सुश्री मंजिरी “निधि”
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी मंजिरी की कुंडलिया – भोजन ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १० ☆
मंजिरी की कुंडलिया – भोजन ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
=१=
साधा भोजन ज्यो करे, बने सरल आहार l
खाना खाओ वक़्त पर, भोजन शाकाहार ll
भोजन शाकाहार, बने ऊर्जा का धारक l
अन्न कोष की जान, उदर अनशन सन्हारक ll
कहे मंजिरी आज, सभी करते हैं योजन l
उत्तम जीवन सार, करो ज्यों साधा भोजन ll
=२=
हलधर बोते धान को, करते जग उद्धार l
माटी को वे पूजते, मिलती ख़ुशी अपार ll
मिलती ख़ुशी अपार, काम से लौटे हारे l
भोजन करने बैठ, सभी मिलजुल कर सारे ll
कहे मंजिरी आज, नहीं रुकते ये क्षणभर l
भोजन सबका प्राण, धान ये बोते हलधर ll
=3=
लें पोषित आहार सब, रखता रोगी दूर l
मानव जीवन सार है, करे कुपोषण चूर ll
करे कुपोषण चूर, द्वार पर खुशियाँ आती l
भोजन पोष्टिक साथ, सही सेहत बन जाती ll
कहे मंजिरी आज, करो ना जन को शोषित l
रखो स्वास्थ्य का ख्याल, सदा भोजन लें पोषित ll
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© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






