(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपराध-बोध…“।)
अभी अभी # १०४४ ⇒ आलेख – अपराध-बोध श्री प्रदीप शर्मा
अपराधियों को अपराध-बोध नहीं होता और जो निर्दोष होते हैं, वे अपराध-बोध के तले दबे रहते हैं। अपराध बोध, अपराध करने से अधिक घातक होता है।
अक्सर अवसाद और आत्महत्या की जड़ में यही अपराध-बोध होता है।
अपराध क्या है, यह कानून तय करता है। इंसान नैतिकता और अनैतिकता के चक्र में उलझा रहता है। जिसमें “लोग क्या कहेंगे” वाला भाव मुख्य रूप से हावी रहता है।।
सिगरेट पीना, शराब पीना अथवा झूठ बोलना कोई इतना बड़ा अपराध तो नहीं ! इन्हें अधिक से अधिक आप बुरी आदत अथवा लत कह सकते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ये तीनों ही आदतें आदमी में आत्म-विश्वास बढ़ाती हैं। एक तो गलत काम और उससे आत्म-विश्वास, विश्वास नहीं होता।
पान वाले की दुकान पर, घर में, सार्वजनिक स्थान में, कभी छुपकर, कभी खुले आम, जिस आत्म-विश्वास से लोग सिगरेट का धुआँ छोड़ते हैं, वह देखते ही बनता है। कोई भी बुरी आदत आसानी से नहीं छूटती। जिनकी इच्छा-शक्ति प्रबल होती है, वे बुरी आदतों से बाज आते हैं, कुछ इसे एक मानवीय कमज़ोरी मान, भरे मन से ही सही, आदतों के समक्ष आत्म-समर्पण कर देते हैं।।
अच्छी-बुरी आदत अपराध नहीं ! अपराध-बोध सकारात्मक भी हो सकता है, और नकारात्मक भी।
सकारात्मक अपराध-बोध में विवेक मन पर अंकुश लगाए बैठा रहता है, और छोटी से छोटी भूल होने पर भी, मन को आगाह किया करता है। जो आत्म-विश्लेषण करते रहते हैं, वे अपने अपराधों /भूलों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी कर लेते हैं।
इससे उनके मन का बोझ भी हल्का हो जाता है। ईसाइयों के confession, जैनियों का पर्युषण के वक्त जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा, और गाँधीजी के सत्य के प्रयोग इसी श्रेणी में आते हैं। प्रायश्चित अपराध-बोध से मुक्ति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है।
नकारात्मक अपराध-बोध की श्रेणी में ऐसी छोटी-मोटी भूलें होती हैं, जिन्हें व्यक्ति बड़ा मान बैठता है, और अंदर ही अंदर घुटते रहकर अवसाद की स्थिति निर्मित कर लेता है। यह स्थिति इतनी घातक होती है कि इसमें चित्त में अंधकार व्याप्त हो जाता है, और आत्महत्या के अलावा उसे कोई दूसरी राह नज़र नहीं आती। स्वाभिमानी, सच्चरित्र लोगों पर जब झूठे इल्ज़ाम या केस लगाए जाते हैं, तो उन्हें अपने स्वाभिमान को बचाने का कोई अन्य रास्ता दिखाई नहीं देता और वे आत्महत्या की ओर अग्रसर हो जाते हैं।।
आसाराम और राम-रहीम में कितना अपराध-बोध है, और वे किस हद तक अपराधी हैं, यह ईश्वर जाने, लेकिन जब भैय्यू महाराज जैसे कथित संत पारिवारिक समस्याओं के लिए स्वयं को ज़िम्मेदार मानते हुए स्वयं को गोली मारकर समाप्त कर लेते हैं, तो अपराध-बोध की सकारात्मकता, नकारात्मकता में बदल जाती है। इसका मतलब यह भी कतई नहीं कि आसाराम का सकारात्मकता से कुछ लेना-देना है। कुछ अपराधियों में अपराध-बोध होता ही नहीं।
इस तरह वे अपने आपको एक सच्चा अपराधी ही सिद्ध कर रहे होते हैं।
अपराध बुरा है, लेकिन अपराध-बोध उससे भी बुरा है। अपराध से बचें, और अपराध-बोध से भी ! छोटी-मोटी गलतियों को कबूलें, बड़ी गलतियों से तौबा करें। अनजाने में, अथवा आवेश में हुए अपराध के लिए प्रायश्चित करें। अपराध और अपराधी को संरक्षण देना जुर्म है और पाप भी।।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३४४ ☆ स्थितप्रज्ञ…
एक ऑटो रिक्शा ड्राइवर हमारी सोसायटी के पास ही रहा करते थे। सज्जन व्यक्ति थे।अकस्मात मृत्यु हो गई। एक दिन लगभग उसी जगह एक रिक्शा खड़ा देखा तो वे सज्जन याद आए। विचार उठा कि आदमी के जाने के बाद कोई उसे कितने दिन याद रखता है? चिता को अग्नि देने के बाद परिजनों के पास थोड़ी देर रुकने का समय भी नहीं होता।
एक घटना स्मरण हो आई। एक करीबी परिचित परिवार में शोक प्रसंग था। अंतिम संस्कार के समय, मैं श्मशान में उपस्थित था। सारी प्रक्रिया चल रही थी। लकड़ियाँ लगाई जा रही थीं। साथ के दाहकुंड में कुछ युवा एक अधेड़ की देह लेकर आए थे। उन्होंने नाममात्र लकड़ियाँ लेकर अधिकांश उपलों का उपयोग किया। श्मशान का कर्मचारी समझाता रह गया, पर केवल उपलों के उपयोग से से देह के शीघ्र फुँक जाने का गणित समझा कर अग्नि देने के तुरंत बाद वे सब चलते बने।
हमें सारी तैयारी में समय लगा। दाह दिया गया। तभी साथ वाले कुंड पर दृष्टि गई तो जो दृश्य दिखा, उससे भीतर तक मन हिल गया। मानो वीभत्स और विदारक एक साथ सामने हों। उस देह का एक पाँव अधजली अवस्था में लगभग पचास अंश में ऊपर की ओर उठ गया था। अधिकांश उपलों के जल जाने के कारण देह के कुछ अन्य भाग भी दिखाई दे रहे थे।
श्मशान के कर्मचारी से सम्पर्क करने पर उसने बताया कि हर दिन ऐसे एक-दो मामले तो होते ही हैं, जिनमें परिजन तुरंत चले जाते हैं। बाद में फोन करने पर भी नहीं आते। अंतत: मृत देह का समुचित संस्कार श्मशान के कर्मचारी ही करते हैं।
लोकमान्यता है कि जिसका कोई नहीं होता, उसका भी कोई न कोई होता है। अपनी कविता ‘स्थितप्रज्ञ’ याद हो आई-
💥 स्थितप्रज्ञ 💥
शव को / जलाते हैं / दफनाते हैं,
शोक, विलाप / रुदन, प्रलाप,
अस्थियाँ, माँस, / लकड़ियाँ, बाँस,
बंद मुट्ठी लिए / आदमी का आना,
मुट्ठी भर होकर / आदमी का जाना,
सब देखते हैं /सब समझते हैं,
निष्ठा से / अपना काम करते हैं,
श्मशान के ये कर्मचारी
परायों की भीड़ में /अपनों से लगते हैं,
घर लौटकर /रोज़ाना की सारी भूमिकाएँ
आनंद से निभाते हैं / विवाह, उत्सव
पर्व, त्यौहार /सभी मनाते हैं
खाते हैं, पीते हैं / नाचते हैं, गाते हैं,
स्थितप्रज्ञता को भगवान,
मोक्षद्वार घोषित करते हैं,
संभवत: / ऐसे ही लोगों को,
स्थितप्रज्ञ कहते हैं..!
विश्वास हो गया कि जिसका कोई नहीं होता, उसका भी कोई न कोई होता है। इस स्थितप्रज्ञता को प्रणाम !
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक शोधपरक आलेख – पंडवानी लोकगायन की विश्वविख्यात स्वर सम्राज्ञी: तीजनबाई।)
☆ आलेख – पंडवानी लोकगायन की विश्वविख्यात स्वर सम्राज्ञी: तीजनबाई☆ डाॅ राकेश सक्सेना
लोकगायन लोककला की आवाज़ है। यदि लोककला दीवारों पर दृष्टिगोचर होती है तो लोकगायन हवा में तैरता है और सीधे दिल में उतरता है। भारत के उत्तर प्रदेश,बिहार का विरहा, राजस्थान का मांड, बंगाल का बाउल, पूर्वी भारत का सोहर, बारहमासा और छत्तीसगढ का पंडवानी आदि प्रमुख लोकगायन के अन्तर्गत आते हैं। छत्तीसगढ की सांस्कृतिक पहचान के रूप में विकसित पंडवानी मूलत: महाभारत की कथाओं का लोकगायन है। इसमें कलाकार तंबूरा हाथ में लेकर कथा का गायन करता है और पात्रों के संवादों, युद्ध प्रसंगों तथा भावनात्मक घटनाओं का अभिनय भी करता चलता है। वेदमती और कपालिक पंडवानी गायन की दो प्रमुख शैलियाँ होती हैं। वेदमती शैली में कलाकार शान्त भाव से बैठकर प्रस्तुति करता है तथा कपालिक शैली में खड़े होकर अभिनय, संवाद, नाटकीयता के साथ ऊर्जावान प्रस्तुति की जाती है। लोकगायिका तीजनबाई ने पंडवानी की इसी कपालिक शैली को अभूतपूर्व ऊँचाइयाँ प्रदान की थीं। आपका जन्म 08 अगस्त 1956 ई० को छत्तीसगढ के दुर्ग जिले के गनियारी ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम हुनुकलाल पारथी और माता का नाम सुखवती देवी था। बचपन में आपको नाना ब्रजलाल पारथी से महाभारत की कहानियाँ सुनने का शौक पैदा हुआ और वे शीघ्र ही पंडवानी ( पाण्डव कथा ) की मुरीद हो गईं। तेरह वर्ष की उम्र में आपने पहली बार सार्वजनिक रूप से पंडवानी में प्रस्तुति दी, जिसकी दर्शकों ने सराहना तो की किन्तु समाज ने इसे स्वीकार नहीं किया। विरोधस्वरूप आपको सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ा लेकिन आपने हार नहीं मानी।
तीजनबाई की सोच थी कि यदि कला ईश्वर का वरदान है तो उसे समाज के डर से छोड़ा नहीं जा सकता। इसी आत्मविश्वास को लेकर आपने कम आयु में ही छोटे-छोटे गाँवों में प्रस्तुतियाँ देना प्रारम्भ कर दिया था। उनकी गायकी में बुलंद और प्रभावशाली स्वर, महाभारत के पात्रों का जीवंत अभिनय, सहज संवाद शैली, लोकभाषा का प्रभावी प्रयोग, भावानुकूल मुख मुद्राएँ, श्रोताओं से सीधा संवाद, तंबूरा का अभिनयात्मक प्रयोग आदि प्रमुख विशेषताएँ थीं। आप तंबूरा को कभी अर्जुन का गाण्डीव, कभी भीम की गदा, कभी दुर्योधन की तलवार तो कभी रथ का प्रतीक बना दिया करतीं थीं। आपकी कला में सहजता, मौलिकता, लोकजीवन की आत्मीयता, अभिनय की प्रखरता, गायन की अद्भुत शक्ति, कथावाचन की विलक्षण क्षमता दृष्टिगोचर होती थी। महाभारत के धार्मिक आख्यानों को आप मानव जीवन के संघर्ष, न्याय-अन्याय, धर्म, साहस, कर्तव्य और नैतिक मूल्यों की कथा के रूप में व्याख्यायित किया करतीं थीं। उनकी प्रस्तुति में भीम केवल बल का प्रतीक न होकर अन्याय प्रतिरोध का स्वर, अर्जुन केवल योद्धा नहीं, कर्तव्यनिष्ठ मनुष्य का प्रतीक, द्रोपदी नारी सम्मान और स्वाभिमान की प्रतिनिधि, कृष्ण नीति,विवेक और धर्म के मार्गदर्शक के रूप में उभरते हैं। इस प्रकार मनोरंजन के साथ-साथ पंडवानी में जीवन दर्शन भी प्रस्तुत किया। अपनी उत्कृष्ट प्रस्तुतियों के कारण ही तीजनबाई की ख्याति राज्य की सीमाओं से बाहर भी पहुँचने लगी। उनकी इस कला को पहचान दिलाने में अनेक सांस्कृतिक संस्थानों, संस्थाओं एवं विद्वानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शनै: शनै: राष्ट्रीय नाट्य समारोहों, संगीत महोत्सवों, लोककला उत्सवों, विश्वविद्यालयों में आकर्षण का केन्द्र बिन्दु बनने लगीं और एक दिन ऐसा आया जब आपने यूरोप, एशिया, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, रूस आदि के सांस्कृतिक समारोहों में प्रदर्शन करके यह प्रमाणित कर दिया कि लोककला भाषाओं की सीमा से परे होती है।
तीजनबाई को कला साधना के लिए 1988 ई०में पद्मश्री, 1995ई०में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 ई० में पद्मभूषण, 2018 ई० में फुकुओका प्राइज, 2019 ई० में पद्मविभूषण आदि अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया गया। छत्तीसगढी लोकभाषा को वैश्विक पहचान दिलाने में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। आज अनेक लोग पंडवानी पर शोधकार्य कर रहे हैं, नई पीढ़ी में लोकगायकी के प्रति रुचि उत्पन्न हो रही है, पंडवानी राष्ट्रीय संस्थानों तक पहुँच रही है, युवा कलाकारों को प्रशिक्षित किया जा रहा है, सांस्कृतिक आयोजनों में लोककला को प्रतिष्ठा मिल रही है। इसका एक बड़ा कारण आपकी प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ रहीं हैं। आपका जीवन भारतीय महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। आपने सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा सामाजिक बंधनों से बड़ी होती है। यदि महिलाएँ आत्मविश्वास और परिश्रम के साथ आगे बढ़ें तो वह विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना सकतीं हैं। लोककला, संघर्ष और साधना का पर्याय ‘ तीजनबाई ‘ आज हमारे मध्य नहीं हैं। यह महान कलाकारा 05 जुलाई 2026 ई० को रायपुर के एम्स अस्पताल में सत्तर वर्ष की आयु में हम सबको अलविदा कह गईं हैं लेकिन भारतीय लोक संस्कृति के इतिहास में सशक्त संवाहिका, इस परम्परा की संरक्षिका के रूप में आप हमेशा ही अजर-अमर रहेंगी।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ज़रूरतें व ख्वाहिशें। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – ये दुनिया है दो दिनों का मेला/ स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३२९ ☆
☆ ज़रूरतें व ख्वाहिशें… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘ज़रूरत के मुताबिक ज़िंदगी जीओ; ख्वाहिशों के मुताबिक नहीं, क्योंकि ज़रूरतें तो फ़कीरों की भी पूरी हो जाती हैं, मगर ख्वाहिशें बादशाहों की भी अधूरी रह जाती हैं।’ इच्छाएं सुरसा के मुख की भांति बढ़ती चली जाती हैं, जिनका अंत संभव नहीं होता। उनका आकाश बहुत विस्तृत है, अनंत है, असीम है और एक इच्छा के पश्चात् दूसरी इच्छा तुरंत जन्म ले लेती है, परंतु इन पर अंकुश लगाने में ही मानव का हित है। ख्वाहिशें एक ओर तो जीने का मक़सद हैं, कर्मशीलता का संदेश देती हैं, जिनके आधार पर हम निरंतर बढ़ते रहते हैं और हमारे अंतर्मन में कुछ करने का जुनून बना रहता है। दूसरी ओर संतोष व ठहराव हमारी ज़िंदगी में पूर्ण विराम लगा देता है और जीवन में करने को कुछ विशेष नहीं रह जाता।
ख्वाहिशें हमें प्रेरित करती हैं; एक गाइड की भांति दिशा निर्देश देती हैं, जिनका अनुसरण करते हुए हम उस मुक़ाम को प्राप्त कर लेते हैं, जो हमने निर्धारित किया है। इनके अभाव में ज़िंदगी थम जाती है। इंसान की मौलिक आवश्यकताएं रोटी, कपड़ा और मकान हैं। जहाँ तक ज़रूरतों का संबंध है, वे आसानी से पूरी हो जाती हैं। मानव शरीर पंच-तत्वों से निर्मित है और अंत में उन में ही समा जाता है। वैसे भी यह सब हमें प्रचुर मात्रा में प्रकृति प्रदत्त है, परंतु मानव की लालसा ने इन्हें सुलभ-प्राप्य नहीं रहने दिया। जल तो पहले से ही बंद बोतलों में बिकने लगा है। अब तो वायु भी सिलेंडरों में बिकने लगी है।
कोरोना काल में हम वायु की महत्ता जान चुके हैं। लाखों रुपए में एक सिलेंडर भी उपलब्ध नहीं था। उस स्थिति में हमें आभास होता है कि हम कितनी वायु प्रतिदिन ग्रहण करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़कर पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। परंतु प्रभुकृपा से वायु हमें मुफ्त में मिलती है, परंतु प्रदूषण के कारण आजकल इसका अभाव होने लगा है। प्रदूषण के लिए दोषी हम स्वयं हैं। जंगलों को काटकर कंक्रीट के घर बनाना, कारखानों की प्रदूषित वायु व जल हमारी श्वास-क्रिया को प्रदूषित करते हैं। गंदा जल नदियों के जल को प्रदूषित कर रहा है, जिसके कारण हमें शुद्ध जल की प्राप्ति नहीं हो पाती।
सो! ज़रूरतें तो फ़कीरों की भी पूरी हो जाती है, परंतु ख़्वाहिशें राजाओं की भी पूरी नहीं हो पाती, जिसका उदाहरण हिटलर है। उसने सारी सृष्टि पर आधिपत्य प्राप्त करना चाहा, परंतु जीवन की अंतिम वेला में उसे ज्ञात हुआ कि अंतकाल में इस जहान से व्यक्ति खाली हाथ जाता है। इसलिए आजीवन राज्य विस्तार के निमित्त आक्रमणकारी नीति को अपनाना ग़लत है, निष्प्रयोजन है। सम्राट अशोक इसके जीवित प्रमाण हैं। उसने सम्राट के रूप में सारी दुनिया पर शासन कायम करना चाहा और निरंतर युद्ध करता रहा। अंत में उसे ज्ञात हुआ कि यह जीवन का मक़सद अर्थात् प्रयोजन नहीं है। सो! उसने सब कुछ छोड़कर बौद्ध धर्म को अपना लिया।
‘यह किराये का मकान है/ कौन कब तक ठहर पाएगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा।’ यहाँ हर इंसान मुसाफ़िर है। वह खाली हाथ आता है और खाली हाथ चला जाता है। इसलिए संचय की प्रवृत्ति क्यों? ‘यह दुनिया है दो दिन का मेला/ हर शख़्स यहाँ है अकेला/ तन्हाई संग जीना सीख ले/ तू दिव्य खुशी पा जाएगा।’ स्वरचित गीतों की पंक्तियाँ इन भावों को पल्लवित करती हैं कि वैसे तो यह जन्म से पूर्व निश्चित हो जाता है कि वह कितनी साँसें लेगा? इसलिए मानव को अभिमान नहीं करना चाहिए तथा सृष्टि के कण-कण में परमात्मा की सत्ता अनुभव करनी चाहिए, जो उसे प्रभु सिमरन की ओर प्रवृत्त करती है।
सो! मानव को स्वयं को इच्छाओं का गुलाम नहीं बनाना चाहिए। यह बलवती इच्छाएं मानव को ग़लत कार्य करने को विवश करती हैं। उस स्थिति में वह उचित-अनुचित के भेद को नहीं स्वीकारता और नरक में गिरता चला जाता है। अंतत: वह चौरासी के चक्कर से आजीवन मुक्त नहीं हो पाता। इससे मुक्ति पाने का सर्वोत्तम उपाय है प्रभु सिमरन। जो व्यक्ति शरणागत हो जाता है, वह निर्भय होकर जीता है आगत- अनागत से बेखबर…उसे भविष्य की चिंता नहीं होती। जो गुज़र गया है, वह उसका स्मरण नहीं करता, बल्कि वह वर्तमान में जीता है और प्रभु का नाम स्मरण करता है और गीता का संदेश ‘जो हुआ, अच्छा हुआ/ जो होगा, अच्छा ही होगा ‘ वह इसे जीने का मूलमंत्र स्वीकारता है। प्रभु अपने भक्तों की कदम-कदम पर सहायता करता है।
अक्सर ज़्यादा पाने की चाहत में हमारे पास जितना उपलब्ध है, उसका आनंद लेना भूल जाते हैं। इसलिए संतोष को सर्वश्रेष्ठ धन स्वीकारा गया है। इसलिए कहा जाता है कि ‘श्रेय मिले ना मिले, अपना श्रेष्ठ देना बंद ना करें। आशा चाहे कितनी कम हो, निराशा से बेहतर होती है।’ इसलिए दूसरों से उम्मीद ना रखें और सत्कर्म करते रहें, क्योंकि यह ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल व ग़लती है, जो हमें पथ-विचलित करती है। इंसान का मन भी एक अथाह समुद्र है। किसी को क्या मालूम कि कितनी भावनाएं, संवेदनाएं, सुख-दु:ख, हादसे, स्मृतियाँ आदि उसमें समाई हैं। इसलिए वह मुखौटा धारण किए रखता है और दूसरों पर सत्य उजागर नहीं होने देता। परंतु इंसान कितना भी अमीर क्यों ना बन जाए, तकलीफ़ बेच नहीं सकता और सुक़ून खरीद नहीं सकता। वह नियति के हाथों का खिलौना है; विवश है, क्योंकि वह अपने निर्णय नहीं ले सकता।
‘जो तकलीफ़ तुम ख़ुद बर्दाश्त नहीं कर सकते, वो किसी दूसरे को भी मत दो।’ महात्मा बुद्ध का यह कथन अत्यंत कारग़र है। इसलिए वे दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार न करने का संदेश देते हैं, जिसकी अपेक्षा आप दूसरों से नहीं करते हैं। संसार में जो भी आप किसी को देते हैं, वह लौट कर आपके पास आता है। इसलिए दूसरों की ज़रूरतों की पूर्ति का माध्यम बनिए ताकि आपकी ख़्वाहिशें पूरी हो सकें। इसके साथ ही अपनी इच्छाओं आकाँक्षाओं, तमन्नाओं व लालसाओं पर अंकुश लगाइए, यही जीवन जीने की कला है।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
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संजय दृष्टि – वारी-लघुता से प्रभुता की यात्रा
(वारी यात्रा आज पुणे पहुँच रही है। इस संदर्भ में विशेष आलेख)
भारत की अधिकांश परंपराएं ऋतुचक्र से जुड़ी हुई एवं वैज्ञानिक कसौटी पर खरी उतरने वाली हैं। देवता विशेष के दर्शन के लिए पैदल तीर्थयात्रा करना इसी परंपरा की एक कड़ी है। संस्कृत में तीर्थ का शाब्दिक अर्थ है – पापों से तारनेवाला। यही कारण है कि तीर्थयात्रा को मनुष्य के मन पर पड़े पाप के बोझ से मुक्त होने या कुछ हल्का होने का मार्ग माना जाता है। स्कंदपुराण के काशीखण्ड में तीन प्रकार के तीर्थों का उल्लेख मिलता है – जंगम तीर्थ, स्थावर तीर्थ और मानस तीर्थ।
🙏 जय हरि विठ्ठल🙏
(आलंदी और देहू से हरि दर्शन के लिए पंढरपुर की 265 किमी की पदयात्रा अर्थात महाराष्ट्र की प्रसिद्ध वारी। यह वारी आज पुणे पहुँची। मेरे एक वरिष्ठ मित्र ने लगभग 14 वर्ष पूर्व वारी का वीडियो शूट किया था। उस आधार पर वारी की जानकारी विशेषकर हिंदीभाषी समाज को देने के लिए एक डॉक्युमेंट्री फिल्म लिखी और उसे स्वर दिया। वारी पर आधारित इस फिल्म को 26 हज़ार से अधिक दर्शक देख चुके।)
स्थावर तीर्थ की पदयात्रा करने की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। महाराष्ट्र की प्रसिद्ध वारी इस परंपरा का स्थानीय संस्करण है।
पंढरपुर के विठ्ठल को लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले महाराष्ट्र के प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में मान्यता मिली। तभी से खेतों में बुआई करने के बाद पंढरपुर में विठ्ठल-रखुमाई (श्रीकृष्ण-रुक्मिणी) के दर्शन करने के लिए पैदल तीर्थ यात्रा करने की परंपरा जारी है। श्रीक्षेत्र आलंदी से ज्ञानेश्वर महाराज की चरणपादुकाएँ एवं श्रीक्षेत्र देहू से तुकाराम महाराज की चरणपादुकाएँ पालकी में लेकर पंढरपुर के विठोबा के दर्शन करने जाना महाराष्ट्र की सबसे बड़ी वारी है।
पहले लोग व्यक्तिगत स्तर पर दर्शन करने जाते थे। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, स्वाभाविक था कि संग से संघ बना। 13 वीं शताब्दी आते-आते वारी गाजे-बाजे के साथ समारोह पूर्वक होने लगी।
वारी का शाब्दिक अर्थ है-अपने इष्ट देवता के दर्शन के लिए विशिष्ट दिन,विशिष्ट कालावधि में आना, दर्शन की परंपरा में सातत्य रखना। वारी करनेवाला ‘वारीकर’ कहलाया। कालांतर में वारीकर ‘वारकरी’ के रूप में रुढ़ हो गया। शनैःशनैः वारकरी एक संप्रदाय के रूप में विकसित हुआ।
अपने-अपने गाँव से सीधे पंढरपुर की यात्रा करने वालों को देहू पहुँचकर एक साथ यात्रा पर निकलने की व्यवस्था को जन्म देने का श्रेय संत नारायण महाराज को है। नारायण महाराज संत तुकाराम के सबसे छोटे पुत्र थे। ई.सन 1685 की ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी को वे तुकाराम महाराज की पादुकाएँ पालकी में लेकर देहू से निकले। अष्टमी को वे आलंदी पहुँचे। वहाँ से संत शिरोमणि ज्ञानेश्वर महाराज की चरण पादुकाएं पालकी में रखीं। इस प्रकार एक ही पालकी में ज्ञानोबा-तुकोबा (ज्ञानेश्वर-तुकाराम) के गगन भेदी उद्घोष के साथ वारी का विशाल समुदाय पंढरपुर की ओर चला।
अन्यान्य कारणों से भविष्य में देहू से तुकाराम महाराज की पालकी एवं आलंदी से ज्ञानेश्वर महाराज की पालकी अलग-अलग निकलने लगीं। समय के साथ वारी करने वालों की संख्या में विस्तार हुआ। इतने बड़े समुदाय को अनुशासित रखने की आवश्यकता अनुभव हुई। इस आवश्यकता को समझकर 19 वीं शताब्दी में वारी की संपूर्ण आकृति रचना हैबतराव बाबा आरफळकर ने की। अपनी विलक्षण दृष्टि एवं अनन्य प्रबंधन क्षमता के चलते हैबतराव बाबा ने वारी की ऐसी संरचना की जिसके चलते आज 21 वीं सदी में 10 लाख लोगों का समुदाय बिना किसी कठिनाई के एक साथ एक लय में चलता दिखाई देता है।
हैबतराव बाबा ने वारकरियों को समूहों में बांटा। ये समूह ‘दिंडी’ कहलाते हैं। सबसे आगे भगवा पताका लिए पताकाधारी चलता है। तत्पश्चात एक पंक्ति में चार लोग, इस अनुक्रम में चार-चार की पंक्तियों में अभंग (भजन) गाते हुए चलने वाले ‘टाळकरी’ (ळ=ल,टालकरी), इन्हीं टाळकरियों में बीच में उन्हें साज संगत करने वाला ‘मृदंगमणि’, टाळकरियों के पीछे पूरी दिंडी का सूत्र-संचालन करनेवाला विणेकरी, विणेकरी के पीछे सिर पर तुलसी वृंदावन और कलश लिए मातृशक्ति। दिंडी को अनुशासित रखने के लिए चोपदार।
वारी में सहभागी होने के लिए दूर-दराज के गाँवों से लाखों भक्त बिना किसी निमंत्रण के आलंदी और देहू पहुँचते हैं। चरपादुकाएँ लेकर चलने वाले रथ का घोड़ा आलंदी मंदिर के गर्भगृह में जाकर सर्वप्रथम ज्ञानेश्वर महाराज के दर्शन करता है। ज्ञानेश्वर महाराज को माउली याने चराचर की माँ भी कहा गया है। माउली को अवतार पांडुरंग अर्थात भगवान का अवतार माना जाता है। पंढरपुर की यात्रा आरंभ करने के लिए चरणपादुकाएँ दोनों मंदिरों से बाहर लाई जाती हैं। उक्ति है-‘ जब चराचर भी नहीं था, पंढरपुर यहीं था।’
चरण पादुकाएँ लिए पालकी का छत्र चंवर डुलाते एवं निरंतर पताका लहराते हुए चलते रहना कोई मामूली काम नहीं है। लगभग 260 कि.मी. की 800 घंटे की पदयात्रा में लाखों वारकरियों की भीड़ में पालकी का संतुलन बनाये रखना, छत्र-चंवर-ध्वज को टिकाये रखना अकल्पनीय है।
वारी स्वप्रेरित अनुशासन और श्रेष्ठ व्यवस्थापन का अनुष्ठान है। कुछ आंकड़े इसकी पुष्टि करने के लिए कुछ आंकड़े जानना पर्याप्त है-
– विभिन्न आरतियों में लगनेवाले नैवेद्य से लेकर रोज़मर्रा के प्रयोग की लगभग 15 हजार वस्तुओं (यहाँ तक की सुई धागा भी) का रजिस्टर तैयार किया जाता है। जिस दिन जो वस्तुएँ इस्तेमाल की जानी हैं, नियत समय पर वे बोरों में बांधकर रख दी जाती हैं।
– 15-20 हजार की जनसंख्या वाले गाँव में 10 लाख वारकरियों का समूह रात्रि का विश्राम करता है। ग्रामीण भारत में मूलभूत सुविधाओं की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में अद्वैत भाव के बिना गागर में सागर समाना संभव नहीं।
– सुबह और शाम का भोजन मिलाकर वारी में प्रतिदिन 20 लाख लोगों के लिए भोजन तैयार होता है।
– रोज़ाना 10 लाख लोग स्नान करते हैं, कम से कम 30 लाख कपड़े रोज धोये और सुखाये जाते हैं।
– रोज़ाना 50 लाख कप चाय बनती है।
– हर दिन लगभग 3 करोड़ लीटर पानी प्रयोग होता है।
– एक वारकरी दिन भर में यदि केवल एक हजार बार भी हरिनाम का जाप करता है तो 10 लाख लोगों द्वारा प्रतिदिन किये जानेवाले कुल जाप की संख्या 100 करोड़ हो जाती है। शतकोटि यज्ञ भला और क्या होगा?
– वारकरी दिनभर में लगभग 20 किलोमीटर पैदल चलता है। विज्ञान की दृष्टि से यह औसतन 26 हजार कैलोरी का व्यायाम है।
– जाने एवं लौटने की 33 दिनों की यात्रा में पालकी के दर्शन 24 घंटे खुले रहते हैं। इस दौरान लगभग 25 लाख भक्त चरण पादुकाओं के दर्शन करते हैं।
– इस यात्रा में औसतन 200 करोड़ का आर्थिक व्यवहार होता है।
– हर दिंडी के साथ दो ट्रक, पानी का एक टेंकर, एक जीप, याने कम से कम चार वाहन अनिवार्य रूप से होते हैं। इस प्रकार 500 अधिकृत समूहों के साथ कम से कम 2 हजार वाहन होते हैं।
– एकत्रित होने वाली राशि प्रतिदिन बैंक में जमा कर दी जाती है।
रथ की सजावट के लिए पुणे से रोज़ाना ताज़ा फूल आते हैं।
हर रात 7 से 8 घंटे के कठोर परिश्रम से रथ को विविध रूपों में सज्जित किया जाता है।
– एक पंक्ति में दिखनेवाली भक्तों की लगभग 15 किलोमीटर लम्बी ‘मूविंग ट्रेन’ 24 घंटे में चार बार विश्रांति के लिए बिखरती है और नियत समय पर स्वयंमेव जुड़कर फिर गंतव्य की यात्रा आरंभ कर देती है।
– गोल रिंगण अर्थात अश्व द्वारा की जानेवाली वृत्ताकार परिक्रमा हो, या समाज आरती, रात्रि के विश्राम की व्यवस्था हो या प्रातः समय पर प्रस्थान की तैयारी, लाखों का समुदाय अनुशासित सैनिकों-सा व्यवहार करता है।
– नाचते-गाते-झूमते अपने में मग्न वारकरी…पर चोपदार का हो का एक स्वर और संपूर्ण नीरव …… इस नीरव में मुखर होता है-वारकरियों का अनुशासन।
वारकरी से अपेक्षित है कि वह गले में तुलसी की माला पहने। ये माला वह किसी भी वरिष्ठ वारकरी को प्रणाम कर धारण कर सकता है। वारकरी संप्रदाय के लोकाचारों में शामिल है- माथे पर गोपीचंदन,धार्मिक ग्रंथों का नियमित वाचन, शाकाहार, सदाचार, सत्य बोलना, हाथ में भगवा पताका, सिर पर तुलसी वृंदावन, और जिह्वा पर राम-कृष्ण-हरि का संकीर्तन।
राम याने रमनेवाला-हृदय में आदर्श स्थापित करनेवाला, कृष्ण याने सद्गुरु-अपनी ओर खींचनेवाला और हरि याने भौतिकता का हरण करनेवाला।
राम-कृष्ण-हरि का अनुयायी वारकरी पालकी द्वारा विश्रांति की घोषणा से पहले कहीं रुकता नहीं, अपनी दिंडी छोड़ता नहीं, माउली को नैवेद्य अर्पित होने से पहले भोजन करता नहीं।
वारकरी कम से कम भौतिक आवश्यकताओं के साथ जीता है। वारी आधुनिक भौतिकता के सामने खड़ी सनातन आध्यात्मिकता है। आधुनिकता अपरिमित संसाधन जुटा-जुटाकर आदमी को बौना कर देती है। जबकि वारी लघुता से प्रभुता की यात्रा है। प्रभुता की यह दृष्टि है कि इस यात्रा में आपको मराठी भाषियों के साथ-साथ बड़ी संख्या में अमराठी भाषी भी मिल जायेंगे। भारतीयों के साथ विदेशी भी दिखेंगे। इस अथाह जन सागर की समरसता ऐसी कि वयोवृद्ध माँ को अपने कंधे पर बिठाये आज के श्रवण कुमार इसमें हिंदुत्व देखते हैं तो संत जैनब-बी ताउम्र इसमें इस्लाम का दर्शन करती रही।
वारी, यात्री में सम्यकता का अद्भुत भाव जगाती है। भाव ऐसा कि हर यात्री अपने सहयात्री को धन्य मान उसके चरणों में शीश नवाता है। सहयात्री भी साथी के पैरों में माथा टेक देता है।
जे-जे पाहिले भूत, ते-ते मानिले भगवंत……हर प्राणी में, हर जीव में माउली दिखने लगे हैं। किंतु असली माउली तो विनम्रता का ऐसा शिखर है जो दिखता आगे है , चलता पीछे है। यात्रा के एक मोड़ पर संतों की पालकियाँ अवतार पांडुरंग के रथ के आगे निकल जाती हैं। आगे चलते भगवान कब पीछे आ गये ,पता ही नहीं चलता।
संत कबीर कहते हैं-
कबीरा मन ऐसा भया, जैसा गंगा नीर पाछे-पाछे हरि फिरै, कहत कबीर-कबीर।
भक्तों की भीड़ हरिनाम का घोष करती हैं जबकि स्वयं हरि भक्तों के नाम-संकीर्तन में डूबे होते हैं।
भक्त रूपी भगवान की सेवा में अनेक संस्थाएँ और व्यक्ति भी जुटते हैं। ये सेवाभावी लोग डॉक्टरों की टीम से लेकर कपड़े इस्तरी करने, दाढ़ी बनाने, जूते-चप्पल मरम्मत करने जैसी सेवाएँ निःशुल्क उपलब्ध कराते हैं।
वारी भारत के धर्म सापेक्ष समाज का सजीव उदाहरण है। वारी असंख्य ओस कणों के एक होकर सागर बनने का जीता-जागता चित्र है। वस्तुतः ‘वा’ और ‘री’ के डेढ़-डेढ़ शब्दों से मिलकर बना वारी यात्रा प्रबंधन का वृहद शब्दकोश है।
– आनंद का असीम सागर है वारी..
– समर्पण की अथाह चाह है वारी…
– वारी-वारी, जन्म- मरणा ते वारी..
– जन्म से मरण तक की वारी…
– मरण से जन्म तक की वारी..
– जन्म-मरण की वारी से मुक्त होने के लिए भी वारी……
वारी देखने- पढ़ने या सुनने की नहीं अपितु अनुभव करने की यात्रा है। इस यात्रा में सम्मिलित होने के लिए महाराष्ट्र की पावन धरती आपको संकेत कर रही है। विदुषी इरावती कर्वे के शब्दों में -महाराष्ट्र अर्थात वह भूमि जहाँ का निवासी पंढरपुर की यात्रा करता है। जीवन में कम से कम एक बार वारी करके महाराष्ट्रवासी होने का सुख अवश्य अनुभव करें।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – १‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # १६ ☆
आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – १ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
आज मैं आपको ले चलती हूँ भारत के एक ऐसे जिले के किस्से सुनाने जो असीम विषमताओं को समेटे, सिंधुघाटी संस्कृति या हड़प्पा सभ्यता या सिंधु-सरस्वती सभ्यता से लेकर अत्याधुनिक बंदरगाह और ट्रेड के लिये जाना जाता हैl यहाँ की प्रजा खुमारी में जीती हैl यहाँ हड़प्पन वर्ल्ड संस्कृति का चौथा शहर धोलावीरा हैl वो धोलावीरा जो उस समय का एक बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र थाl यहाँ ओमान, अरब, इराक के व्यापारी समुद्र मार्ग से आकर व्यापार करते थेl इस बात की पुष्टि के लिये व्यापार के अवशेष यहाँ देखने को मिलते हैंl यह इतिहास का वह काल था जब मनुष्य ने टिन और ताम्बे के औजार और हथियार बनाने शुरू किये थेl यूनेस्को ने धोलावीरा को विश्व धरोहर में स्थान दिया है और भारत सरकार ने इसे गुजरात राज्य के चौथे विश्व धरोहर का नाम दे दियाl
पढ़ने में आता है कि जलवायु परिवर्तन एवं नदियों के सूखने के कारण वहाँ बहुत भयंकर सूखा पडा जिसके चलते लोगो को शहर छोड़ देना पड़ा और आज ये धोलावीरा खंडहर बन गयाl
ऐसा जिला जिसने अपने आप को विनाशकारी, दर्दनाक भूकंप से धराशाई होने पर भी पुनः संगठित कियाl ऐसा जिला जिसकी भूमि जो आज भी 23 प्रकार के खनिज सम्पदा अपने में समेटे हैl ऐसा जिला जहाँ दो बंदरगाह, चार हवाई अड्डे, दो ट्रेन टर्मिनस, पहाड़, रेगिस्तान और समुद्र सभी एक ही जगह पर दिखते हैंl
यह जिला हिंदूस्तान में क्षेत्रफल में सबसे बड़ा जिला है, जिसकी ब्रिटिश सरकार के समय अपनी स्वयं कि मुद्राएँ होती थींl
हाँ जी आप में से बहुत लोगों ने इसे पहचान ही लिया होगाl यह जिला हमारे देश भारत के उत्तर पश्चिम का, समुद्र में तैरते हुए कछुए जैसा दिखने वाला कच्छ हैl इसकी धरती शांत और रहस्यमयी जरूर है परन्तु यह धरती प्राकृतिक और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से अति संवेदनशील भी हैl हमारी सीमा सुरक्षा बल की सुरक्षा के कारण इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का अभेद्य प्रहरी भी कहा जाता हैl
इस जिले की पूर्वी सीमा राजस्थान को एक छोटे रण द्वारा छूती हैl पश्चिमी सीमा पर विशाल अरब सागर रेत के धोरों और लहरों का एक अद्वितीय संगम हैl उत्तर में पाकिस्तान और कच्छ का महान रण हैl साथ ही दक्षिण में कच्छ की खाड़ी हैl
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पतिव्रता…“।)
अभी अभी # १०४१ ⇒ आलेख – पतिव्रता श्री प्रदीप शर्मा
००० पतिव्रता ०००
जो पत्नी अपने पति के लिए व्रत-उपवास रखे, वह पतिव्रता कहलाती है। ये पतिव्रताएं भारतवर्ष में बहुतायत से पाई जाती हैं। पति, देव भी है, और परमेश्वर भी। पत्नी केवल धर्म-पत्नी है। धर्म-पिता, धर्म-भाई और धर्म-बहन तो होते हैं, लेकिन धर्म-पति नहीं होते।
पति चूँकि परमेश्वर होते हैं, इसलिए वे व्रत-उपवास नहीं रखते! हड़ताली तीज और करवा चौथ की तरह पत्नी के लिए कोई भी व्रत-उपवास के बंधनों से वे मुक्त रहते हैं। विवाह के वक्त सात फेरों में ही सात जन्मों का एडवांस बुकिंग हो जाता है। बहु-पत्नी होने पर सात जन्मों तक इन पत्नियों को बहुतायत से झेलना भी पड़ सकता है।।
अक्सर पतिव्रताएं, अगले जनम मोहे यही पति दीजो, के लिए और पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, लेकिन अपने पति को भूखा नहीं रखती। पतिव्रता का यही त्याग रिज़र्व बैंक के गवर्नर की तरह अगले जन्म में उसी पति के लिए वचन-बद्ध होता है, लेकिन नोटबन्दी की तरह इस वचन में शिथिलता भी लाई जा सकती है।
आदतन सभी पतिव्रताएं धार्मिक ही होती हैं। लेकिन उनके पुण्य एक अलिखित विधान के तहत 50 प्रतिशत पतिदेव को ट्रांसफर हो जाते हैं। पति तो एक धार्मिक, सुशील पत्नी पाकर ही धन्य हो जाता है, जब कि एक पतिव्रता, जैसा भी है, मेरा पति देवता है, मानकर अपने जीवन को धन्य मान लेती है।।
पत्नी को अन्नपूर्णा भी कहा गया है और गृह-लक्ष्मी भी! लेकिन यह अन्नपूर्णा अपने पति के भोजन करने के बाद ही अन्न ग्रहण करती है। दहेज में लक्ष्मी लाने के कारण ही वह लक्ष्मी कहलाती है और पति लक्ष्मी-पति होता है, स्वामी होता है, घर वाला होता है। पड़ोसियों की दृष्टि में ज़रूर वह उसकी घर-वाली होती है।
जब देश डिजिटल हो रहा है, तो पुरानी मान्यताएँ भी बदल रही हैं। पतिदेव भी आजकल धर्म-पत्नी के लिए व्रत-उपवास रखने लगे हैं। चाँद सी महबूबा के होते हुए वे क्यूँ पति-व्रताओं की देखादेखी करवा-चौथ के दिन चलनी की आड़ में चाँद को देख अपना व्रत तोड़ें।।
21 वीं सदी साथ-साथ चलने की है। महिला सशक्तिकरण ने पति-व्रताओं के दायरे बढ़ा दिए हैं।
अब वह पति के चरणों की दासी नहीं, पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली सह-धर्मिणी हो गई है। अपनी मर्यादा में रहते हुए वह सभी कर्त्तव्यों का पालन भी कर लेती है और घर-गृहस्थी सुचारू रूप से चलाते हुए, तीज-व्रत-उपवासों का भी मनोयोग से पालन करते हुए, अपने जीवन को धन्य करती है।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “हर मन माली बनकर जीने लगे…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९३ ☆
☆हर मन माली बनकर जीने लगे… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
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चाहत मन की ज्योति, बढ़ेगी देखो कैसे।
उम्मीदों से प्रीत,जीतते हरदम जैसे।।
हरियाली की बात, करेगा जब सब कोई।
सूखे को दें मात, देख धरती खुश होई।।
धरती को हरा-भरा बनाने का स्वप्न केवल वृक्षारोपण अभियानों से पूरा नहीं होगा; उसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक मन माली बनकर जीना सीखे। माली होना केवल पौधों को पानी देना नहीं, बल्कि उनके साथ आत्मीय संबंध स्थापित करना है।
आज घरों में पौधे सजावट का हिस्सा बन गए हैं। वे ड्रॉइंग रूम, बालकनी और उद्यान की शोभा तो बढ़ाते हैं, पर अनेक बार हमारा संबंध उनसे वहीं तक सीमित रह जाता है। हम उन्हें वस्तु की तरह रखते हैं, परिवार के सदस्य की तरह नहीं। परिणामस्वरूप हरियाली का विस्तार नहीं, केवल प्रदर्शन बढ़ता है।
भारतीय संस्कृति ने वृक्षों और पौधों को सदैव जीवन का सहचर माना है। तुलसी, पीपल, वट, नीम और बेल जैसे वृक्ष केवल वनस्पति नहीं रहे, बल्कि श्रद्धा, संरक्षण और सहअस्तित्व के प्रतीक बने। यह परंपरा हमें बताती है कि प्रकृति से जुड़ाव केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं करता, बल्कि मनुष्य के भीतर संवेदना, धैर्य और करुणा का भी विकास करता है।
समय आ गया है कि हम पौधों को केवल सजावटी वस्तु नहीं, अपने जीवन का अभिन्न अंग मानें। जब किसी नए पत्ते के निकलने पर हमें उतनी ही प्रसन्नता होगी जितनी किसी अपने की मुस्कान पर होती है, तब हर घर सचमुच एक छोटा-सा उपवन बन जाएगा। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर के माली को जागृत कर ले, तो हरियाली केवल बगीचों में नहीं, हमारे विचारों और व्यवहार में भी दिखाई देगी। यही हरित चेतना आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे सुंदर विरासत सिद्ध होगी।
(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक शोधपरक आलेख – चापेकर बंधु: भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के प्रथम संगठित शहीद।)
☆ आलेख – चापेकर बंधु: भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के प्रथम संगठित शहीद ☆ डाॅ राकेश सक्सेना
चापेकर बंधु महाराष्ट्र पुणे के निकट चिंचवड़ ग्राम के तीन सगे भाई थे जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सशस्त्र क्रांति की पहली चिंगारी जलाई थी। दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्ण हरि चापेकर, वासुदेव हरि चापेकर तीनों ब्राह्मण परिवार में जन्मे सगे भाई थे। इनके पिता हरिपंत चापेकर प्रसिद्ध कीर्तनकार तथा माता का नाम लक्ष्मीबाई था। तीनों भाई बचपन में पिता के साथ कीर्तन में सहभाग किया करते थे। महर्षि पटवर्धन और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक इनके आदर्श थे। तिलक की प्रेरणा से इन भाइयों ने युवकों का ‘ व्यायाम मण्डल ‘ बनाया जिसमें 1894 ई० से हर वर्ष शिवाजी और गणेश महोत्सव प्रारम्भ किया। 12 जून 1897ई० में जब पहली बार शिवाजी उत्सव मनाया गया तो इन भाइयों ने बड़े ही उत्साह के साथ इसमें सहभाग किया। इन्होंने इस उत्सव में जो श्लोक गाए, उसका अर्थ था कि शिवाजी की गाथा दुहराने से आज़ादी नहीं मिल सकती। हमें तो शिवाजी और बाजीराव की भाँति कमर कसकर संघर्ष करना होगा, आज़ादी हित तलवार उठानी होगी। हम मारकर ही मरेंगे और आप लोग घर बैठे औरतों की तरह हमारी कहानी को सुनोगे। इसी प्रकार गणेश उत्सव पर इन भाइयों ने गाया, जिसका भाव था कि मर जाओ किन्तु पहले अँग्रेजों को मारो! चुप मत बैठो! पृथ्वी पर बोझ मत बढ़ाओ! हमारे देश का नाम हिन्दुस्तान है, फिर यहाँ अँग्रेज क्यों राज्य करते हैं? ये थी चापेकर बंधुओं की अँग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की ललकार।
दामोदर बचपन से ही सैनिक बनना चाहते थे इसलिए वे व्यायाम और सैन्य प्रशिक्षण में रुचि लेते थे। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक पुणे भारतीय राष्ट्रवाद का प्रमुख केन्द्र बन चुका था। अँग्रेजी शासन भारतीय जनता का आर्थिक दोहन कर रहा था, कुटीर उद्योग नष्ट होने लगे और बेरोजगारी बढ़ रही थी, भारतीयों के साथ नस्लीय भेदभाव सामान्य बात थी। ब्रिटिश राज्य के खिलाफ दामोदर ने मुंबई में रानी विक्टोरिया के पुतले पर तारकोल पोतकर जूतों की माला पहनाई थी। वर्ष 1886 ई० के अंत में पुणे में ब्युबोनिक प्लेग फैला, जिसकी रोकथाम के लिए ब्रिटिश सरकार ने आईसीएस अधिकारी वाॅल्टर चार्ल्स रैंड को नियुक्त किया। प्लेग नियंत्रण के नाम पर अँग्रेज अधिकारियों का बिना अनुमति के घरों में प्रवेश करना, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करना, धार्मिक स्थलों का अपमान करना तथा लोगों की निजी सम्पत्ति को नष्ट करना आरम्भ कर दिया। तिलक ने ‘ केसरी ‘ समाचार पत्र में इसकी कड़ी आलोचना की, जिसके कारण उन्हें जेल हुई। चापेकर बंधुओं ने प्लेग के दौरान जनता की पीड़ा को निकट से देखा था। वे स्वयं प्रभावित परिवारों के सम्पर्क में आए और ब्रिटिश सैनिकों के दुर्व्यवहार के अनेक उदाहरणों के साक्षी बने थे इसलिए तीनों भाइयों ने विचार किया कि यदि ऐसे अत्याचारों का प्रतिरोध नहीं किया गया तो अँग्रेजी शासन और अधिक निरंकुश हो जाएगा, इसलिए इन्होंने अत्याचार के प्रतीक माने जाने वाले रैंड को दण्डित करने का निर्णय लिया। इन बंधुओं ने कई दिनों तक रैंड की गतिविधियों का अध्ययन किया तदन्तर 22 जून 1897 ई० को महारानी विक्टोरिया की 60वीं वर्षगाँठ के समारोह से लौटते समय दामोदर हरि चापेकर ने रैंड को और बालकृष्ण ने उसके सहायक लेफ्टिनेंट आयर्स्ट को गोली मार दी। यह भारत की आज़ादी की लड़ाई में पहला क्रांतिकारी धमाका था।
रैंड बध कांड ने ब्रिटिश प्रशासन की नींव हिला दी थी। आसपास के क्षेत्रों में तलाशी अभियान शुरू हुआ। इनाम के लालच में गणेश शंकर द्रविड़ और रामचंद्र द्रविड ने चापेकर बंधुओं के सम्बन्ध में जानकारी दी और ब्रिटिश पुलिस ने दामोदर हरि चापेकर को गिरफ्तार कर लिया अंतत: 18 अप्रैल 1899ई० को उनको फाँसी दे दी गई। बालकृष्ण हरि चापेकर और वासुदेव हरि चापेकर ने इस विश्वासघात को राष्ट्रद्रोह मानते हुए मुखबिर द्रविड बंधुओं को दण्डित करने का निर्णय लिया। सन् 1899ई०में दोनों मुखबिरों की हत्या कर दी गई। इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत ने और अधिक कठोर कार्यवाही करते हुए बालकृष्ण और वासुदेव दोनों को गिरफ्तार कर लिया अंतत: वासुदेव को 08 मई 1899 तथा बालकृष्ण को 12 मई 1899 ई०को फाँसी दे दी गई। इस प्रकार तीनों भाइयों ने राष्ट्र की स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
सारत: हम कह सकते हैं कि चापेकर बंधुओं का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अत्यन्त प्रेरक अध्याय है। इनकी शहादत ने युवाओं में आत्मविश्वास, संगठन और प्रतिरोध की भावना को नई दिशा दी, इसी कारण उन्हें भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के प्रथम संगठित शहीदों में अग्रणी स्थान प्राप्त है। महाराष्ट्र, बंगाल, पंजाब और उत्तर भारत के अनेक क्रांतिकारी संगठनों ने इन भाइयों के साहस से प्रेरणा प्राप्त की। विनायक दामोदर सावरकर के वैचारिक निर्माण पर चापेकर बंधुओं के बलिदान का गहरा प्रभाव माना जाता है। खुदीराम बोस, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खाँ, चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह आदि की भी कार्यशैली और वैचारिक पृष्ठभूमि भिन्न थी किन्तु इनके बलिदान की भावना में चापेकर बंधुओं की परम्परा स्पष्ट दिखाई देती है। इन बंधुओं का साहस, संगठन और राष्ट्रनिष्ठा हमारी अमूल्य धरोहर है इसलिए भारतीय इतिहास में इनका नाम सदैव आदर,श्रद्धा व गौरव के साथ स्मरण किया जाएगा।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “प्रेम जन्य अपराध” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२० ☆
आलेख – प्रेम जन्य अपराध श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
प्रेम मानव इतिहास की वह आदिम और शाश्वत ऊर्जा है, जो जीवन को अर्थ देती है, पर साथ ही वह अग्नि भी है जो मर्यादा की दीवारों को राख करने का साहस रखती है। समाज के ढाँचे को यदि एक स्थायित्व चाहिए, तो वह अक्सर परंपराओं, नियमों और दंड-विधानों के इर्द गिर्द बुना जाता है। इस व्यवस्था में ‘अपराध’ समाज का एक अवांछित अंग है, तो ‘प्रेम’ को समाज ने सदैव एक संदिग्ध, पर अनिवार्य अंग माना है।
प्रश्न यह है कि जो प्रेम जीवन का उत्सव होना चाहिए , वह हिंसा और छल की विभीषिका में क्यों बदल जाता है?
इंदौर की सोनम और पुणे की सिया द्वारा अपने प्रेमी की कुत्सित हत्या जैसी घटनाएँ इसी प्रश्न को एक भयावह समकालीन विमर्श में खड़ा करती हैं, जहाँ प्रेम की भाषा में अपराध की स्याही घुल गई है।
भारतीय मनीषा में प्रेम का स्वरूप कभी एक जैसा नहीं रहा। यदि हम ‘कामसूत्र’ के पन्नों को पलटें, तो वहाँ प्रेम को केवल शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि एक परिष्कृत संस्कृति और परस्पर विश्वास के रूप में स्थापित किया गया है। वहाँ प्रेम के लिए एक स्वतंत्र स्थान की कल्पना थी। परंतु, इसके समानांतर मनुस्मृति और धर्मशास्त्रीय परंपराओं का कठोर अनुशासन भी चलता रहा। यह हमारे सामाजिक इतिहास का चिरंतन द्वंद्व है। एक ओर हमने प्रेम को काव्य माना, दूसरी ओर समय के प्रवाह में उसे कुल और जाति के कठोर अनुशासनों में कैद करने की कुचेष्टा की। जब प्रेम के नैसर्गिक प्रवाह को सामाजिक दीवारों के भीतर जबरन मोड़ने की कोशिश की जाती है, तो वह अपना प्राकृतिक स्वभाव खोने लगता है। और यह धीरे-धीरे छल, अपराध और घुटन के विषैले अंकुर भी पैदा करता है।
सोनम और सिया की घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि आज का प्रेम जब अनियंत्रित और निकास रहित हो जाता है, तो वह मानवीय संवेदनाओं को त्याग देता है। फिल्मों में भी हमने इस अंतर्विरोध को बार-बार देखा है। कभी ‘इश्किया’ जैसी फिल्में प्रेम में छिपी उस काली छाया को दिखाती हैं, जहाँ जुनून अपराध का मार्ग प्रशस्त करता है, तो कभी थ्रिलर फिल्में यह दिखाती हैं कि कैसे रिश्तों के झूठ को छिपाने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है।
इंदौर और पुणे की ये समकालीन घटनाएँ मात्र दो व्यक्तियों का अपराध नहीं हैं। यह उस सामाजिक वातावरण की विफलता है जहाँ रिश्तों के टूटने को ‘अपमान’ से जोड़ दिया जाता है। माता पिता के अहम पर चोट माना जाता है। जब कोई व्यक्ति समाज के डर से अपना सच नहीं कह पाता, या जब वह अपने प्रेम को ‘स्वामित्व’ समझने लगता है, तब उसे लगने लगता है कि प्रेम को समाप्त करने का एकमात्र तरीका ‘सामने वाले को समाप्त करना’ है।
यह हिंसा उस भावनात्मक परिपक्वता का अभाव है, जिसे हमारा शिक्षा तंत्र और पारिवारिक ढांचा कभी सिखा ही नहीं पाया।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि प्रेम का भाव स्वयं में नैसर्गिक स्वरूप में कभी अपराधी नहीं होता। अपराध तब जन्म लेता है जब प्रेम ‘उत्तरदायित्व’ से मुक्त होकर ‘स्वार्थ’ और ‘स्वामित्व’ की बेड़ियों में जकड़ जाता है। जब समाज प्रेम को अनुमति और निषेध के बीच सीमित कर देता है, तो युवा मन संवाद की स्वस्थ भूमि खो देता है। परिणामस्वरूप, संबंध या तो पूरी तरह आदर्शीकृत हो जाते हैं, या फिर वे अपराधीकरण की ओर ढल जाते हैं।
इन घटनाओं में मीडिया की भूमिका भी कम गंभीर नहीं है, जो अपराध को एक सनसनीखेज कहानी की तरह परोसता है, जिससे समाज में डर तो फैलता है, लेकिन अपराध के पीछे के सामाजिक मनोविज्ञान पर चर्चा कम होती है।
कानून , जुनूनी प्रेम के सम्मुख निर्बल रह जाता है।
इस समस्या का समाधान दंड की कठोरता से परे, सामाजिक चेतना के विस्तार में निहित है। सबसे पहले, हमें परिवारों के भीतर संवाद का एक नया वातावरण बनाना होगा। बच्चों को केवल अकादमिक शिक्षा नहीं, बल्कि भावनात्मक साक्षरता देनी होगी ताकि उन्हें यह समझ हो कि रिश्ता टूटना जीवन का अंत नहीं है। विवाह को एक सामाजिक सौदे से ऊपर उठाकर मानवीय सहमति का क्षेत्र बनाना होगा, जहाँ व्यक्ति अपनी असहमति को बिना किसी डर के व्यक्त कर सके। कानूनों का पालन अपनी जगह अनिवार्य है, लेकिन समाज को भी यह समझना होगा कि किसी भी अपराध को ‘प्रेम का नाम’ देकर उसे रोमांटिसाइज करना बंद करना होगा।
अंततः, प्रेम और अपराध के इस दुष्चक्र को तोड़ने का एकमात्र उपाय प्रेम को अधिक मानवीय और अधिक ईमानदार बनाना है।
हमें समाज में ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी जहाँ व्यक्ति का सम्मान उसकी ‘मर्यादा’ से नहीं, बल्कि उसकी ‘संवेदनशीलता’ से आंका जाए। जब प्रेम में ईमानदारी होगी, तो उसे छिपाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, और जब छिपाने की जरूरत नहीं होगी, तो अपराध अपनी छाया में स्वतः गुम होकर सिमट जाएगा।
प्रेम की असली गरिमा उसे अनारकली सा दीवारों में कैद करने में नहीं, बल्कि उसे उत्तरदायित्व और परिपक्वता के खुले आकाश में जीने देने में है।