श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य- “वचन, एकवचन बहुवचन…“।)
अभी अभी # १०८० ⇒ व्यंग्य – वचन, एकवचन बहुवचन
श्री प्रदीप शर्मा
वचन तो वचन होता है, जब किसी को दिया तब वह वचन होता है, किसी महापुरुष ने दिया हुआ वचन भी वचन ही होता है लेकिन यही वचन जब किसी महात्मा के मुख से प्रकट होता है, तो यह प्रवचन हो जाता है। हिंदी व्याकरण में यही एकवचन, बहुवचन भी हो जाता है।
जिस घर में सास और अकेली बहू होती हैं, वहां भी अक्सर प्रवचन तो सास का ही होता है और बहू वचनबद्ध होती है लेकिन जब बहुओं का बहुमत हो जाता है और सास अकेली पड़ जाती है तब बहुओं के वचन सास के प्रवचन पर भारी पड़ जाते हैं।।
हिंदी और अंग्रेजी व्याकरण में काल और वचन को लेकर बड़ी समानता है। हमारी तरह उनके भी तीन ही काल होते हैं। हमारा भूत, उनका past है और हमारा वर्तमान उनका present. जो हमारा भविष्य है, वही उनका future है। वे भी हमारी तरह ही एकवचन यानी singular number और बहुवचन यानी plural number में विश्वास करते हैं। जब कि हमारी देव भाषा संस्कृत का व्याकरण थोड़ा अलग और उन्नत है।
संस्कृत में दो नहीं तीन वचन होते हैं। रामायण के महाराज दशरथ के तीन वचन अलग हैं। यहां संस्कृत में एकवचन और बहुवचन के साथ द्वि वचन भी है। राम: रामौ रामा: प्रथमा।।
जीवन व्याकरण नहीं। व्याकरण दोष भाषा की विकृति है और व्यक्ति दोष चरित्र की विकृति। जब आज का इंसान अपने वचन के प्रति ही सजग और ईमानदार नहीं तो एकवचन और बहुवचन के प्रति कैसे रह सकता है।
हम अपनी आजकल की भाषा में अंग्रेजी शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग कर रहे हैं। कैसे कैसे एकवचन, बहुवचन हो जाते हैं, हमें कुछ भान ही नहीं रहता। लगता है, सरलीकरण से हम सिम्प्लीकरण के रास्ते पर चल निकले हैं। लेबरों की समस्या कोई नई नहीं। रेलवे स्टेशनों की भीड़ का हमारे पास कोई विकल्प नहीं। कारों, ट्रकों और टू व्हीलरों ने ट्रैफिक को जाम कर रखा है।।
मोबाइलों और कंप्यूटरों की दुनिया ने इंसान से उसकी असली जिंदगी छीन ली है। टाकीजों की फिल्में लोग आजकल टेलीविजनों में देखने लगे हैं। लेडिसों और जेंट्सों का पहनावा भी एक जैसा ही होने लगा है। लव मैरिजों की तो जैसे बाढ़ ही लगी हुई है।
वचन तो वचन, कैसे कैसे बहुवचन ! जब से डिजिटलीकरण हुआ है, बैंकों के कस्टमरों में कमी हुई है, पैसों का लेनदेन एटीएमों और पेटीएमों से ही होने लग गया है। महंगाई की मार के कारण लोग मल्टीस्टोरियों में टू BHK और वन BHK के फ्लैटों में रहने लगे हैं। सरकारी स्कूलों के होते हुए महंगे कॉन्वेंट स्कूलों की ओर भाग रहे हैं। जॉब्स का पता नहीं, कॉलेजों में भीड़ बढ़ती जा रही है। बस एक वचन अच्छे दिनों का, सभी टेंशनों को दूर कर देता है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






