श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य आलेख – “अंतिम साँसें।)

?अभी अभी # 722 ⇒ आलेख – पर्दा फिल्मी और फेसबुकी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जीवन केवल सच्चाई और वास्तविकता से नहीं जीया जाता ! सपने सच नहीं होते, फिर भी सपने सुहाने लगते हैं। जीवन का सफर कभी सुहाना होता है, तो कभी काँटों भरा। मन को बहलाना ही मनोरंजन है। दुःख को कुछ समय के लिए भुलाना ही क्षणिक निवृत्ति है।

संगीत, कला और साहित्य जीवन को एक दिशा देते हैं, रोजमर्रा की उबाऊ दिनचर्या को रोचक और आकर्षक बना देते हैं। दुनिया फिल्मी हो, साहित्यिक हो, या फिर संगीतमय, जीवन में रस की सृष्टि करते हैं। साहित्य और संगीत अगर खास विधा है तो फ़िल्म एक आम विधा।।

संगीत अगर कानों में रस घोलता है तो दृश्य मन को आनंदित और आंदोलित करते हैं। आलमआरा और जहाँआरा जैसी फिल्मों से शुरू हुआ यह फिल्मी सफर आज उस मुकाम पर आ गया है, जहाँ सिनेमाहॉल का बड़ा पर्दा पहले टीवी का छोटा पर्दा हुआ और अब एंड्रॉयड के जरिये हमारी हथेली में कैद हो गया।

याद कीजिए सहगल, पृथ्वीराज कपूर, महिपाल, दिलीप, देव और राजकपूर की फिल्मों का दौर ! सिनेमाघरों में दर्शकों की भीड़। नर्गिस, मीनाकुमारी, साधना और सायराबानो की फिल्मों के पोस्टर्स। बिनाका गीत माला की धूम। हर पान वाले की दुकान पर बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं, जैसे गानों पर झूमते श्रोतागण। अभिनय सम्राट, संगीत सम्राट और हास्य सम्राट का त्रिवेणी संगम।।

समय का पंछी उड़ता जाए !

संचार क्रांति ने हरित क्रांति को पीछे छोड़ दिया। आज सिनेमाघर गिनती के हैं। जितने पहले शहर में सिनेमाघर थे, उससे अधिक आज मॉल हैं। दो आने की मूँगफली से पूरी ढाई घंटे की फ़िल्म देख ली जाती थी। आज 200 ₹ का पॉप कॉर्न कॉम्बो वह स्वाद नहीं देता।

आज मेरे हाथ में कोई बुक नहीं, फेसबुक है। बस इसे खोलने की देर है। एक झाड़ पर बैठे बंदरों से अधिक app मेरी उंगलियों तले दबे बैठे हैं। टीवी की पिक्चर ट्यूब की अब मुझे चिंता नहीं, एक टीवी दीवार से चिपका है तो एक मेरी आँखों से। यू ट्यूब में मैं जब चाहे सङ्गीत की महफ़िल सजा सकता हूँ। 24 x 7 मेरे सामने एक बोन्साई रजतपट है, सभी अभिनेताअभिनेत्रियों की फिल्में खुल जा सिम सिम की तरह केवल एक क्लिक की मोहताज है।।

फिल्मी पर्दे से फेसबुक के पर्दे तक का मेरा यह सफर बड़ा रोचक है। जो काम सन् 70 के दशक में संगीत, फिल्में और किताबें करती थी, वे सब आजकल केवल फेसबुक अकेली कर रही हैं। पहले किताबें बोलती नहीं थीं, आजकल लेखक से आपका जीवंत परिचय और संवाद होता है। रचना प्रक्रिया पर घर बैठे बहस होती है। सभी पुरानी फिल्में और क्लासिकल संगीत यू ट्यूब में उपलब्ध हो चुका है।

बस केवल एक पर्दे की जरूरत है, और वह है आँखों का पर्दा।

फेसबुक ओपन हुई और पर्दा खुला। किसी ने शायद इसी स्थिति को भाँपकर आज से कई वर्ष पहले इस गीत की रचना की होगी ;

पर्दा उठे सलाम हो जाए

बात बन जाये, काम हो जाए

फेसबुक का पर्दा उठ चुका है, आपसे सुबह का सलाम हो ही जाए ! सुप्रभात …

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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