श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखिका व कवयित्री श्रीमती अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
☆ संस्मरण ☆ गंवार सी स्त्री ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆
दादी एक शिक्षक की पत्नी थीं, पर उनका स्वभाव बिल्कुल माटी जैसा सरल था। बाबा जब भी उनके किस्से सुनाते, तो उनकी आँखें छलक उठतीं। वे अक्सर बताया करते थे कि कैसे दादी महुआ बिनने, सुखाने और पीसने से लेकर लकड़ी के चूल्हे पर रसोई बनाने तक का सारा काम अकेले हंसते-हंसते कर लेती थीं। उन दिनों पापा पटना में रहकर पढ़ाई भी करते थे और नौकरी भी; तब रात्रि पाठशालाएं (नाइट स्कूल) हुआ करती थीं। हमारा गाँव पटना से कोसों दूर था। उस दौर में आज जैसे सुख-साधन भले न रहे हों, पर मुश्किलों के समाधान ज़रूर थे और सबसे बढ़कर था — आपसी विश्वास की एक मजबूत नाव।
बाबा के परिवार की पृष्ठभूमि अम्मा के मायके से बिल्कुल उलट थी। जहाँ पापा एक साधारण शिक्षक और किसान के बेटे थे, वहीं अम्मा दरभंगा के एक संभ्रांत जमींदार परिवार की हंसमुख बेटी थीं। नियति ने दोनों का गठबंधन तो करा दिया, लेकिन बदले में अम्मा से उनका ऐश्वर्य और बहुत कुछ छीन लिया।
अम्मा अक्सर एक बात याद करती थीं कि एक बार नानी ने उनसे कहा था — “पति के चरण या ज़मीन के नीचे ही स्त्रियों का असली स्थान होता है।”
अम्मा ने अपनी माँ की इस सीख को गाँठ बांध लिया। वे अपनी सास (दादी) और बड़की माई के पदचिह्नों पर चुपचाप चल पड़ीं। वह ऐसा दौर था जब चावल बाज़ारों में पैकेटों में नहीं मिलते थे; धान को उबालना, सुखाना, कूटना और फटकना पड़ता था, तब कहीं जाकर थाली में भात सजता था। आटा और दाल की कहानी भी कुछ ऐसी ही मशक्कत भरी थी। घर कच्चे थे, जिन्हें संवारने के लिए मिट्टी और गोबर की ज़रूरत होती थी। द्वार पर बंधे मवेशियों से गोबर मिल जाता था। गृहस्थी के इन कामों को सहेजते-सहेजते जमींदार की वह बेटी न जाने कब सीधा पल्लू रखना भूल गई और सिर पर उल्टा पल्लू रखे कब इस गाँव की संस्कारी बहू बन गई, उसे खुद भी पता न चला।
मर्यादा ऐसी थी कि बड़े बाबूजी (जेठ जी) के सामने अम्मा कभी नहीं गईं और न ही बड़े बाबूजी कभी अम्मा के समक्ष आए। दादी की मृत्यु के बाद घर का नेतृत्व बड़की माई ने संभाला। उनके साए में पूरा परिवार हमेशा ‘संयुक्त‘ रहा। गाहे-बगाहे सब मिलते रहे।
तीज-त्योहार हो, शादी-ब्याह हो, या जीवन-मृत्यु का कोई अवसर—इन सब सामाजिक ताने-बाने को उन्हीं तथाकथित ‘गंवार‘ स्त्रियों ने मिलकर बखूबी चलाया। और तब तक चलाया, जब तक कि उस परिवार में ‘पढ़े-लिखे‘ लोगों का आगमन और हस्तक्षेप नहीं हुआ। जैसे ही आधुनिकता और शिक्षा का अहंकार घुसा, धीरे-धीरे गाँव का वह भरा-पूरा घर खाली होता चला गया। पुराने बुजुर्ग रहे नहीं और नई पीढ़ी आधुनिकता की चकाचौंध में रम गई।
अब आलम यह है कि आज के बच्चे अपने माता-पिता से पूछते हैं—
“पापा, क्या यह आटे का पेड़ है?”
तो पिता झेंपते हुए कहते हैं— “नहीं बेटा, यह गेहूँ का पौधा है।”
यह आधुनिक काल है या हमारी समझ का पतन, यह तो समझ से परे है। लेकिन इतना तो तय है कि आज के इन ‘समझदार‘ और पढ़े-लिखे लोगों से कहीं बेहतर वे ‘गंवार‘ लोग थे। वे चाहे जैसे भी थे, अपने भरे-पूरे कुनबे को एक डोर में बांधकर रखते तो थे! तीज-त्योहारों और गर्मियों की छुट्टियों में बेटियाँ और बुआ मायके की राह ताकती तो थीं!
परन्तु अब… अब अपनों के इंतज़ार की वह राह और वह गाँव का घर, दोनों ही बेनूर हो चुके हैं। अब कुछ नहीं बचा।
*— अभिलाषा श्रीवास्तव, गोरखपुर*
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© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर, उत्तरप्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




