श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “निंदा-स्तुति…“।)
अभी अभी # 711 ⇒ निंदा-स्तुति
श्री प्रदीप शर्मा
कल ही कबीर साहब का जन्मदिन था, जो माया को महा ठगिनी कहते थे। हम आज माया-ममता दोनों का ज़िक्र नहीं करेंगे, केवल निंदा-स्तुति की बात करेंगे। जिन्हें इन बातों में पड़कर अपनी चादर मैली नहीं करनी, वे अपने पाँव समेट लें।
निंदा लोकतंत्र का एक ऐसा हथियार है, जिसका उपयोग सत्ता-विपक्ष दोनों अपनी सुविधानुसार करते हैं।
कबीर साहब घोर लोकतांत्रिक थे, उन्होंने जो सम्मान एक निंदक को दिलाया, वह अनूठा, अद्भुत व अविस्मरणीय है। विपक्ष के नेता को जितनी भी सुविधाएँ, अधिकार और भत्ते आज मिल रहे हैं, उन सबका श्रेय कबीर साहब को जाता है।।
निंदक नियरे राखिये,
आँगन कुटी छवाय
बिन पानी साबुन बिना
निर्मल करे सुभाय।।
न जाने क्यों, शास्त्रों और ग्रंथों में निंदा को एक अवगुण माना गया है, मानसिक विकार माना गया है। कबीर साहब iconoclast थे। वे रूढ़ियों, मान्यताओं के साथ -साथ ही मूर्ति-भंजक भी थे।
सज्जन लोग निंदा सहन कर सकते हैं, लेकिन उसकी भी एक सीमा होती है। शिशुपाल को योगिराज श्रीकृष्ण ने गालियों के सौ अवसर दिये। आखिर हद होती है, इंसानियत की भी ! हमारे मोदीजी को ही ले लीजिए। विपक्ष ने गालियों की झड़ी लगा दी। मोदीजी ने भी गालियाँ गिना-गिनाकर जनता से वोट माँगे। जनता ने भी बदले में वोटों की झड़ी लगा दी।।
ईश-निंदा पाप है ! लेकिन अहंकारी दक्ष कहाँ मानने वाला था। अपनी पुत्री सती के ही समक्ष अपने दामाद त्रिपुरारी भोलेशंकर की निंदा शुरू कर दी। उनका यज्ञ में अपमान किया ! सती अपने पति का यह अपमान सहन नहीं कर सकी। आगे की कथा शिव-पुराण में पढिये। निंदा से क्लेश व ग्लानि उत्पन्न होती है, जिससे व्यक्ति के जीवन में भूचाल आ जाता है। न सुन सुन, सुन बुरा। न देख देख, देख बुरा, न बोल बोल, बोल बुरा। न सुन बुरा, देख बुरा, बोल बुरा।।
गीता प्रेस का प्रकाशन है, स्तोत्र रत्नावली जिसमें समस्त देवी-देवताओं की स्तुतियों का संकलन है ! स्तोत्र ही स्तुति है, प्रार्थना है, श्लोक है। स्तुति से देवता प्रसन्न होते हैं। दानव भी अपने इष्ट की स्तुति कर मनचाहा वरदान ले उड़ते हैं। जब देवता की कमज़ोरी स्तुति है, तो क्या मानव की स्तुति उसे महा-मानव नहीं बना सकती। ज़रा सी तारीफ़ में जो इंसान चने के झाड़ पर चढ़ जाए, उसकी स्तुति उसे कहाँ से कहाँ पहुँचा सकती है। एक देवकांत बरुआ थे, जो इंदिरा इज़ इंडिया का गुणगान करते घे। आज तो सब भक्तन मिलकर सरकार का स्तुतिगान कर रहे हैं। सत्ता की स्तुति ही में देश का कल्याण है। वैसे भी शास्त्रों में राजा की निंदा को पाप और राष्ट्रद्रोह कहा गया है।
कभी कभी स्तुति से भी काम नहीं बनता। सीता माता की खोज में श्रीराम रामेश्वरम के सागर-तट पर पहुँचे ! पहले शिवजी का पूजन किया फिर उदधि की स्तुति की, रास्ता माँगा। सागर नहीं माना। मर्यादा पुरुषोत्तम को क्रोध आया। भय बिनु होय न प्रीति। सागर नतमस्तक। राम जी के नाम से पत्थर भी तैरने लगे। सागर ने राह बनाई।।
निंदा-स्तुति का साथ, गुलाब जामुन और चाशनी का साथ है। कहीं किसी की निंदा से काम निकल जाता है, तो कहीं किसी की स्तुति से। निंदा अगर चाशनी है तो स्तुति चाशनी भरा गुलाबजामुन। ऐसे लोग किस काम के, जिन्हें गुलाबजामुन ही पसंद नहीं।
जीवन में मिठास हो। थोड़ी निंदा, थोड़ी स्तुति हो। जो गलत हो, उसका प्रतिकार हो, जो सही हो, उसका सत्कार हो। विद्वतजन सत्य की स्तुति करते हैं, असत्य की निंदा करते हैं। निंदा-स्तुति ही सत्-असत् है। किसी की निंदा से बचें, अपनी स्तुति से भी बचें। जिसके कारण हमारा अस्तित्व है, केवल वह ही स्तुति-योग्य है। प्राणी-मात्र की स्तुति करें, स्वार्थवश किसी व्यक्ति की नहीं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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