श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
☆ आलेख ☆ || अक्षरमाला की पाठशाला || ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆
कक्षा नर्सरी की अक्षरमाला के किताब में अक्षरों को पढ़ाते हुये शिक्षकों ने कहा नहीं बस अबोध मन को रटाते सीखते रहे।
जीवन के बढ़ते आपाधापी में तर्कशील शब्दों ने सुझाव दिया समाधान रटाने और पढ़ाने से नहींं बल्कि गढ़ने से सफल होता है,
दोहरे चरित्र की मिट्टी से बना समाज ऊपर से कुछ और अंदर से कुछ और दर्शाता केवल व्यवहार व परिस्थितियां से तय करता है कि दोषी कौन है?
‘जब भगवान् कृष्णा का जन्म कारावास में हुआ तो दोषी कंस ही क्यों बना’ आखिर बाकी समाज के बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी भी तो देवकी का दोषी थी। बात महाभारत की हो तो अपने ही राज्य के हक के लिए अर्जुन को लड़ना पड़ा, वह भी अपने ही रक्त से परन्तु पंचाली और गंधारी का दोषी अभिमान से चुप चाप बैठा था, गर्वित क्यों?
अत:खुद के लिए एक अक्षरमाला की पुस्तिका बनाना सीखना चाहिए नारी शक्ति को जिसमें प से पंतग के साथ पंख भी लिखा हो।
वह पुस्तक ज्ञान देने के साथ अधिकार के लिए लड़ना भी सिखाता हो। शायद उस मे श से शुरुआत लिखा हो और अ से अधिकार लिखा हो, प से परंपरा लिखा हो व अ से अत्याचार का अंत भी लिखा हो!
श्रीकृष्ण के भगवत् गीता के जैसे अन्याय से लड़ने की बातें अबोध मन को अक्षरमाला के पुस्तकों के माध्यम से बचपन से ही शिक्षकों द्वारा पढाना शुरू किया जाना चाहिए।
~ मन की अभिव्यक्ति~
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© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर, उत्तरप्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





