श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अभिशप्त स्वामिभक्त।)

?अभी अभी # ९९७ ⇒ आलेख – अभिशप्त स्वामिभक्त ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

महाभारत समाप्त हो चुका है, लीलाधर श्रीकृष्ण अपनी लीला समेट चुके हैं, पाँचों पांडव स्वर्गारोहण के लिए बद्रिकाश्रम के वन में प्रवेश कर चुके हैं। बर्फ़ के पहाड़ में धर्मराज के चारों भाइयों के शरीर गल चुके हैं, और उन्होंने बर्फ में ही समाधि ले ली है। अकेले धर्मराज अपने स्वामिभक्त कुत्ते के साथ स्वर्ग के द्वार में प्रवेश कर चुके हैं। द्वारपाल उनका तो स्वागत करता है, लेकिन कुत्ते को स्वर्ग में प्रवेश नहीं देता। युधिष्ठिर भी कह देते हैं कि अगर मेरे साथ मेरे कुत्ते को स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता, तो मुझे भी स्वर्ग नहीं जाना। धर्मराज की जीत होती है। स्वामिभक्त श्वान धर्मराज के साथ शान से स्वर्ग में प्रवेश करते हैं।

यहां कहानी ख़त्म नहीं होती। एक कुत्ते की दास्तान शुरू होती है। कई प्रश्न खड़े होते हैं। धर्म की रक्षा के लिए बोला गया झूठ, झूठ नहीं माना जाता, शायद इसीलिए अश्वत्थामा हाथी के मरने पर नरो वा कुंजरो वा कहने पर भी धर्मराज के धर्म का सिंहासन नहीं डोलता। लेकिन द्यूत क्रीड़ा में उनकी हार यह दर्शाती है कि अधर्म के काम में कभी धर्म की विजय हो ही नहीं सकती। अगर द्यूत क्रीड़ा में धर्मराज जीत भी जाते तो मानवता को एक गलत संदेश जाता। जुए में हमेशा धर्म की हार ही होती है।।

कुत्ते की योनि भी भोग योनि ही है, लेकिन एक पशु योनि! केवल नर ही नहीं, सत्संग का असर तो पेड़ पौधों और पशु पक्षियों पर भी पड़ता है। गिरधर की मुरलिया हो या रविशंकर का सितार। बज जाता मन का तार तार। कुछ लोग उस कुत्ते के भाग्य को सराहते हैं, जो रईसों के यहां पलते, बढ़ते हैं। उसकी समझदारी और वफादारी की तारीफ करते नहीं थकते। लेकिन जब किसी आवारा कुत्ते को सड़क पर, किसी वाहन से कुचला पड़ा हुआ देखते हैं, तो मुंह से यही निकलता है, भगवान ऐसी कुत्ते की मौत किसी को ना दे।

एक ही पशु योनि का कुत्ता! एक धर्मराज के साथ स्वर्ग का भागी बनता है तो एक सड़क पर अपनी मौत मरता है। लेकिन दोनों जगह धर्मराज के धर्म की तरह, कुत्ते की स्वामिभक्ति कायम है, क्योंकि वफादारी उसका जन्मजात गुण है। धर्म को कभी वफादारी से अलग नहीं किया जा सकता। फिर भी स्वामिभक्त होते हुए भी यह प्रजाति अभिशप्त है।।

हम इंसान हैं, कोई जंगली जानवर नहीं, इसलिए उस पालतू कुत्ते की ही बात करेंगे, जो सदियों से गांव गांव, डगर डगर और नगर नगर आदमी का साथ निभाता आया है। रोटी के बदले रखवाली और वफादारी के साथ साथ वह प्यार का भी भूखा होता है। कुत्ता किसी का भी हो, एक बार अगर वह आपको पहचान गया, तो समझो आपका हो गया। जो कुत्तों से डरते हैं, कुत्ता उन्हें और डराता है। जो कुत्तों को अपने से दूर भगाते हैं, कुत्ता उन्हें भी पीछा करके, बड़ी दूर तक भगाता है। कुत्ते का डर काटने से जुड़ा है और काटने का डर, कुत्ते के पागल होने के साथ। इसलिए जो अपनी जान से करे प्यार, वो कुत्ते से कैसे करे प्यार।

इंसान अगर पागल हो, तो उसके लिए मनोचिकित्सक हैं, पागलखाने हैं, लेकिन अगर कोई कुत्ता अगर पागल हो जाए और किसी इंसान को काट ले, तो उसकी मृत्यु निश्चित है।

कौन कुत्ता कब पागल हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। उस पागल कुत्ते का केवल एक ही इलाज है, उसे गोली मार दी जाए। सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी यही कहता है। एक पागल कुत्ते की नियति भी शायद यही है, ” सरकार मैने आपका नमक, खाया है! ” तो अब गोली खा।।

रात भर जागते रहने से इसे आप निशाचर भी कह सकते हैं। लेकिन रामभक्त हनुमान की तरह इसकी स्वामिभक्ति वरदान नहीं, एक अभिशाप है। हनुमान जी के बिना राम दरबार अधूरा है। एक कुत्ते के ऐसे नसीब कहां ? उसे तो जब मन करा, टरका दिया जाता है, लकड़ी से मार भगा दिया जाता है। कई लोग शिकायत करते हैं, मुझे कुत्ते की तरह घर से निकाल दिया। मेरी घर में इज्जत, एक कुत्ते से भी गई गुजरी हो गई है।।

कुत्ता अभिशप्त है, अकारण भौंकने को, रात रात भर जागने को, अपने स्वामी के आगे दुम हिलाने को। वह कितना भी वफादार हो, स्वामिभक्त हो, आपके घर की रखवाली करता हो, रहेगा एक कुत्ता ही। कुत्ते की पूंछ जिस तरह हमेशा टेढ़ी रहती है, उसका भौंकना कभी बंद नहीं होगा। वही उसका अस्त्र भी है और ब्रह्मास्त्र भी। आदमी कुत्ते से वफादारी भले ही नहीं सीख पाया हो, हां, भौंकना जरूर सीख गया है।

वह शायद जानता है, वह ऊपर वाला सभी की सुनता है। ईश्वर में भेद बुद्धि नहीं। वह इंसान और जानवर में भेद नहीं करता। उसका भौंकना ही उसका दर्द है, उसकी पुकार है, उसकी अजान है, अरदास है। उसे कोई नाम नहीं आता, शायद भौंकना ही उसका महामंत्र है। ईश्वर ही उसकी भाषा समझ सकता है। उसे उसकी वफादारी और स्वामिभक्ति का पुरस्कार दे सकता है। उसे इस अभिशाप से मुक्त कर सकता है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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