डॉ भावना शुक्ल
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – सूरज।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # ३२२ – साहित्य निकुंज ☆
☆ भावना के दोहे – सूरज ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆
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सूरज का पारा चढ़े, दिन भर रहती धूप।
ताप लिए विकराल वो, बदला उसने रूप।।
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गर्मी के आतंक का, बढ़ा बड़ा ही जोर।
पशु पक्षी को खटकती, नहीं नाचते मोर।।
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सूरज कबसे जल रहा, निकले भारी आग।
सुर गर्मी के गा रहा, ये तो उसका भाग।।
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करना तुम कम तेज तो, रहे जोड़ते हाथ।
विनती सूरज आपसे, बना रहे यह साथ।।
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© डॉ भावना शुक्ल
सहसंपादक… प्राची
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