श्री प्रदीप शर्मा

(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में  “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”

दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ “मौलाना साहब”।) 

☆  दस्तावेज़ # ३४ – मौलाना साहब☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆ 

शहर के व्यस्ततम, एम जी रोड पर हमारी दुकान के पास ही मौलाना साहब की फूलों की दुकान थी। असली फूलों की नहीं, गुरुदत्त वाले नकली कागज़ के फूलों की। मौलाना साहब ने अपनी दुकान सजाने के लिए किसी के गुलशन को नहीं उजाड़ा, बस कुछ रंग बिरंगे काग़ज़ के टुकड़ों को मिलाकर फूलों का गुलदस्ता तैयार कर लिया। उनके गुलाब में अगर खुशबू नहीं होती थी, तो कांटे भी नहीं होते थे।

मौलाना साहब उनका असली नाम नहीं था ! उन्हें मौलाना क्यों कहते थे, वे कितनी जमात पढ़े थे, हमें इसका इल्म नहीं था। बस पिताजी इन्हें मौलाना साहब कहते थे, इसलिए हम भी कहते थे। एक शांत, सौम्य, दाढ़ी वाला चेहरा, जो सदा मुस्कुराता रहता था। पड़ोसी दुकानदार होने के नाते, पहली चाय मौलाना साहब और हमारे पिताजी साथ साथ ही पीते थे। तब दुकान खुली छोड़कर चाय पीने जाने का रिवाज नहीं था। चाय दुकान पर ही पी जाती थी .क्योंकि दुकान, दुकान नहीं पेढ़ी थी। रोजी रोटी का साधन थी।।  

आज भी अगर कोई दुकानदार अपनी दुकान खोलेगा तो पहले पेढ़ी को प्रणाम करेगा, साफ सफाई करेगा, अपने आराध्य के चित्र पर श्रद्धा से अगरबत्ती लगाएगा, इसके बाद ही कारोबार शुरू करेगा। श्रृद्धा का ईमान से कितना लेना देना है, यह एक अलग विषय है। श्रृद्धा, श्रृद्धा है, ईमान ईमान।

हमारी दुकान के आसपास लगता था, पूरा भारत बसा हुआ हो। कोई दर्जी, कोई गोली बिस्किट वाला तो कोई पेन, घड़ी और चश्मे वाला। एक संगीत के वाद्यों की दुकान भी थी, जिसका नाम ही वीणा था। एक रैदास था, जो सुबह पिताजी के जूते पॉलिश करने के लिए ले जाता था, और थोड़ी देर बाद वापस रख जाता था। एक शू मेकर भी थे, जिनके पास चार पांच कारीगर थे।।  

हमारी और मौलाना साहब की दुकान एक साथ ही खुलती थी। हमारी दुकान के दूसरी ओर बिना तले समोसे और बिस्किट की प्रसिद्ध एवरफ्रेश की दुकान थी, जहां शहर के खास लोग, शाम को घूमने और टाइम पास करने आते थे। सड़कों पर आवागमन तो रहता था, लेकिन उसे आप चहल पहल ही कह सकते हैं, भीड़भाड़ नहीं। ईद पर हमारा पूरा परिवार मौलाना साहब के घर सिवइयां खाने जाता था।

हमें इस रहस्य का पता बहुत दिनों बाद चला, जब मौलाना साहब और हमारे पिताजी दोनों इस दुनिया में नहीं रहे। राखी के दिन मौलाना साहब की बेगम हमारे पिताजी का इंतजार करती थी। उनकी कलाई पर एक राखी बेगम के हाथों से भी बंधी होती थी। स्नेह के बंधन कभी काग़ज़ी नहीं होते। उनमें भी प्यार की खुशबू होती है।।  

सुबह का समय सभ दुकानदारों का मिलने जुलने का रहता था। जैसे जैसे दिन चढ़ता, ग्राहकी बढ़ने लगती, लोग अपने काम में लग जाते। दोपहर का वक्त भोजन का होता था। अक्सर सभी के डब्बे घर से आ जाया करते थे। तब टिफिन और लंच जैसे शब्द प्रचलन में नहीं थे। गुरुवार को बाज़ार बंद रहता था, और हर गुरुवार को सिनेमाघरों में नई फिल्म रिलीज होती थी। कालांतर में, दूरदर्शन पर रविवार को रामानंद सागर के रामायण सीरियल के कारण यह अवकाश गुरुवार की जगह रविवार कर दिया गया। अब कहां रामायण सीरियल और शहर के सिनेमाघर ! हर दुकानदार के पास अपने हाथ में ही, अपना अपना चलता फिरता सिनेमाघर, अर्थात् 4 जी मोबाइल जो उपलब्ध है।।  

वार त्योहारों पर मौलाना साहब के यहां लोग अपने दुपहिया वाहनों का श्रृंगार काग़ज़ के हार फूल और रंग बिरंगी पत्तियों से करते थे। दशहरे पर नई खरीदी साइकिल को दुल्हन की तरह सजाया जाता था। शादियों में जिस तरह दूल्हा दुल्हन को ले जाने वाली कार की आजकल जिस तरह सजावट, बनाव श्रृंगार होता है, वैसा ही साइकिल का होता था। विशेष रूप से दूध वाले अपनी नई साइकिलों का श्रृंगार मनोयोग से करते थे, क्योंकि वही उनका दूध वाहन भी था।

आज मौलाना साहब इस दुनिया में नहीं हैं, उनकी काग़ज़ के फूलों की दुकान फल फूल रही है। कल की एक दुकान का विस्तार हो चला है, वह छोटी से बहुत बड़ी हो चुकी है। परिवार की तीसरी पीढ़ी उसी परंपरा का निर्वाह कर रही है। आज के कृत्रिम संसार में कभी न मुरझाने वाले हार फूलों का ही महत्व है। आज की रंग बिरंगी दुनिया वैसे भी किसी काग़ज़ के फूल से कम नहीं।।  

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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जगत सिंह बिष्ट
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साधुवाद!🙏