श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खाली स्थान।)

?अभी अभी # ९८५ ⇒ आलेख – खाली स्थान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो भरा हुआ है, वह तो हमें दिखाई दे जाता है, लेकिन क्या जो खाली है, वह भी हम देख सकते हैं। हमें बैठना है, और सभी कुर्सियां जब भरी होती हैं, तब हमें एक खाली कुर्सी की तलाश होती है। जब हॉल में कोई नहीं होता, सभी कुर्सियां खाली ही होती हैं।

जब हम पढ़ते थे, तब खाली स्थानों को हमें भरना होता था। एक वाक्य के बीच में कुछ शब्दों की जगह खाली स्थान होता था, जिसे हमें अर्थपूर्ण शब्दों से भरना होता था।।

अर्थ और व्यर्थ की तरह खाली और भरा हुआ दोनों का अपना अपना महत्व है। पहले जो खाली होता है, उसको भरने की कोशिश की जाती है, और बाद में उसे ही खाली करने का प्रयास किया जाता है।

अगर हमें प्यास लगी है, तो एक खाली ग्लास हमारे किसी काम का नहीं। एक भरा हुआ पानी का ग्लास ही हमारी प्यास बुझा सकता है। हम पानी पी जाते हैं, ग्लास फिर खाली हो जाता है।

ग्लास कभी भरकर नहीं रखा जाता। खाली रहना ही उसकी नियति है। अगर वह भरेगा तो खाली होने के लिए ही। हमारे लिए एक खाली ग्लास का कोई महत्व नहीं। जब कि ग्लास को पीकर खाली हमने ही किया है। हम बड़े चतुर हैं, हम खाली स्थान का उपयोग अपने लिए ही करते हैं। बस, उसे भरते रहते हैं, खाली करते रहते हैं।।

हम जब भीड़ में होते हैं, तो एकांत ढूंढते हैं, और जब अकेले होते हैं, तो किसी का साथ तलाशते हैं। पेट खाली है, भूख लग रही है, पेट में फिर भी चूहे दौड़ रहे हैं। पेट को पहले भरा जा रहा है। भूख शांत हुई, हम संतुष्ट हुए। लेकिन कब तक ! बहुत हुआ, सुबह हो गई, अब पेट खाली करना है। सोचते रहिए अन्न का अर्थ और व्यर्थ का अर्थ।

खाली दिमाग शैतान का घर ! क्या किया जाए, कुछ सकारात्मक सोचा जाए, चिंतन मनन किया जाए। एक दिल सौ अफसाने। किस किसकी सुनें, किस किसकी मानें।

सोच सोचकर, चिंतन कर करकर, व्यर्थ की चिंता और बढ़ा ली। बहुत सोचते हो आप। अगर इसी तरह सोचते रहे तो अवसादग्रस्त हो जाओगे। ध्यान करो, चित्त को शांत करो, विचार शून्य रहने की कोशिश करो।।

इस धरती पर दो तिहाई पानी है, फिर भी इंसान की प्यास नहीं बुझती। कहीं वह जरूरत से अधिक भरा हुआ है तो कहीं अंदर से पूरा खाली है। जहां पैसा है, वहां चैन नहीं और जहां पैसा नहीं, वहां भी बैचेनी है। हर जगह एक खाली स्थान अभाव का है, जिसे हर प्राणी भरने की कोशिश करता है।

हम शून्य को भरने की कोशिश करते हैं। खाई में भी शून्य होता है। अमीरी गरीबी की खाई तो हम भर नहीं सकते, अपने अंक के आगे तो कई शून्य लगा सकते हैं। अपना अभाव दूर होते ही हमारा भाव भी बदल जाता है। एक संपन्न, भरा पूरा, सुखी परिवार।।

राजनीति में बहुत खाली स्थान है और हर खाली स्थान एक शैतान का घर है। हमारा मन भी एक चतुर, चंचल राजनीतिज्ञ ही है, उसके चुनाव पर किसी आयोग का कोई अंकुश नहीं। उसे विवेक के अधीन कर दीजिए, वह शांत हो जाएगा।

हमारे आसपास का शून्य तो हमें दिखाई नहीं देता, और हम अंदर से भरे भरे रहते हैं। शून्य खालीपन नहीं, अवसाद नहीं, असफलता नहीं, शून्य में सभी संभावनाएं हैं।

ग्लास अगर आधा खाली है तो आधा भरा भी है। सबके ग्लास भरे रहें, बूंद बूंद ही सही प्रेम और करुणा रस रिसता रहे।

कोई स्थान खाली ना हो, अमृत रस बरसता रहे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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