श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पंखों में हवा।)

?अभी अभी # 336 ⇒ पंखों में हवा? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मेरे घर में पंखे हैं, वे मुझे हवा देते हैं। पक्षियों के पंख होते हैं, जिनके कारण वे हवा में उड़ते हैं। मेरे घर के पंखों और पंछियों के पंखों में हवा कौन भरता है, मैने कभी गौर नहीं किया। लेकिन जब अचानक रात के दो बजे के बाद मेरे घर के पंखों ने हवा देना कम कर दिया तो मुझे यही लगा, शायद पंखों की हवा की गारंटी खत्म हो गई है।

होता है, जब रसोई गैस की गैस खत्म हो जाती है, तो सिलेंडर खाली हो जाता है। वैसे भी भरे हुए की ही गारंटी होती है, खाली की क्या गारंटी।।

मेरे घर में एसी कूलर की सुविधा नहीं, बस कमरों में सीलिंग फैन लगे हैं। जब तक बिजली रहती है, घर में रोशनी भी रहती है, और टीवी, पंखा भी चलता रहता है। जहां बार बार बिजली जाती है, वहां लोग इन्वर्टर और जनरेटर की व्यवस्था कर लेते हैं। मैं तो पूरी तरह बिजली आपूर्ति पर ही आश्रित हूं।

लगता है, बिजली का दबाव कम है, लो वोल्टेज है, लाइट भी जल तो रही है, लेकिन रोशनी में दम नहीं है। पंखे इतने तेज चल रहे हैं, कि आप गिन लो, पंखों में कितनी ब्लेड है। ऐसा लगता है किसी ने उनकी हवा निकाल ली है।।

अब तक साइकिल, स्कूटर और कार के पहियों की हवा तो निकलते देखी थी, अब तो पंखों में भी हवा कम होने लग गई है। लगता है, पंखों में भी हवा भरवानी पड़ेगी। इतनी हवा से तो बदन का पसीना भी नहीं सूखता। जितना पसीना आता है, उतना गला सूखता है, और शरीर उतना ही पानी मांगता है और उतनी ही हवा भी।

उधर चुनाव की गर्मी और इधर पानी का अभाव शुरू। रात से ही हमारी मल्टी में पानी का टैंकर आना शुरू हो गया है। एकमात्र पंखा ही तो सहारा है, रात को चैन की नींद सोने का। एकाएक वही हुआ, जिसका अंदेशा था, लाइट पूरी चली गई। और अभी अभी अधूरा ही रह गया आज का।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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