डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘
अल्प – परिचय
शिक्षा – एम.एम., एम.एड.(स्वर्ण पदक), पी.एच.डी.( मनोविज्ञान )
संप्रति –
- पूर्व व्याख्याता, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
- मनोवैज्ञानिक सलाहकार,
- साहित्य एवं समाज सेवी, देहदानी
- अनुवादक, समीक्षक, सम्पादक
- अनेक मंचों की संरक्षक, निदेशक, मार्गदर्शक
प्रकाशन / प्रसारण –
- 12 पुस्तकें प्रकाशित, जिनमें चार ई-ऑडियो बुक अमेज़न पर उपलब्ध(मेरी अपनी ही आवाज़ में )
- अनेकों साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित, देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में (सविशेष हरिगंधा, राष्ट्र वीणा-गुजरात, सदीनामा, गर्भनाल, सेतु, ऑस्ट्रियांचल, नारी अस्मिता, व्यंग्यलोक में लेख-आलेख, समीक्षा आदि अनवरत प्रकाशित।
- दैनिक पत्र हरियाणा प्रदीप के स्थायी स्तम्भ में देश भक्ति भाव जागरण संदेश मुक्तक रूप में, सतत कई वर्षों से प्रकाशित। *अनेकों प्रतिष्ठित संस्थाओं से पुरस्कृत एवं सम्मानित।
- साझा संकलनों में रचनाएँ, प्रकाशित।
- चार साझा संकलन जिन्हें गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में स्थान प्राप्त, लघु योगदान अपना भी।
- नाटक गुजरात राज्य, प्रथम पुरस्कार प्राप्त, दूर दर्शन पर गुजराती अनुवाद के साथ प्रसारित।
सम्मान और पद –
- राय व्योम फ़ाउण्डेशन दिल्ली द्वारा “ लाइफ़ टाइम एचीवमेंट अवार्ड, 2024”
- ”संस्थापक अवार्ड “अंतर्राष्ट्रीय महिला काव्य मंच द्वारा।
- विदेश में मकाम की प्रथम इकाई का शुभारम्भ, सैन डिएगो, कैलीफॉर्निया, अमेरिका में, मेरे द्वारा किया गया। आज विश्व के 42 देशों में 83 इकाइयाँ सक्रियता से कार्यरत हैं। प्रतिदिन विस्तार हो रहा है। हिन्दी भाषा के प्रचार -प्रसार एवं विस्तार हेतु कृत संकल्प।
- साहित्य सेवा के लिए मकाम की विदेश संरक्षक पद पर पदासीन।
- संत साहित्य अकादमी और दधीचि देहदान समिति की कार्यकारिणी सदस्य।
साहित्य सेवा द्वारा देश की सेवा हेतु कृत संकल्प।
आज प्रस्तुत है आपके द्वारा डॉ मुक्ता जी द्वारा लिखित पुस्तक “मोती उजास के ” पर चर्चा।
☆ “मोती उजास के” – लेखिका – डॉ मुक्ता ☆ चर्चा – डॉ दुर्गा सिन्हा ‘उदार’ ☆
पुस्तक चर्चा
पुस्तक – मोती उजास के “
लेखिका – डॉ० मुक्ता
प्रकाशन वर्ष -2025
प्रकाशक – वर्ड्सविगल पब्लिकेशन
पृष्ठ संख्या -128
मूल्य – 199
☆ सूक्ष्मावलोकन की दृष्टि वातावरण में बिखरे गहरे सिद्धान्तों को उजागर करती है ☆ चर्चा – डॉ दुर्गा सिन्हा ‘उदार’ ☆
“स्व पहचान से आत्मज्ञान की दिशा में अग्रसर मन
आत्मोदय से अंधकार में प्रकाश के मोती पा सकता है।”
माँ शारदा की स्तुति से प्रारम्भ होती 100 नज़्मों से सजा यह काव्य-संग्रह “मोती उजास के” आशावाद से भरपूर है। “ज़िन्दगी ख़ुशनुमाँ हो जाएगी,” “ख़ुद पर विश्वास कर” प्रारम्भिक दो रचनाएँ मन में सकारात्मकता का संचार करती हैं तथा उत्साह से भर रही हैं। प्रोत्साहन से परिपूर्ण एक-एक शब्द सराहनीय है; पठनीय और संग्रहणीय है। “सबका मंगल होय” की कामना करने वाला हृदय कितना कोमल होगा– इसका अंदाज़ा लग जाता है। “ग़िले शिक़वे” भले ही हज़ार हों लेकिन “अपनत्व का अहसास” बना रहे और “संवादों का सिलसिला” सिमटना नहीं चाहिए। “स्वयं बनिए अपने सारथी” कितनी अच्छी बात कही है, क्योंकि “अपना सहारा ख़ुद बनना होगा“ ‘कशमकश’ जब दूर हो जाएगी, तब “ख़ुदा को पा जाएगा इंसान” शीर्षक के नाम की कविता “मोती उजास के” यही सार्थक संदेश देती है कि सपने साकार होंगे। “मत व्यर्थ कयास कर” हमारे सोचने से कुछ नहीं होगा, जो कुछ है और हो रहा है, वह पूर्व निर्धारित है। कर्मों के फलों का लेखा-जोखा है। विधि के विधान को न कोई समझ पाया है, न ही बदल पाया है। उतना तो हर किसी को झेलना ही पड़ता है। “वक्त के करिश्मे हैं” समय बहुत बलवान है। जिस समय जो घटित होना है, वह घटित हो कर ही रहता है। कभी हमें लगता है कि हमारे साथ बुरा क्यों हुआ? किन्तु वस्तुतः ईश्वर हमारे भले के लिए ही करता है। अध्यात्मवाद का उल्लेख भी है तो पुरुषार्थ का समर्थन भी है। प्रयास कर “ख़ुद को पा जाएगा” ख़ुद को पा गया तो ख़ुदा को भी पा जाएगा।
“ मैं और तुम के भँवर में फँसी ज़िन्दगी/ लाख चाहने पर भी व्यूह से बाहर नहीं आ पाती है।
‘अयं निजः परोवेत्ति’ का भाव हर्गिज़ न रखें। इस संसार में कोई अपना और दूसरा पराया नहीं है। सब अपने ही हैं। सभी के प्रति समभाव होना चाहिए।” चाहिए “कह कर आदर्शवाद की दिशा का निर्देश किया है। होना तो सचमुच यही चाहिए कि सब अपने हैं, कोई पराया है ही नहीं। लेकिन यह कहाँ सम्भव हो पाता है। सभी अपने-पराए के दायरे में बँधे हैं। इन सीमित दायरों से कोई भी मुक्त नहीं हो पाता। मेरा धर्म- मेरी जाति, मेरे लोग । “दर्द भी दवा भी” ज़िन्दगी दर्द भी है, ज़िन्दगी दवा भी है ।सच ही तो है एक व्यक्ति हमें बुरा-भला कह कर चला जाता है तो दूसरा हमारी तकलीफ़ों को, पीड़ाओं को महसूस करता है, मरहम लगाता है, सान्त्वना देता है और हमारे साथ खड़ा होता है। परस्पर का साथ सहयोग ही तो दुःख-दर्द की दवा बनता है। यूँ आज कल जग के “मिथ्या बंधन” में ही दिल उदास रहता है। आपस का भरोसा ख़त्म हो गया है। विश्वास नहीं रहता। बदल गया है दुनिया का चलन। काश! मिट जाता दिलों से वैमनस्य भाव। मानव राग-द्वेष व वैर से ऊपर उठ कर क्यों नहीं जी पाता है । उस एक ईश्वर के अंश सभी हैं फिर परस्पर परायापन कैसा और क्यों ? स्व से ऊपर उठ कर क्यों विचार नहीं कर पाता?
डॉ. मुक्ता
मुक्ता जी की सभी नज़्में सीधे-सादे शब्दों में गहन चिंतन-मनन की बातें करती हैं। कभी ऐसा भी लगता है मानो सीधा ईश्वर से संवाद करती हैं। प्रश्न पूछती हैं, समाधान मांगती हैं। ’जाने क्यों मन’ खोया रहता है। जग के मोह-माया में भटका मन खोया ही तो रहता है। उलझनें सुलझाते-सुलझाते और भी उलझ ही जाता है। “नव वर्ष की आमद” नव वर्ष ,नव उत्कर्ष, भोर की स्वर्णिम रश्मियाँ जीवन में उमंग भर देती हैं। हर दिन एक नया दिन है। हर दिन का स्वागत करें पूरे जोश पूरे उत्साह से करें व वैराग्य भाव भी रखें । मोह में इतना भी न उलझें कि बिछुड़ना घातक हो जाए। कारण कुछ भी अपने साथ नहीं जाना है। हर कोई चाहे कितना भी बलशाली-शक्तिशाली क्यों न हो, कुछ भी अपने साथ ले कर नहीं जा पाता है। यही जीवन का अंतिम सत्य है। जब धरा का धरा पर ही धरा रह जाना है तब मोह कैसा और मौत से भी क्यों घबराना है।
“सब यहीं रह जाना है” सब कुछ जानते-समझते हुए भी यह इंसान न जाने क्यूँ ख़ुद को धोखा ही देता रहता है। “परेशान हर इंसान है,” “हुनर सीख ले” हर हाल में ख़ुश रहने का। हुनर यही कि सबको “अपना बनाता चल” बस फिर बेफिक्र कटेगी ज़िन्दगी। ऊपर वाले पर भरोसा कर। जिसने जन्म दिया है, वही पालन भी करेगा । आज दुःख है तो कल सुख भी देगा। यह विश्वास यह भरोसा विकसित कर। आस्था और विश्वास पर टिकी ज़िन्दगी ही सुखी ज़िन्दगी हो सकती है।
लेखिका की सूक्ष्मावलोकन की दृष्टि वातावरण में बिखरे गहरे सिद्धान्तों को उजागर करती है। सरल-सहज भावाभिव्यक्ति विचार और भाव सम्प्रेषण में सफल है। कहीं-कहीं आवश्यकतानुरूप क्षेत्रीय भाषा का पुट भी मिलता है। कुछेक रचनाएँ हैं जैसे “मनवा मानत नाहीं” कह कर उस समाज, उस वर्ग के साथ निकटता व आत्मीयता का भाव रखते हुए अपनी बात बखूबी उस वर्ग तक पहुँचाने का प्रयास किया है।
साहित्य जगत् में मुक्ता जी का नाम वर्षों पुराना है। सतत साहित्य साधना में रत मुक्ता जी ने हर विधा में लिखने की कोशिश की है और सफल लेखिका के रूप में साहित्य जगत में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। डॉ० मुक्ता जी राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित हैं।साहित्य अकादमी और ग्रंथ अकादमी की निदेशक रह चुकी हैं। वर्तमान में स्वतंत्र लेखिका के रूप में कार्यरत हैं। मेरे लिए तो मेरे मन में मुक्ता जी के प्रति एक अलग ही विशिष्ट स्थान है। मुक्ता जी की सशक्त लेखनी को नमन। भाव सम्प्रेषण और अपने विचारों को सभी तक पहुँचाने में सफल साहित्यकार के रूप में आप प्रसिद्धि प्राप्त चुकी हैं। अनेकों प्रमुख संस्थाओं से पुरस्कृत हो चुकी हैं। आप इसी तरह अपने विचारों और भावों से जग को समृद्ध करती रहें, आपकी पुस्तकें लोगों के मन में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाती रहें–यही ईश्वर से प्रार्थना है।
हर रचना एक महत्वपूर्ण संकेत करती है। संदेश देती है। सीख देती है। पठनीय एवं संग्रहणीय पुस्तक !
अशेष शुभकामनाएँ !
समीक्षक – डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘उदार‘
पूर्व व्याख्याता-मनोविज्ञान, बी.एच.यू., वाराणसी
मूलतः बनारस से, स्थायी निवास – फरीदाबाद, हरियाणा, भारत।
सम्प्रति —कैलीफ़ॉर्निया,अमेरिका सम्पर्क — मो० -9910408884, ईमेल – durga.a.sinha@gmail.com
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈








