डॉ. अनिल कुमार वर्मा

(ई-अभिव्यक्ति में सुविख्यात वास्तु एवं ज्योपैथिक स्ट्रैस कंसल्टेंट डॉ अनिल कुमार वर्मा जी का स्वागत। हरिद्वार के एक प्रतिष्ठित संस्थान द्वारा मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित। बहुचर्चित पुस्तक “विजयी चुनाव वास्तु”  के रचयिता। कृषि अभियंता, जवाहरलाल कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर में अध्ययन एवं अध्यापन, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त मुख्य प्रबंधक। संपर्क: askvastu.com)

(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में  “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”

दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है डॉ अनिल कुमार वर्मा जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ पुणे यूनिवर्सिटी और ‘धूल का फूल’ की शूटिंग ।) 

 ☆  दस्तावेज़ # ३७ – पुणे यूनिवर्सिटी और ‘धूल का फूल’ की शूटिंग ☆ डॉ अनिल कुमार वर्मा ☆

उन दिनों (1956-66) पिताजी स्व. ए.एल. वर्मा ARDE पुणे में पोस्टेड थे। हमारे परिवार को पुणे यूनिवर्सिटी के पास “ओल्ड बॉयज बटालियन”, गणेश खिंड में क्वार्टर मिला था।

घर से निकल कर हम बच्चे ‘औंध रोड’ पार करते और फिर यूनिवर्सिटी की बाउंड्री वॉल लांघ कर उसके बगीचे में घूमने पहुँच जाया करते थे।

🌿 वर्ष 1957 या 58 की बात है।

तब मेरी उम्र 7-8 वर्ष रही होगी। अचानक पता चला कि यूनिवर्सिटी में किसी फिल्म की शूटिंग हो रही है! हमने पहले कभी शूटिंग नहीं देखी थी, तो उत्साह चरम पर था।फिल्म थी बी.आर. चोपड़ा जी की “धूल का फूल”।

शूटिंग के दौरान हमने करीब से देखे – राजेंद्र कुमार, माला सिन्हा और महमूद।

महमूद साहब ने तो बच्चों के साथ हंसी-मजाक भी किया – वह दृश्य आज भी दिल में ताज़ा है।

🎥 दो दृश्य अब भी याद हैं:

1️⃣ एक सीन में राजेंद्र कुमार और माला सिन्हा की साइकिलें आपस में टकरा जाती हैं। असल में साइकिलें मुश्किल से छुई भर थीं, पर उन्हें गिरा दिया गया। फिर माला सिन्हा की साइकिल को क्रू के जूनियर सदस्यों ने हथौड़े से ठोंक-पीटकर तिरछा कर दिया ताकि अगला टेक अधिक “नेचुरल” लगे।

2️⃣ दूसरा दृश्य था – यूनिवर्सिटी में परीक्षा समाप्त होने का। उसमें राजेंद्र कुमार, माला सिन्हा और महमूद स्टूडेंट्स की भीड़ के साथ पेपर देकर बिल्डिंग से बाहर आते हैं।

⏳ लगभग 4 वर्ष बाद यूनिवर्सिटी गार्डन में लिया गया एक फैमिली फोटोग्राफ मुझे हाल ही में मिला। उस फोटो ने स्मृति चक्र घुमा दिया और मैं मानसिक रूप से उसी काल में लौट गया।

चित्र में: पिताजी (स्व. ए.एल. वर्मा), माताजी (सरला देवी), दूसरी पंक्ति में मैं स्वयं और मेरे भाई अजय व अरुण (दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं), सबसे आगे खड़े छोटे भाई अभय (AAP, मध्य प्रदेश के पूर्व संयोजक और मेरे चचेरे भाई) तथा डॉ. अनूप वर्मा (ENT सर्जन, रायपुर) नज़र आ रहे हैं।

🙏 सचमुच, वो काल, वे चेहरे और वे पल… स्मृतियाँ जीवन की अमूल्य धरोहर होती हैं।

वे हमें बीते समय से जोड़ती हैं, अपनों की याद दिलाती हैं और यह सिखाती हैं कि क्षणभंगुर जीवन में परिवार और रिश्तों से बढ़कर कुछ भी नहीं। 🌹

♥♥♥♥

© डॉ अनिल कुमार वर्मा 

संपर्क: askvastu.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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जगत सिंह बिष्ट

0 आदरणीय वर्मा साहब, प्रतिष्ठित ई-पत्रिका ई-अभिव्यक्ति में आपका हार्दिक स्वागत है। यह पत्रिका के पाठकों का सौभाग्य है कि अब उन्हें आपके रोचक और मूल्यवान संस्मरण पढ़ने को मिलेंगे। मुझे आपके साथ बैंक में काम करने का और आपके परिवार से परिचय का अवसर मिला है। मैं आपकी अध्ययनशीलता, सृजनात्मकता और गहन अवलोकन क्षमताओं का साक्षी रहा हूं और समय समय पर आपके संस्मरण पढ़ता रहा हूं। आपके संस्मरण वाकई अद्भुत और बेशकीमती हैं। आपकी स्मरणशक्ति और लेखन कला में सहजता और गहराई है। आपको पढ़कर आनंद की अनुभूति होती है और जिज्ञासा बढ़ती जाती है। आशा है, और… Read more »