श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “टाइपराइटर…“।)
अभी अभी # 713 ⇒ टाइपराइटर
श्री प्रदीप शर्मा
(23 जून International Typewriter Day पर विशेष आलेख)
राइटर और टाइपराइटर दोनों शब्दों से खेलते हैं। राइटर खुद लिखता है, टाइपराइटर जो टाइप करो, वह लिखता है। राइटर पहले पैदा हुआ, राइटर की सुविधा के लिए टाइपराइटर का आविष्कार हुआ।
जो लिखता है, वह लेखक! और जो टाइप करता है, वह टाइपिस्ट। लिखना भी सीखना पड़ता है, और टाइप करना भी। अंतर सिर्फ इतना है कि हर लिखने वाला भले ही लेखक नहीं होता, लेकिन हर टाइप करने वाला टाइपिस्ट हो सकता है।।
लेखक कई टाइप के होते हैं, टाइपिस्ट सिर्फ दो तरह के होते हैं, टाइपिस्ट और स्टेनो-टायपिस्ट! स्टेनो-टायपिस्ट को टाइपिंग के साथ द्रुत-लिपि अर्थात शॉर्ट-हैंड भी सीखना पड़ता है। टाइपराइटर और टायपिस्ट अंग्रेजों की ही देन है।
उनके समय में लड़कियां ही टाइपिस्ट होती थीं, क्योंकि उनकी उंगलियाँ नाजुक होती थी। पियानो की तरह जब की-बोर्ड पर उनकी उंगलियाँ चलती थी, तो घड़ी की टिक-टिक के साथ टाइपराइटर की भी टिप टिप की ध्वनि किसी संगीत से कम नहीं होती थी।
अंग्रेज़ चले गए, गोरी टाइपिस्ट ले गए, किस्म किस्म के टाइपराइटर छोड़ गए। रेमिंगटन टाइपराइटर से स्वर्गीय के एल सहगल की स्मृति जुड़ी हुई है। एक गायक-अभिनेता के पहले वे इस कंपनी के सेल्समेन जो थे। अंडरवुड, रॉयल, और ओलीवित्ति जैसे टाइपराइटर पर लोगों ने टाइपिंग सीखी और सरकारी दफ्तरों में धड़ल्ले से टाइपिस्ट; क्लर्क की भर्तियां होने लगीं।।
किसी संगीत-वाद्य की तरह टाइपराइटर में भी एक की-बोर्ड होता है। अंग्रेज़ी भाषा के अलावा भी विश्व की कई भाषाओं के की-बोर्ड टाइपराइटर में उपलब्ध होते हैं। हमारे देश में हिंदी, मराठी और गुजराती टाइपराइटर बहुतायत से देखे गए हैं। अंग्रेज़ी का की-बोर्ड आज भी वही है, जो मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर में उपयोग में आता है। हिंदी का की-बोर्ड बड़ी मुश्किल से याद होता था। बकमानजन, सपिवप।
नौकरशाही में, अदालत में, थाने में, पंचायत में, नगर पालिका में, अर्जियाँ देनी पड़ती थी। जो काम पहले अर्जीनवीस करते थे, वही काम बाद में टाइपिस्ट करने लग गए। लोअर कोर्ट और हाई कोर्ट में दावे पेश होते थे, पिटीशन फ़ाइल की जाती थी। वकील ड्राफ्ट बनाता था, टाइपिस्ट टाइप करता था, पिटीशन अदालत में पेश हो जाती थी।
जो छात्र कॉलेजों में स्नातकोत्तर पढ़ाई करते थे, उन्हें थीसिस प्रस्तुत करनी होती थी, अच्छे, सुंदर, सन-लिट् बॉन्ड पेपर पर करीने से टाइप करी हुई। कुछ टाइपिस्ट घिस-घिसकर इतने शालिग्राम बन चुके होते थे कि मात्रा और व्याकरण की गलतियाँ तो छोड़िए, ड्राफ्टिंग भी इतनी बेहतरीन करते थे कि देखते ही बनती थी।।
अक्षरों को काला करने के लिए रिबिन का उपयोग होता था। कागज़ की साइज फुल साइज कहलाती थी। अधिक प्रतियों के लिए कार्बन -पेपर का इस्तेमाल
किया जाता था। एक विदेशी कंपनी kores ही टाइपराइटर की समस्त स्टेशनरी सप्लाई करती थी। kores कंपनी tip-top नाम से कार्बन पेपर का निर्माण करती थी, जिसके ऊपर एक दुबली-पतली सुंदर ऑफिस-गर्ल का चित्र शोभायमान होता था।।
भारत में godrej और halda कंपनियों ने भी हिंदी-अंग्रेज़ी टाइपराइटर्स का निर्माण किया लेकिन समय के बढ़ते प्रभाव ने टाइपराइटर और टाइपिस्ट को अतीत में धकेल दिया। आज हम एक प्रिंटिंग मशीन अपने हाथों में लेकर बैठे हैं जो किसी मज़मून की कितनी भी प्रतियाँ निकालकर विश्व के किसी भी कोने में भेज सकते हैं। बुलेट ट्रेन के युग में एक टाइपराइटर पर टाइप करने में वही सुख मिल सकता है, जो कभी तांगे या टमटम पर, किसी शांत सड़क पर सवारी से महसूस किया जा सकता था।
रंग-बिरंगे छोटे-बड़े टाइपराइटर्स की छवि मनमोहक और आकर्षक तो होती ही है, जब नाजुक उँगलियों के स्पर्श से टाइपराइटर गतिमान होता है तो उसकी टप-टप की ध्वनि एक ऐसे संगीत को जन्म देती है जो शास्त्रीय न होते हुए भी कर्ण-प्रिय है, जिसकी तुलना केवल बारिश की टपकती बूँदों से की जा सकती है। हवाई जहाज की यात्रा छोड़ किसी टमटम में सैर करने की मंशा हो तो एक टाइपराइटर पर उंगलियाँ चलाइये, अतीत में खो जाइए …!!!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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