ही करवाते हैं, उनका आशय नोट पर मुद्रित गांधी जी की तस्वीर से होता है.

१८० देशो के बीच ट्रास्परेसी इंटरनेशनल ने जो रैंकिग की है उसके अनुसार भारत को १० में से ३.४ अंक देते हुये भ्रष्टाचार में ८४ वें स्थान पर रखा गया है  ..सेवानिवृत  केंद्रीय विजिलेंस कमिश्नर प्रत्यूश सिंहा ने कहा है कि लगभग ३० प्रतिशत भारतीय भ्रष्ट हैं, किंतु  आज भी  २० प्रतिशत लोग भ्रष्टाचार से मुक्त हैं. शेष ५० प्रतिशत अधबीच में हैं.

राजीव गांधी ने कहा था कि विकास हेतु केंद्र से दिया गया मात्र १५ प्रतिशत धन ही वास्तविक विकास कार्यों में लग पाता है शेष भ्रष्ट राजनैतिज्ञों, अफसरशाही , पत्रकारों, ठेकेदारो, व भ्रष्ट व्यवस्था में गुम हो जाता है.स्वयं पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी ” भ्रष्टाचार को स्वीकार करते हुये कहा था ” घी कहां गया खिचड़ी में “.

अनेक विदेशी कंपनियां भारत में उद्योग खोलने आती हैं पर हमारी राजनैतिक भ्रष्ट व्यवस्था, तथा ब्युरोक्रेसी, मल्टिपल विंडो चैकिंग उन्हें ऐसा पाठ पढ़ाती हैं कि वे अपने साजो सामान समेट कर भाग खड़ी होती हैं. महाराष्ट्र की दाभौल नेप्था विद्युत उत्पादन परियोजना सहित अनेक विदेशी कंपनियो व निवेशको का यही हश्र हुआ है. सैनिक साजो सामान की खरीदी में विदेशी कंपनियों से लेनदेन के अनेक प्रकरण सुर्खियों में रहे हैं.

आज बढ़ती आबादी और भ्रष्टाचार,दोनों ही तो देश की सबसे बड़ी समस्यायें हैं. हमेशा से ही समाज किसी न किसी के डर से ही नियम कायदो का परिपालन करता रहा है तुलसीदास ने लिखा भी है ” भय बिन होई न प्रीति “.  एक समय था जब लोग “उपर पहुंचकर परमात्मा को मुंह दिखाना है” इस तरह ईश्वर के डर से,  या राजा के कठोर दण्ड के डर से, या समाज से निकाल दिये जाने के डर से, या सत्य की राह पर चलते हुये स्वयं अपने आप से डरकर नियमानुसार काम करते थे, पर अब जितनी ज्यादा नैतिक शिक्षा पढ़ाई जा रही है नैतिकता का उतना ही ह्रास हो रहा है.धर्म अब लड़ने मारने और सामूहिक प्रतिष्ठा का विषय बन चुका है. राजा का डर रहा नही, लोग जान गये हैं कि कम या ज्यादा कीमत हो सकती है पर वर्तमान भौतिकवादी संग्रह के युग में शासन का हर प्रतिनिधि  बिकाऊ है, स्वयं अपने आप से अब आदमी डरता नही है वह वर्तमान का भौतिक सुख भोगना चाहता है, उसे मरकर अल्लाताला के कब्र  खोलने तक का इंतजार मंजूर नही है.

जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी पाठशाला हमारे पुलिसथाने, पटवारी से प्रारंभ  विभिन्न सरकारी कार्यालय  हैं.हमारे टूरिस्ट विदेशी भाईयों के लिये दर्शनीय स्थानो की सिक्यूरटी, उनकी यात्रा के दौरान, उनके रुकने, खाने पीने की व्यवस्थाओ के स्थानो के प्रभारी, विदेशियों की खरीददारी के दौरान उन्हें लूट लेने के अंदाज में बैठे हमारे शाप कीपर्स आदि सभी शार्ट कट का थोड़ा थोड़ा पाठ सिखा कर भ्रष्ट व्यवस्था और “सब चलता है” की शिक्षा उन्हें दे ही देते हैं.   उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार राजधानियों में मंत्रालयों, सचिवालयों, विभाग प्रमुखों जैसे सफेद झक लोगों द्वारा वातानुकूलित कमरों में खादी के पर्दो के भीतर होता है.इस तरह खाकी और खादी की वर्दी वाले भ्रष्टाचार की द्विस्तरीय शालाओ के शिक्षक हैं. अब हमारे विदेशी मेहमानो को यदि भ्रष्टाचार का क्रैश  कोर्स कराना हो उन्हें इन दफ्तरों का कोई  काम एक निश्चित समय सीमा के साथ सौंप दिया जावे, यदि वे काम करके आ जाते हैं तो समझ लें कि वे भ्रष्टाचार के क्रैश कोर्स में उत्तीर्ण हैं. क्योंकि इन कार्यालयों से काम निकालने का और कोई तरीका अब तक खोजा नही जा सका है.

इन दुरूह सामाजिक स्थितियो में जब सबने भ्र्ष्टाचार के सम्मुख घुटने टेक दिये हैं, युवा ही  रोशनी की किरण हैं. देश हित में हमें यह लड़ाई जीतनी ही होगी.

 

© अनुभा श्रीवास्तव

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – 3. राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

हम  “संजय दृष्टि” के माध्यम से  आपके लिए कुछ विशेष श्रंखलाएं भी समय समय पर प्रकाशित  करते रहते हैं। ऐसी ही एक श्रृंखला दीपोत्सव पर “दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप” तीन दिनों तक आपके चिंतन मनन के लिए प्रकाशित  की गई थी।  31 अक्टूबर 2019 को स्व सरदार वल्लभ भाई पटेल जी का जन्मदिवस  था जो राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं।  इस अवसर पर श्री संजय भारद्वाज जी का आलेख  “राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका”  एक विशेष महत्व रखता है।  इस लम्बे आलेख को हम कुछ अंकों में विभाजित कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वास है आप इसमें निहित विचारों को गंभीरता पूर्वक आत्मसात करेंगे।

इस लेख की पठनीयता में किसी प्रकार का प्रतिरोध न हो इस दृष्टि से आप इस सप्ताह के “साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच” अगले रविवार से पूर्ववत पढ़ सकेंगे।  

– हेमन्त बावनकर

☆ संजय दृष्टि  –  3.  राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका 

 

ऐसा नहीं है कि लोक निर्विकार या निराकार है। वह सर्वसाधारण मनुष्य है। वह लड़ता, अकड़ता, झगड़ता है। वह रूठता, मानता है। वह पड़ोसी पर मुकदमा ठोंकता है पर मुकदमा लड़ने अदालत जाते समय उसी अग्रज पड़ोसी से आशीर्वाद भी लेता है। इतना ही नहीं, पड़ोसी उसे ‘विजयी भव’ का आशीर्वाद भी देता है। विगत तीन दशकों से भारतीय राजनीति के केंद्र में रहे ‘श्रीरामजन्मभूमि विवाद’ के दोनों पैरोकार महंत परमानंद जी महाराज और स्व. अंसारी एक ही कार में बैठकर कोर्ट जाते रहे। बकौल भारतरत्न अटलबिहारी वाजपेयी, ‘ मतभेद तो हों पर मनभेद न हो’ का जीता-जागता चैतन्य उदाहरण है लोक।

बलुतेदार हो या अबलूतेदार, अगड़ा हो या पिछड़ा, धनवान हो निर्धन, सम्मानित हो या उपेक्षित, हरेक को मान देता है लोक। बंगाल में विधवाओं को वृंदावन भेजने की कुरीति रही पर यही बंगाल दुर्गापूजा में हर स्त्री का हाथ लगवाता है। यही कारण है कि माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के घर से मिट्टी ली जाती है। इनमें वेश्या भी सम्मिलित है। अद्वैत या एकात्म भाव का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा? यह बात अलग है कि भारतीय समाज की कथित विषमता को अपनी दुकानदारी बनानेवालों की मिट्टी, ऐसे उदाहरणों से पलीद हो जाती है।

लोक में मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ों की भी प्रतिष्ठा है। महाराष्ट्र में बैलों की पूजा का पर्व ‘बैल पोळा’ मनाया जाता है। वर्ष भर किसान के साथ खेत में काम करनेवाले बैलों के प्रति यह कृतज्ञता का भाव है। पंजाब में बैसाखी में बैलों की पूजा, दक्षिण में हाथी की पूजा इसी कृतज्ञता की कथा कहते हैं। नागपंचमी पर साक्षत काल याने नाग की पूजा भी पूरी श्रद्धा से की जाती है।

पीपल, बरगद, आँवला, तुलसी जैसे पेड़-पौधों की पूजा वसुधा पर हर घटक को परिवार मानने के दर्शन को प्रकट करती है, हर घट में राम देखती है। हर घट में राम देखने की दृष्टि रखनेवालों को अंधविश्वासी, मूर्ख, रिलीजियस फूल, स्टुपिड ब्लैक कहकर उपहास उड़ाने वाले आज पर्यावरण विनाश पर टेसू बहाते हैं। आँख की क्षुद्रता ऐसी कि बरगद को मन्नत के धागे बांधकर कटने से उसका बचाव नहीं दिखा। धागों में अंधविश्वास देखने वाले पर्यावरण संरक्षण का आत्मविश्वास नहीं पढ़ पाए। जिसका दूध पीकर पुष्ट हुए, उस गौ को माँ के तुल्य ‘गौमाता’ का स्थान देना अनन्य लोकसंस्कृति है। पेड़ों के पत्ते न तोड़ना, चींटियों को आटा डालना, पहली रोटी दूध देनेवाली गाय के लिए, अंतिम रोटी रक्षा करने वाले श्वान के लिए इसी अनन्यता का विस्तार है। गाय का दूध दुहकर अपना घर चलाने वाले ग्वालों द्वारा गाय के थनों में बछड़े के पीने के लिए पर्याप्त दूध छोड़ देना, शहरों की यांत्रिकता में बछड़ों को निरुपयोगी मानकर वधगृह भेजने के हिमायतियों की समझ के परे है। वस्तुत: लोकजीवन में सहभागिता और साहचर्य है। लोकजीवन आदमी का एकाधिकार नकारता है। यहाँ आदमी घटक है, स्वामी नहीं है। चौरासी लाख योनियों का दर्शन भी इसे ही प्रतिपादित करता है।

क्रमशः…….4

©  संजय भारद्वाज, पुणे

रात्रि 11:21 बजे, 21.9.19

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – 2. राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

हम  “संजय दृष्टि” के माध्यम से  आपके लिए कुछ विशेष श्रंखलाएं भी समय समय पर प्रकाशित  करते रहते हैं। ऐसी ही एक श्रृंखला दीपोत्सव पर “दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप” तीन दिनों तक आपके चिंतन मनन के लिए प्रकाशित  की गई थी।  31 अक्टूबर 2019 को स्व सरदार वल्लभ भाई पटेल जी का जन्मदिवस  था जो राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं।  इस अवसर पर श्री संजय भारद्वाज जी का आलेख  “राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका”  एक विशेष महत्व रखता है।  इस लम्बे आलेख को हम कुछ अंकों में विभाजित कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वास है आप इसमें निहित विचारों को गंभीरता पूर्वक आत्मसात करेंगे।

– हेमन्त बावनकर

 ☆ संजय दृष्टि  –  2.  राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका 

एकता शब्द व्यक्तिगत रूप से मुझे अँग्रेजी के ‘यूनिटी’ के अनुवाद से अधिक कुछ नहीं लगता। अनेक बार राजनीतिक दल, गठबंधन की विवशता के चलते अपनी एकता की घोषणा करते हैं। इस एकता का छिपा एजेंडा हर मतदाता जानता है। हाउसिंग सोसायटी के चुनाव हों या विभिन्न देशों के बीच समझौते, राग एकता अलापा जाता है।

लोक, एकता के नारों और सेमिनारों में नहीं उलझता। वह शब्दों को समझने और समझाने, जानने और पहचानने, बरगलाने और उकसावे से कोसों दूर खड़ा रहता है पर लोक शब्दों को जीता है। जो शब्दों को जीता है, समय साक्षी है कि उसीने मानवता का मन जीता है। यही कारण है कि ‘एकता’ शब्द की मीमांसा और अर्थ में न पड़ते हुए लोक उसकी आत्मा में प्रवेश करता है।  इस यात्रा में एकता झंडी-सी टँगी रह जाती है और लोक ‘एकात्मता’ का मंदिर बन जाता है। वह एकात्म होकर कार्य करता है। एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हुए भी ‘एकता’ बहुत छोटा शब्द है ‘एकात्मता’ के आगे। अत: इन पंक्तियों के लेखक ने शीर्षक में एकात्मता का प्रयोग किया है। कहा भी गया है,

‘प्रकृति पंचभूतानि ग्रहा लोका: स्वरास्तथा/ दिश: कालश्च सर्वेषां सदा कुर्वन्तु मंगलम्।’

एकात्मता के दर्शन से लोक का विशेषकर ग्राम्य जीवन ओतप्रोत है। आज तो संचार और परिवहन के अनेक साधन हैं।  लगभग पाँच दशक पहले तक भी राजस्थान के मरुस्थली भागों में एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के लिए ऊँट या ऊँटगाड़ी (स्थानीय भाषा में इसे लड्ढा कहा जाता था) ही साधन थे। समाज की आर्थिक दशा देखते हुए उन दिनों ये साधन भी एक तरह से लक्जरी थे और समाज के बेहद छोटे वर्ग की जद में थे। आम आदमी कड़ी धूप में सिर पर टोपी लगाये पैदल चलता था। यह आम आदमी दो-चार गाँव तक पैदल ही यात्रा कर लेता था। रास्ते के गाँव में जो कुएँ पड़ते वहाँ बाल्टी और लेजु (रस्सी) पड़ी रहती। सार्वजनिक प्याऊ के गिलास या शौचालय के मग को चेन से बांध कर रखने की आज जैसी स्थिति नहीं थी। कुएँ पर महिला या पुरुष भर रहा होता तो पथिक को सप्रेम पानी पिलाया जाता। उन दिनों कन्यादान में पूरे गाँव द्वारा अंशदान देने की परंपरा थी। अत: सामाजिक चलन के कारण पानी पीने से पहले पथिक पता करता कि इस गाँव में उसके गाँव की कोई कन्या तो नहीं ब्याही है। मान लीजिये कि पथिक ब्राह्मण है तो उसे पता होता था कि उसके गाँव के किस ब्राह्मण परिवार की कन्या इस गाँव में ब्याही है। इसी क्रम में वह अपने गाँव का हवाला देकर पता करता कि उसके गाँव की कोई वैश्य, क्षत्रिय या हरिजन कन्या तो इस गाँव  में नहीं ब्याही। जातियों और विशेषकर धर्मों में ‘डिफॉल्ट’ वैमनस्य देखनेवालों को पता हो कि पथिक यह भी तहकीकात करता कि किसी ‘खाँजी’ (मुस्लिम धर्मावलंबियों के लिए तत्कालीन संबोधन) की बेटी का ससुराल तो इस गाँव में नहीं है। यदि दूसरे धर्म की कोई बेटी, उसके गाँव की कोई भी बेटी, इस गाँव में ब्याही होती तो वहाँ का पानी न पीते हुए 44-45 डिग्री तापमान की आग उगलती रेत पर प्यासा पथिक आगे की यात्रा शुरू कर देता। ऐसा नहीं कि इस प्रथा का पालन जाति विशेष के लोग ही करते। ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय, हरिजन, खाँजी, सभी करते। एक आत्मा, एकात्म, एकात्मता के इस भाव का व्यास, कागज़ों की परिधि में नहीं समा सकता।

इसी अनुक्रम में एक और परंपरा देखें। बरात जिस गाँव में जाती, दूल्हे के पिता के पास इस गाँव में ससुराल कर चुकी अपने गाँव की ब्याहताओं की सूची होती। ये लड़कियाँ किसी भी जाति या धर्म की हों, दूल्हे का पिता हरेक के घर एक रुपया और यथाशक्ति ‘लावणा’ (मंगलकार्यों में दी जानी वाली मिठाई) लेकर जाता। लड़की प्रतीक्षा करती कि उसके गाँव से   से कोई ताऊ जी, काका जी, बाबा जी आये हैं। मायके से (यहाँ गाँव ही मायका है) किसीका आना, ब्याहता को जिस आनंद से भर देता है, वह किसी से छुपा नहीं है। मंगलकार्यों (और अशुभ प्रसंगों में भी) बहु-बेटियों को मान देने का यह अमृत, लोक-परम्परा को चिरंजीव कर देता है। विष को गले में रोककर नीलकंठ महादेव कालातीत हैं, लोक की नीलकंठी परम्परा भी महादेव की अनुचर है।

वस्तुत: लोक में किसी के लिए दुत्कार नहीं है, अपितु सभी के लिए सत्कार है। जाति प्रथा का अस्तित्व होने पर भी सभी जातियों के साथ आने पर ही ब्याह-शादी, उत्सव-त्यौहार संपन्न हो सकते थे। महाराष्ट्र में 12 बलूतेदार परंपरा रही। कृषक समाज के केंद्र में था। उसके बाद बलूतेदारों का क्रम था। बलूतेदार को ‘कारू’ या कार्यकारी अर्थात जिनके सहारे काम चलता हो, भी माना गया। इनमें कुंभार (कुम्हार), कोळी (कोली या मछुआरा), गुरव, चांभार(चर्मकार), मातंग, तेली, न्हावी ( नाभिक), भट, परीट, महार, लोहार ( लुहार), सुतार को प्रमुखता से स्थान दिया गया। क्षेत्रवार इनमें न्यूनाधिक अंतर भी मिलता है। 12 बलूतेदारों के साथ 18 नारू अर्थात जिनकी आवश्यकता यदा-कदा पड़ती है, का उल्लेख भी है। इनमें कलावंत, कोरव, गोंधळी, गोसावी, घडसी, ठाकर, डवरया, तराळ, तांबोली, तेली, भट, माली, जंगम, वाजंत्री. शिंपी, सनगर, साळी, खटीक, मुलाणा का संदर्भ सामान्यत: मिलता है। इनके सिवा बनजारा और अन्यान्य घुमंतू जनजातियों और उपरोक्त उल्लेख में छूट गई सभी जातियों का योगदान रहा है।

जैसाकि कहा जा चुका है, समाज के केंद्र में किसान था। कोई माने न माने पर शरीर के केंद्र में जैसे पेट था, है और रहेगा, वैसे ही खेती सदा जीवन के केंद्र में रहेगी। किसान के सिवा कारू और नारू की आवश्यकता पड़ती थी। भारतीय समाज को विभाजन रेखा खींचकर देखनेवाली आँखें, अपने रेटीना के इलाज की गुहार करती हैं।  सत्य कहा जाये तो ग्राम्य जीवन लोक को पढ़ने, समझने और अपनी समझ को मथने का श्रेष्ठ उदाहरण है।

क्रमशः…….3

©  संजय भारद्वाज, पुणे

रात्रि 11:21 बजे, 21.9.19

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 15 – आघात ☆ – श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

 

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “आघात।)

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 15 ☆

 

☆ आघात

 

भगवान राम ने गरुड़ को वरदान दिया कि “आपने मेरी जिंदगी बचाई है, और आज से लोग जो अपने रिश्तेदारों और दोस्तों की मृत्यु होने के बाद डरते और उदास अनुभव करते है, मृत्यु के विषय में गुप्त ज्ञान सुनने के बाद निडर और शाँत अनुभव करेंगे और आज से इस ज्ञान को ‘गरुड़ पुराण’ के नाम से जाना जायेगा जो जीवों को भौतिक दुनिया से दिव्य दुनिया तक ले जायेगा”

भगवान राम को प्रणाम करने के बाद गरुड़ वैकुण्ठ वापस चले गए। तब भगवान हनुमान ने सभी को बताया कि नागपाश से भगवान राम और लक्ष्मण को बचाने के लिए भगवान गरुड़ को बुलाने के लिए यह सुझाव जाम्बवन्त जी ने दिया था।

सुग्रीव ने भगवान राम से पूछा, “मेरे भगवान कैसे यह संभव है? आप अचेत कैसे हो सकते हो?, और कौन आपको बंधी बना सकता है?”

तब जाम्बवन्त ने कहा, “ऋषि कश्यप की दो पत्नियां कद्रू और विनीता (अर्थ : ज्ञान, लज्जावान) थीं। कद्रू ने हजारों नागो को जन्म दिया जिन्हें पृथ्वी पर साँपो केपूर्वजमाना जाता है। विनीता ने शक्तिशाली गरुड़ को जन्म दिया।

एक बार कद्रू और विनीता घोड़े उच्चैहश्र्वास (अर्थ : लंबे कान या जोर का झुकाव) की पूंछ के रंग पर एक शर्त लगाती है । उच्चैहश्र्वास सात सिरों वाला, उड़ने वाला एक समुद्री घोड़ा था जो महासागर मंथन के या समुद्र मंथन के दौरान प्रकट हुआ था।

कद्रू ने दावा किया कि उच्चैहश्र्वास की पूंछ का रंग काला है और विनीता ने दावा किया कि यह सफेद है।तो यह शर्त रखी गई की जिसकी बात झूठी निकलेगी वह दूसरे की सेवा करेगी।कद्रू ने अपने पुत्रोंनागोंको उच्चैहश्र्वास की पूंछ पर लटक कर छल से उसे काला दिखाने का आदेश दिया । इस प्रकार, दैवीय घोड़े की सफेद पूंछ काली प्रतीत होने लगी क्योंकि उस पर कद्रू के पुत्र नाग लटक गए थे । इस प्रकार विनीता और गरुड़ को कद्रू की सेवा करने के लिए मजबूर किया गया । उनके साथ कद्रू और उनके पुत्रो ने बहुत बुरी तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया।

बाद में नाग, गरुड़ और उनकी माँ को मुक्त करने को इस शर्त पर सहमत हुए, यदि गरुड़ देवताओं के राजा इंद्र के कब्जे में स्थित अमृत, को लाकर उन्हें देगा।गरुड़ ने स्वर्ग से अमृत प्राप्त किया और स्वयं और अपनी माँ को कद्रू और उनके पुत्र नागों की दासता से मुक्त करा दिया। लेकिन धोखाधड़ी और अपमान ने गरुड़ को नागों/सांपों का प्रतिद्वंद्वी बना दिया।

जब गरुड़ ने इंद्र से अमृत के बर्तन को चुराया, तो इंद्र शक्तिशाली पक्षी गरुड़ की ताकत से ईर्ष्यावान था, परन्तु भगवान विष्णु गरुड़ की अखंडता से प्रभावित थे क्योंकि गरुड़ ने खुद के लिए अमृत की एक बूंद भी नहीं ली थी तो भगवान विष्णु ने गरुड़ से वरदान माँगने को कहा।

गरुड़ ने तुरंत कहा कि वह भगवान विष्णु सेउच्चपद चाहते हैं। भगवान विष्णु, जो सभी चालकियों के स्वामीहैं, उन्होंने गरुड़ से अपने ध्वज को सजाने के लिए ध्वज पर हमेशा बने रहने को कहा क्योंकि ध्वज हमेशा जीव से ऊपर ही होता है।

इसके अतरिक्त भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा, “भविष्य में जब मैं राम के रूप में पृथ्वी पर अवतार लूँगा तो आप एक बार मेरा जीवन बचायेंगे, और उस दिन आप निश्चित रूप से मेरे से उच्च पद पर होंगे क्योंकि जीवन बचाने वाला व्यक्ति हमेशा उससे ऊपर रहता है जिसका जीवन उसने बचाया है”

गरुड़ की भक्ति से भगवान विष्णु इतने प्रभावित हुए की उन्होंने गरुड़ को अपना स्थायी वाहन बना लिया।

गरुड़ की शादी उन्नति (अर्थ : प्रगति की भावना) से हुई, उनके दो बेटे हुए सम्पती जिनसे हम देवी सीता की खोज के समय समुद्र तट पर मिले थे, और दूसरे जटायु थे जिन्होंने रावण से देवी सीता को बचाने के लिए अपना जीवन खो दिया”

 

© आशीष कुमार  

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 22 ☆ संगति का असर होता है ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का आलेख “संगति का असर होता है”‘आज तक न कांटों को महकने का सलीका आया और न फूलों को चुभना आया’, इस कथन में जो विरोधाभास है उस के इर्द गिर्द यह विमर्श अत्यंत विचारणीय है एवं आपको निश्चित ही विचार करने के लिए बाध्य कर देगा। आलेख के मूल में हम पाते हैं  कि हमें अच्छी या बुरी संगति की पहचान  होनी चाहिए एवं अपने स्वभाव को बदलने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। इस महत्वपूर्ण  एवं सकारात्मक तथ्य पर डॉ मुक्ता जी ने बड़े ही सहज तरीके से अपनी बात रखी है। ) 

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – # 22 ☆

 

☆ संगति का असर होता है 

झूठ कहते हैं, संगति का असर होता है। ‘आज तक न कांटों को महकने का सलीका आया और न फूलों को चुभना आया’ कितना विरोधाभास निहित है इस कथन में…यह सोचने पर विवश करता है, क्या वास्तव में संगति का प्रभाव नहीं होता? हम बरसों से यही सुनते आए हैं कि अच्छी संगति का असर अच्छा होता है।सो! बुरी संगति से बचना ही श्रेयस्कर है। जैसी संगति में आप रहेंगे, लोग आप को वैसा ही समझेंगे। बुरी संगति मानव को अंधी गलियों में धकेल देती है, जहां से लौटना नामुमक़िन होता है। वैसे ही उसे दलदल-कीचड़ की संज्ञा दी गयी है। यदि आप कीचड़  में कंकड़ फेंकेंगे, तो छींटे अवश्य ही आपके दामन को मैला कर देगे। सो! इनसे सदैव दूर रहना चाहिए। इतना ही क्यों ‘Better alone than a bad company.’ अर्थात् ‘बुरी संगति से अकेला भला।’ हां! पुस्तकों को सबसे अच्छा मित्र स्वीकारा गया है जो हमें सत्मार्ग की ओर ले जाती हैं।
परंतु इस दलील का क्या… ‘आज तक न कांटों को महकने का सलीका आया, न फूलों को चुभना रास आया’ अंतर्मन में ऊहापोह की स्थिति उत्पन्न करता है और मस्तिष्क को उद्वेलित ही नहीं करता, झिंझोड़ कर रख देता है। हम सोचने पर विवश हो जाते हैं कि आखिर सत्य क्या है? इसके बारे में जानकारी प्राप्त करना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे परमात्मा की सत्ता व गुणों का बखान करना। हम समझ नहीं पाते …आखिर सत्य क्या है? इसे भी परमात्मा के असीम  -अलौकिक गुणों को शब्दबद्ध करने की भांति असंभव है। शायद! इसीलिए उस नियंता के बारे में लोग नेति-नेति कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं।
परमात्मा निर्गुण, निराकार, अनश्वर व सर्वव्यापक है। उसकी महिमा अपरम्पार है। वह सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है और उसकी महिमा का बखान करना मानव के वश से बाहर है। यहां भी विरोधाभास स्पष्ट झलकता है कि जो निराकार है…जिसका रूप- आकार नहीं, जो निर्गुण है.. सत्, रज,तम तीनों गुणों से परे है, जो निर्विकार अर्थात् दोषों से रहित है तथा जिसमें शील, शक्ति व सौंदर्य का  समन्वय है…वह श्रद्धेय है, आराध्य है, वंदनीय है।
प्रश्न उठता है, जो शब्द ब्रह्म हमारे अंतर्मन में बसता है, उसे बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं, उसे मन की एकाग्रता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। एकाग्रता ध्यान की वह स्थिति है, जिस में मानव क्षुद्र व तुच्छ वासनाओं से ऊपर उठ जाता है। परन्तु सांसारिक प्रलोभनों व मायाजाल में लिप्त बावरा मन, मृग की भांति उस कस्तूरी को पाने के निमित्त इत-उत भटकता रहता है और अंत में भूखा-प्यासा, सूर्य की किरणों में जल का आभास  पाकर अपने प्राण त्याग देता है। वही दशा मानव की है, जो नश्वर भौतिक संसार व मंदिर-मस्जिदों में उसे तलाशता रहता है, परंतु निष्फल। मृग-तृष्णाएं उसे पग-पग पर आजीवन भटकाती हैं। वह बावरा इस मायाजाल से  आजीवन मुक्त नहीं हो पाता और लख चौरासी के बंधनों में उलझा रहता है। उसे कहीं भी सुक़ून व आनंद की प्राप्ति नहीं होती।
जहां तक  कांटों को महकने का सलीका न आने का प्रश्न है, यह प्रकाश डालता है, मानव की आदतों पर, जो लाख प्रयास करने पर भी नहीं बदलतीं, क्योंकि यह हमें पूर्वजन्म  के संस्कारों के रूप में प्राप्त होती हैं। कुछ संस्कार हमें  पूर्वजों द्वारा प्रदत्त होते हैं। यह विभिन्न संबंधों के रूप में  हमें प्राप्त होते हैं, जिन्हें  प्राप्त करने में  हमारा कोई योगदान नहीं होता। परंतु कुछ संस्कार हमें माता-पिता, गुरुजनों व हमारी संस्कृति द्वारा प्राप्त होते हैं, जो हमारे चारित्रिक गुणों को विकसित करते हैं।अच्छे संस्कार हमें आदर्शवादी बनाते हैं और बुरे संस्कार हमें पथ-विचलित करते हैं  … हमें  संसार में अपयश दिलाते हैं। इन कुसंस्कारों के कारण समाज में हमारी निंदा होती है और लोग हमसे घृणा करना प्रारंभ कर देते हैं। बुरे लोगों का साथ देने से, हम पर उंगलियां उठना  स्वाभाविक है। क्योंकि ‘यह मथुरा काजर की कोठरी,  जे आवहिं ते कारे’ अर्थात् ‘जैसा संग वैसा रंग’। संगति का रंग अपना प्रभाव अवश्य छोड़ता है। कबीर दास जी की यह पंक्ति’ कोयला होई ना उजरा,सौ मन साबुन लाय’  कोयला सौ मन साबुन से धोने पर भी कभी उजला नहीं हो सकता अर्थात् मानव की जैसी प्रकृति-प्रवृत्ति होती है, सोच होती है, आदतें होती हैं, उनसे वह आजीवन वैसा ही व्यवहार करता है।
इंसान अपनी आदतों का गुलाम होता है और सदैव उनके अंकुश में रहता है तथा उनसे मुक्ति पाने में कभी भी समर्थ नहीं हो सकता। इसलिए कहा जाता है कि इंसान की आदतें, चिता की अग्नि में जलने के पश्चात् ही बदल सकती हैं। सो! प्रकृति के विभिन्न उपादान फूल, कांटे आदि अपना स्वभाव कैसे परिवर्तित कर सकते हैं? फूलों की प्रकृति है हंसना, मुस्कराना, बगिया के वातावरण को महकाना, आगंतुकों के हृदय को आह्लादित व उन्मादित करना। सो! वे कांटो के चुभने के दायित्व का वहन कैसे कर सकते हैं? इसी प्रकार शीतल, मंद, सुगंधित वायु याद दिलाती है प्रिय की, जिसके ज़ेहन में आने के परिणाम-स्वरूप समस्त वातावरण आंदोलित हो उठता है तथा मानव अपनी सुधबुध खो बैठता है।
यह तो हुआ स्वभाव, प्रकृति व आदतों के न बदलने का चिंतन, जो सार्वभौमिक सत्य है।  परंतु अच्छी आदतें सुसंस्कृत व अच्छे लोगों की संगति द्वारा बदली जा सकती है। हां! हमारे शास्त्र व अच्छी पुस्तकें इसमें बेहतर योगदान दे सकती हैं…उचित मार्गदर्शन कर जीवन की दिशा  बदल सकती हैं। जो मनुष्य नियमित रूप से ध्यान-मग्न रहता है…केवल अध्ययन नहीं, चिंतन-मनन करता है,आत्मावलोकन करता है, चित्तवृत्तियों पर अंकुश लगाता है, इच्छाओं की दास्तान स्वीकार नहीं करता। वह दुष्प्रवृत्तियों के इस मायाजाल से स्वत: मुक्ति प्राप्त कर सकता है… संस्कारों को धत्ता बता सकता है और अपने स्वभाव को बदलने में समर्थ हो सकता है।
सो! हम उक्त कथन को मिथ्या सिद्ध कर सकते हैं कि सत्संगति प्रभावहीन होती है क्योंकि फूल और कांटे अपना सहज स्वभाव-प्रभाव हरगिज़ नहीं छोड़ते। कांटे अवरोधक होते हैं, सहज विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं, सदैव चुभते हैं, पीड़ा पहुंचाते हैं, दूसरे को कष्ट में देखकर आनंदित होते हैं। दूसरी ओर फूल इस तथ्य से अवगत होते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है, फिर भी वे निराशा का दामन कभी नहीं थामते… अपना महकने व मुस्कुराने का स्वभाव नहीं त्यागते। इसलिए मानव को इनसे संदेश लेना चाहिए तथा जीवन में सदैव हंसना-मुस्कुराना चाहिए,क्योंकि खुश रहना जीवन की अनमोल कुंजी है, जीवन जीने का सलीका है।इसलिए हमें सदैव प्रसन्न रहना चाहिए ताकि दूसरे लोग भी हमें देखकर उल्लसित रह सकें और अपने कष्टों के चंगुल से मुक्ति प्राप्त कर सकें।
अंतत: मैं कहना चाहूंगी कि परमात्मा ने सबको समान बनाया है।इंसान कभी अच्छा-बुरा नहीं हो सकता…उसके कर्म-दुष्कर्म ही उसे अच्छा व बुरा बनाते हैं…उसकी सोच को सकारात्मक व नकारात्मक बनाते हैं। अपने सुकर्मों से ही प्राणी सब का प्रिय बन सकता है। जैसे प्रकृति अपना स्वभाव नहीं बदलती, धरा, सूर्य, चंद्र, नदियां, पर्वत, वृक्ष आदि निरंतर कर्मशील रहते हैं, नियत समय पर अपने कार्य को अंजाम देते हैं, अपने स्वभाव को विषम परिस्थितियों में भी नहीं त्यागते…सो! हमें इनसे प्रेरणा प्राप्त कर सत्य की राह का अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि इनमें परार्थ की भावना निहित रहती है…ये किसी को आघात नहीं पहुंचाते, किसी का बुरा नहीं चाहते। हमारा स्वभाव भी वृक्षों की भांति होना चाहिए। वे धूप, आतप, वर्षा, आंधी आदि के प्रहार सहन करने के पश्चात् भी तपस्वी की भांति खड़े रहते हैं, जबकि वे जानते हैं कि उन्हें अपने फलों का स्वाद नहीं चखना है। परंतु वे परोपकार हित सबको शीतल छाया व मीठे फल देते हैं, भले ही कोई  इन्हें कितनी भी हानि पहुंचाए। इसी प्रकार सूर्य की स्वर्णिम रश्मियां सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करती हैं, चंद्रमा व तारे अपने निश्चित समय पर दस्तक देते हैं तथा थके-हारे मानव को निद्रा देवी की आग़ोश में सुला देते हैं ताकि वे ताज़गी का अनुभव कर सकें तथा पुन:कार्य में तल्लीन हो सकें। इसी प्रकार वर्षा से होने से धरा पर हरीतिमा छा जाती है, जीवनदायिनी फसलें लहलहा उठती हैं सबसे बढ़कर ऋतु-परिवर्तन जीवन की एकरसता को मिटाता है।
मानव का स्वभाव चंचल है। वह एक-सी मन:स्थिति में रहना पसंद नहीं करता। परंतु जब हम प्रकृति से छेड़छाड़ करते हैं, तो उसका संतुलन बिगड़ जाता है, जो भूकंप, सुनामी, भयंकर बाढ़, पर्वत दरकने आदि के रूप में समय-समय पर प्रकट होते हैं।यह कोटिशः सत्य है कि जब प्रकृति के विभिन्न उपादान अपना स्वभाव नहीं बदलते,तो मानव क्यों अपना स्वभाव बदले…जीवन में बुरी राहों का अनुसरण करे तथा दूसरों को व्यर्थ हानि पहुंचाए? सो! जैसा व्यवहार आप दूसरों से करते हैं, वही लौटकर आपके पास आता है। इसलिये सदैव अच्छा सोचिए,अच्छा बोलिए, अच्छा कीजिए, अच्छा दीजिए व अच्छा लीजिए। यदि दूसरा व्यक्ति आपके प्रति दुर्भावना रखता है, दुष्कर्म करता है, तो कबीर दास जी के दोहे का स्मरण कीजिए ‘जो ताको  कांटा  बुवै, ते बूवै ताको फूल अर्थात् आपको फूल के बदले फूल मिलेंगे और कांटे बोने वाले को शूल ही प्राप्त होंगे। इसलिए इस सिद्धांत को जीवन में धारण कर लीजिए कि शुभ का फल शुभ अथवा कल्याणकारी होता है। यह भी शाश्वत सत्य है कि कुटिल मनुष्य कभी भी अपनी कुटिलता का त्याग नहीं करता,जैसे सांप को जितना भी दूध पिलाओ, वह काटने का स्वभाव नहीं त्यागता। इसलिए ऐसे दुष्ट लोगों से सदैव सावधान रहना चाहिए… उनकी फ़ितरत पर विश्वास करना स्वयं को संकट में डालना है तथा उनका साथ देना अपने चरित्र पर लांछन लगाना है, कालिख़ पोतना है। सो! मानव के लिए, दूसरों के व्यवहार के प्रतिक्रिया-स्वरूप अपना स्वभाव न बदलने में ही अपना व सबका हित है, सबका मंगल है।

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – 1.  राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

हम  “संजय दृष्टि” के माध्यम से  आपके लिए कुछ विशेष श्रंखलाएं भी समय समय पर प्रकाशित  करते रहते हैं। ऐसी ही एक श्रृंखला दीपोत्सव पर “दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप” तीन दिनों तक आपके चिंतन मनन के लिए प्रकाशित  की गई थी।  कल स्व सरदार वल्लभ भाई पटेल जी का जन्मदिवस  था जो राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं।  इस अवसर पर श्री संजय भारद्वाज जी का आलेख  “राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका”  एक विशेष महत्व रखता है।  इस लम्बे आलेख को हम कुछ अंकों में विभाजित कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वास है आप इसमें निहित विचारों को गंभीरता पूर्वक आत्मसात करेंगे।

– हेमन्त बावनकर

 ☆ संजय दृष्टि  –  1.  राष्ट्रीय एकात्मता में लोक की भूमिका

लोक अर्थात समाज की इकाई। समाज अर्थात लोक का विस्तार। यही कारण है कि ‘इहलोक’, ‘परलोक’ ‘देवलोक’, ‘पाताललोक’, ‘त्रिलोक’ जैसे शब्दों का प्रयोग हुआ। गणित में इकाई के बिना दहाई का अस्तित्व नहीं होता। लोक की प्रकृति भिन्न है। लोक-गणित में इकाई अपने होने का श्रेय दहाई कोे देती है। दहाई पर आश्रित इकाई का अनन्य उदाहरण है, ‘उबूंटू!’

दक्षिण अफ्रीका के जुलू  आदिवासियों की बोली का एक शब्द है ‘उबूंटू।’ सहकारिता और प्रबंधन के क्षेत्र में ‘उबूंटू’ आदर्श बन चुका है। अपनी संस्था ‘हिंदी आंदोलन परिवार’ में अभिवादन के लिए हम ‘उबूंटू’ का ही उपयोग करते हैं। हमारे सदस्य विभिन्न आयोजनों में मिलने पर परस्पर ‘उबूंटू’ ही कहते हैं।

इस संबंध में एक लोककथा है। एक यूरोपियन मनोविज्ञानी अफ्रीका के आदिवासियों के एक टोले में गया। बच्चों में प्रतिद्वंदिता बढ़ाने के भाव से उसने एक टोकरी में मिठाइयाँ भर कर पेड़ के नीचे रख दी। उसने टोले के बच्चों के बीच दौड़ का आयोजन किया और घोषणा की कि जो बच्चा दौड़कर सबसे पहले टोकरी तक जायेगा, सारी मिठाई उसकी होगी। जैसे ही मनोविज्ञानी ने दौड़ आरम्भ करने की घोषणा की, बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा, एक साथ टोकरे के पास पहुँचे और सबने मिठाइयाँ आपस में समान रूप से वितरित कर लीं। आश्चर्यचकित मनोविज्ञानी ने जानना चाहा कि यह सब क्या है तो बच्चों ने एक साथ उत्तर दिया,‘उबूंटू!’ उसे बताया गया कि ‘उबूंटू’ का अर्थ है,‘हम हैं, इसलिए ‘मैं’ हूँ। उसे पता चला कि आदिवासियों की संस्कृति सामूहिक जीवन में विश्वास रखता है, सामूहिकता ही उसका जीवनदर्शन है।

‘हम हैं, इसलिए मैं हूँ’ अनन्य होते हुए भी सहज दर्शन है। सामूहिकता में व्यक्ति के अस्तित्व का बोध तलाशने की यह वृत्ति पाथेय है। मछलियों की अनेक प्रजातियाँ समूह में रहती हैं। हमला होने पर एक साथ मुकाबला करती हैं। छितरती नहीं और आवश्यकता पड़ने पर सामूहिक रूप से काल के विकराल में समा जाती हैं।

लोक इसी भूमिका का निर्वाह करता है। वहाँ ‘मैं’ होता ही नहीं। जो कुछ हैे, ‘हम’ है। राष्ट्र भी ‘मैं’ से नहीं बनता। ‘हम’ का विस्तार है राष्ट्र। ‘देश’ या ‘राष्ट्र’ शब्द की मीमांसा इस लेख का उद्देश्य नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मानकों ने राष्ट्र (देश के अर्थ में) को सत्ता विशेष द्वारा शासित भूभाग  माना है। इस रूप में भी देखें तो लगभग 32, 87, 263 वर्ग किमी क्षेत्रफल का भारत राष्ट्र्र है। सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो इस भूमि की लोकसंस्कृति कम या अधिक मात्रा में अनेक एशियाई देशों यथा नेपाल, थाइलैंड, भूटान, मालदीव, मारीशस, बाँग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार, कम्बोडिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, तिब्बत, चीन तक फैली हुई है। इस रूप में देश भले अलग हों, एक लोकराष्ट्र है। लोकराष्ट्र भूभाग की वर्जना को स्वीकार नहीं करता। लोकराष्ट्र को परिभाषित करते हुए विष्णुपुराण के दूसरे स्कंध का तीसरा श्लोक  कहता है-

उत्तरं यत समुद्रस्य हिमद्रेश्चैव दक्षिणं
वर्ष तात भारतं नाम भारती यत्र संतति।

अर्थात उत्तर में हिमालय और दक्षिण में सागर से आबद्ध भूभाग का नाम भारत है। इसकी संतति या निवासी ‘भारती’ (कालांतर में ‘भारतीय’) कहलाते हैं।

……….क्रमशः

©  संजय भारद्वाज, पुणे

रात्रि 11:21 बजे, 21.9.19

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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