श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गाढव।)

?अभी अभी # ९८० ⇒ आलेख – गाढव ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हर भाषा में कुछ शब्द बड़े प्यारे होते हैं, और अगर प्यार से बोले जाएं तो और भी प्यारे लगते हैं। शेक्सपीयर ने गुलाब का उदाहरण दिया। लेकिन अगर वे गुलाब की जगह किसी गधे का उदाहरण देते तो शायद बात नहीं बनती। हम जिसे चाहें उसे गधे की उपाधि दे सकते हैं, लेकिन गधे को हम किसी और अच्छे नाम से संबोधित नहीं कर सकते। हो सकता हो, यह कॉपीराइट का मामला हो।

कृष्ण चंदर ने एक गधे की आत्मकथा ही नहीं लिखी, वह उसे संसद तक ले भी गए और उसकी वापसी भी की। हमारे हिंदी के आचार्य हमें प्यार से कालिदास कहते थे। कालिदास कभी इतने विद्वान थे कि, जिस डाल पर बैठे होते थे, उसे ही काटते थे। सभी दासों के अपने अपने दासबोध हैं। रत्नावली के भी तुलसीदास थे। अगर रत्नावली उनके ज्ञान चक्षु नहीं खोलती, तो क्या संसार उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम के तुलसी के रूप में जान पाता।।

ज्ञान की वर्षा गुरुकुल में होती है, कोई कृष्ण बन जाता है तो कोई सुदामा रह जाता है। बचपन के मित्र जब बरसों बाद मिलते हैं तो वही बचपन लौट आता है जहां जीवन में सहजता थी, सरलता थी, आपस में प्यारे प्यारे संबोधन थे। हमारे एक आचार्य हरिहर लहरी अपने विशेष प्रिय शिष्यों को बजरबट्टू कहते थे। हम भी अपने किसी मित्र को आपस में सिंधी कहते थे तो किसी को सरदार। बम्मन और कढ़ी तो बड़ा आम था। तब क्या हम मूर्ख अथवा गधे थे, जो हमें ना तो बुरा लगता था और ना ही हमारी धार्मिक भावना आहत होती थी। आज सोचते हैं तो आश्चर्य होता है। ये कहां आ गए हम।

आज वाणी पर संयम रखना पड़ता है। आज की पीढ़ी बाप शब्द तक से भड़क जाती है। बाप तक कैसे पहुंच गए, आपकी सातों पुश्तें याद करा देंगे। गांव में जिस तरह आज भी वृद्धजनों के लिए डोकरा और डोकरी शब्द प्रचलित है, गुजराती में बच्चों को डीकरा और डीकरी कहकर पुकारा जाता है। हमारे बनारस के छोरा छोरी महाराष्ट्र में मुलगा मुलगी हो जाते हैं। कहीं पोरा पोरी तो हैदराबाद में पोट्टा पोट्टी। आजकल के छोटे बच्चे पोट्टी का कुछ और ही अर्थ समझते हैं।।

अब देखिए, कितना प्यारा है आज का शब्द गाढव।

ध्वनि में माधव से मिलता जुलता। अन्यथा ना लें, हमारे यहां मिट्टी के माधो भी होते हैं और गोबर गणेश भी। आज आप इतना तनकर चल रहे हैं, कभी जीवन में आपने भी बेवकूफी की होगी। किसी ने आपको प्यार में ही सही, गधा अथवा बेईमान भी अवश्य ही कहा होगा। छुपा लें हमसे, क्या क्या छुपाएंगे। कभी तो आपको वे पुराने दिन याद आएंगे।

बहुत लाद लिया अपने आप पर परिवार और जिम्मेदारियों का बोझ। कर ली बहुत गधा हम्माली। बस अब नहीं होता। आता है कभी कभी ऐसा खयाल। फिर भी दिल है कि मानता नहीं। थोड़ा किसी ने फुसलाया, गधे को बाप बनाया, अपुन खुश।

अपनों के बिना भी क्या जीना ! तेरे बिना भी क्या जीना ?

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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