श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दिहाड़ी श्रमिक…“।)
अभी अभी # ९८४ ⇒ आलेख – दिहाड़ी श्रमिक
श्री प्रदीप शर्मा
(1 मई पर विशेष)
मज़दूर और श्रमिक में वही अंतर है जो एक आदिवासी और वनवासी में है, या कि जो अंतर एक विकलांग और दिव्यांग में है। मज़दूर के पसीने से कम्युनिज्म की बू आती है। वह कभी सीधे मुँह बात नहीं करता। हमेशा हल्ला ही बोला करता है। श्रमिक शब्द बड़ा शालीन और सुसंस्कृत लगता है।
जब तक मेरे शहर में कपड़ा मिलों का बोलबाला था, मज़दूर एकता ज़िंदाबाद थी। हमारी सरकार ने मज़दूर को श्रमिक बनाकर पदोन्नत किया, दैनिक को दिहाड़ी किया। 70 साल में जो नहीं हुआ, हमने कर दिखाया।।
मेरे पास के चौराहे पर प्रशासन ने दिहाड़ी श्रमिकों के लिए एक शेड बनाया है जो सुनसान पड़ा रहता है और दिहाड़ी श्रमिकों का जमावड़ा सड़क पर एक भीड़ का स्वरूप अख्तयार कर लेता है। श्रमिक का मेहनती, स्वस्थ और तंदुरुस्त होना ज़रूरी है। कारीगर तो अपने हुनर का पारंगत होता है, उसका सेहत से क्या लेना देना।
ये दिहाड़ी श्रमिक साईकल पर नहीं, मोटर साईकल पर आते हैं। कोई दोस्त इन्हें छोड़ जाता है। एंड्राइड फ़ोन होना आजकल सम्पन्नता की निशानी नहीं, समझदारी की निशानी है। आप जब किसी कारण इनकी सेवाएँ प्राप्त करना चाहेंगे, तो ये पहले आपको ऊपर से नीचे तक निहारेंगे। मानो आपकी औकात पता कर रहे हों।
जब उन्हें खात्री हो जाती है कि आप श्रमिक नहीं, श्रमिक की सेवाएँ लेने आए हो, तो सम्मान से पूछते हैं, बाबूजी ! काम क्या है। आप काम समझाएं, उसके पहले वे आपको समस्या बता देंगे। एक आदमी के बस का काम नहीं है, अथवा एक दिन में जितना होगा कर देंगे।।
वैसे सरकार की न्यूनतम दर एक दिन की 873 ₹ है, आपको जो देना हो, दे देना। हर काम के विशेषज्ञ होते हैं यहाँ। रंग रोगन अथवा सुतारी का काम ठेके पर भी किया जाता है।
आपकी तक़दीर अच्छी हो तो दिहाड़ी मजदूर भी अच्छा ही मिल जाता है।
श्रम की महत्ता कभी कम नहीं होने वाली। सुतारी, बिजली का काम, प्लम्बर और रंग-रोगन जैसा काम आजकल कामकाजी नौकरीपेशा इंसान के बस का नहीं। कुछ काम श्रम में नहीं शर्म में आते हैं।
जब कभी घर की सीवेज लाइन चोक हो जाती है, विशेषज्ञ को ढूंढा जाता है। जो मिलता है, मुँह फाड़ता है। यह काम सबके बस का नहीं। मरता क्या न करता, मुंहमांगे दाम पर समस्या का निदान करवाया जाता है। व्हाट ए रिलीफ ?
इधर काम निकला, उधर प्रलाप शुरू ! छोटे से काम के इतने पैसे ? श्रम की महत्ता तब समझ में आती है, जब हम अपना देश छोड़ विदेश जाते हैं। वहाँ श्रम को केवल सम्मान ही नहीं, उचित मानदेय भी है।
एक छुट्टी मजदूरी वाले का कोई भविष्य नहीं ! जब ये संगठित होते हैं तो शोषक नज़र आते हैं। शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाना बग़ावत है, इसलिए समय रहते इन्हें कुचलना भी पड़ता है। इनके नेताओं के साथ समझौते भी करना पड़ते हैं। कभी ये सरकारें बनाते-गिराते थे, आजकल खुद ही गिरे हुए हैं।।
श्रम दिवस पर श्रम को सम्मान दीजिए, कल से जैसा चल रहा है, चलते रहने दीजिए। मज़दूर एकता ज़िंदाबाद..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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