श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “वृंदावन हरियाली में मुस्कुराते मनमोहन”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९९ ☆
☆ जन्माष्टमी विशेष – वृंदावन हरियाली में मुस्कुराते मनमोहन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
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ग्वाल-बाल के संग नंदलाला,
मुरली मनोहर आ जाओ।
प्यासे-प्यासे इन नयनों को,
मनमोहन अब मत तरसाओ।।
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भक्त तिहारी राह तके हैं,
यशोदा प्यारे आ जाओ।
माखन-मिश्री के मतवाले,
माधव न्यारे आ जाओ।।
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कुंज-गलिन में राधा रानी
के मतवाले आ जाओ।
प्यासे-प्यासे इन नयनों को,
मनमोहन अब मत तरसाओ।।
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जब भाद्रपद की अँधेरी रात आस्था के दीपों से जगमगाने लगती है, तब मन के आकाश पर एक अनुपम छवि आकार लेती है—मोरपंख मुकुट धारण किए नटखट नंदलाल, अधरों पर सजी बाँसुरी और चारों ओर पसरा हुआ हरा-भरा वृंदावन। यह वही वृंदावन है, जहाँ प्रकृति केवल कृष्ण की लीलाओं की साक्षी नहीं थी, बल्कि स्वयं उनकी लीला का अभिन्न अंग थी।
कदंब की डालियाँ उनके झूलों की सखी थीं, यमुना उनकी चिर-सहचरी और गौवंश उनके वात्सल्य का विस्तार। वन-पथों पर बिखरी दूब, कुंजों की छाया, फूलों की सुगंध और पक्षियों का कलरव—इन सबके बीच कृष्ण का बालपन जैसे प्रकृति के हृदय पर लिखी कोई मधुर कविता था।
श्रीकृष्ण का जीवन हमें उस आत्मीय संबंध की स्मृति कराता है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक होते हैं। उनकी बाल लीलाओं में मिट्टी की सोंधी गंध है, यमुना की कल-कल है, वृक्षों की शीतल छाया है और जीव-जंतुओं के प्रति सहज करुणा है। इसलिए कृष्ण को जानना केवल उनके दर्शन को जानना नहीं, उस प्रकृति को भी समझना है, जिसमें उनकी चेतना ने आकार पाया।
आज हमारे चारों ओर कंक्रीट के जंगल फैलते जा रहे हैं और वास्तविक वन सिमट रहे हैं। नदियाँ अपना निर्मल स्वर खो रही हैं और पक्षियों का कलरव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। ऐसे समय में यह पर्व हमारे भीतर एक सहज प्रश्न जगाता है—क्या हमारी भक्ति केवल मंदिरों और झाँकियों तक सीमित रहेगी, या हम कृष्ण के उस वृंदावन को भी अपने जीवन में स्थान देंगे, जहाँ हरियाली स्वयं उत्सव थी?
उत्सव की सजावट में यदि जीवित पौधों, पत्तियों, फूलों, मिट्टी के दीपों और प्राकृतिक सामग्री को स्थान दिया जाए, तो सौंदर्य के साथ संवेदना भी जुड़ती है। लड्डू गोपाल के समीप रखा गया एक छोटा-सा पौधा केवल सजावट नहीं, बल्कि आने वाले कल के लिए जीवन का संकल्प बन सकता है।
क्यों न इस अवसर पर ‘एक पौधा कान्हा के नाम’ का संकल्प लिया जाए? पौधा लगाएँ, उसे सींचें, उसकी छाया बढ़ते देखें और उसके साथ अपने भीतर प्रकृति के प्रति प्रेम को भी अंकुरित होने दें।
कृष्ण ने हमें प्रेम का विस्तार सिखाया—मनुष्य से प्रेम, जीव-जंतुओं से करुणा और धरती से आत्मीयता। उनकी बाँसुरी की मधुर तान तभी सार्थक होगी, जब यमुना निर्मल बहे, वृक्षों पर फिर पक्षियों के बसेरे हों और हमारी धरती हरियाली की साँस लेती रहे।
कान्हा को केवल झूले में न झुलाएँ,
उनके वृंदावन को भी अपने जीवन में उतारें।
ऐसी भक्ति हो, जिसमें दीप भी जले और कोई पौधा भी रोपा जाए; ऐसी आराधना हो, जिसमें घंटियाँ भी गूँजें और पक्षियों का कलरव भी सुनाई दे; ऐसा उत्सव हो, जिसमें मंदिर ही नहीं, हमारी धरती भी मुस्कुराए।
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राह तके हैं गोपी सारी,
रास-रचैया आ जाओ।
संकट की घड़ियों में कृष्णा,
लाज-बचैया आ जाओ।।
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भक्तों के हिय आन समाने,
मीरा-मोहन आ जाओ।
प्यासे-प्यासे इन नयनों को,
मनमोहन अब मत तरसाओ।।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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