श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जियाजी …“।)
अभी अभी # ९९० ⇒ आलेख – जियाजी
श्री प्रदीप शर्मा
ज्ञान, बुद्धि और प्रेम तीनों में, कहने को तो ढाई आखर ही है, लेकिन सबसे ऊंची प्रेम सगाई ! ऐसा क्या है कि रिश्तों में ज्ञान और बुद्धि, दोनों की दाल नहीं गलती।
रिश्ते में तो हम उस आठ साल की बच्ची के क्या लगते थे, यह हम तब भी नहीं जानते थे, लेकिन बच्चे जो सुनते हैं, वही दोहरा देते हैं। हमने जगत ताऊ और जगत मामा बहुत देखे हैं। जब पीढ़ी समझदार हो जाती है, तो इन रिश्तों के खिलाफ बगावत कर बैठती है। कैसे चाचा नेहरू और कैसे महात्मा, माय फुट। कहा न ज्ञान और बुद्धि को प्रेम फूटी आंखों नहीं सुहाता।।
रिश्तों में सम्मान नहीं, प्रेम ढूंढा जाता है। जीजी कब जिज्जी हो जाती है, कुछ पता ही नहीं चलता। मां कहते कहते अनायास ही मुंह से अम्मा क्यों निकल जाता है। मम्मी कब मॉम हो गई पता नहीं चला। अच्छे भले डैडी भी डैडू बनने से नहीं बच पाए।
चाची का तो कुछ नहीं बिगड़ा, अच्छे भले चाचा, अचानक चाचू हो गए। खैर है, हम भी रिश्ते में भले ही जियाजी बन गए हों, कभी जीजू नहीं बने। नाम तो बनते बिगड़ते रहते हैं, बस रिश्तों में मिठास कायम रहे।
एक पत्नी जितनी उसके मायके जाकर खुश होती है, मेरा जैसा जालिम पति, कभी उतना ही अपने ससुराल जाकर नाराज़ होता था। बर्नार्ड शॉ कह गए हैं, जो चाहते हैं, वह पा लो। वर्ना जो पाया है, वही चाहने लग जाओगे। अब किसको क्या मिला, ये मुकद्दर की बात है। लेकिन आखिर बुद्धि और ज्ञान की हार हुई और प्रेम की जीत। हमने भी जो पाया, अंततः उसे ही चाहने लग गए।।
कुछ रिश्ते तो हम जन्म से ही ओढ़कर आते हैं और शादी के बाद तो कुछ रिश्ते आप पर बुरी तरह लपेट दिए जाते है। अग्नि के सात फेरों के साथ कुछ शासकीय प्राथमिक/माध्यमिक कन्या विद्यालय की छात्राओं का साली के रूप में प्रवेश हुआ। हम तब बड़े खूसट किस्म के इंसान थे (वैसे, आज भी हैं), रिश्तों के प्रेम और जज्बात नहीं समझते थे। छोटी छोटी सालियां हमें चोर निगाहों से हमें ऐसे देखा करती, जैसे चिड़िया घर में किसी खतरनाक प्राणी को देखा जाता है। हमारी वक्र दृष्टि उन पर पड़े, उसके पहले ही वह सरक कर, वहां से भाग जाती थी। ज्ञान, बुद्धि का तो हमें पता नहीं, लेकिन तब हममें प्रेम का नितांत अभाव था।
यह तो रिश्तों का एक तरह से श्री गणेश ही था। रिश्ते बनते हैं तो बढ़ते भी हैं और परिपक्व भी होते हैं।
एक मुंहबोली साली अन्य सालियों की देखा देखी मुझे भी जियाजी कहने लगी। मुझे उसका यह मासूम अपभ्रंश बहुत पसंद आया। पांचवी कक्षा में पढ़ने वाली यह साली जब स्कूल से आती तो मैं उसकी क्लास लेता। लाओ तुम्हारी हिंदी की किताब दो। सालों से पाठ्य पुस्तकों के दर्शन भी नहीं किए थे। बच्चों की याददाश्त अच्छी होती है। वे पूरा पाठ रट लेते हैं। हमें भी हमारे बचपन का पाठ, अमर घर चल, अनायास याद आ गया।।
मैं उससे कविता सुनाने का कहता, वंदे मातरम् और जन गण मन भी वह मनोयोग से सुनाती। वह बहुत आराम से, धीमी गति के समाचारों की तरह बड़े आराम से अपना एक वाक्य पूरा करती थी। जन गण मन वह बड़े आत्म विश्वास के साथ सुनाती थी। लेकिन बस अंत में तव शुभ नामे जागे, के बाद, तव शुभ आशिष मांगे को वह, अनजाने में, उसी मासूमियत से, तव शुभ आशिक मांगे, बोल जाती थी। और उसी सादगी, और भोलेपन में जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे, के बाद जय हिंद भी बोल देती थी।
कहा भी गया है, Ignorance is bliss. उसका जियाजी बोलना मुझे आज भी अच्छा लगता है लेकिन राष्ट्रगान की भूल मासूम होते हुए भी, उसमें सुधार आवश्यक था। उसे बड़े तरीके से उसकी गलती का अहसास कराया गया। हम सबका बचपन ऐसा ही होता है।।
आज वह बड़ी हो गई है, बाल बच्चे वाली हो गई है। जब भी मिलती है, मैं कहता हूं, अच्छा चलो जन गण मन सुनाओ और वह आज भी उसी अंदाज में जवाब देती है, क्या जियाजी आप भी ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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