श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी आलेख – “घंटियाँ।)

?अभी अभी # 724 ⇒ घंटियाँ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

घण्टा बड़ा होता है और घंटियाँ छोटी। 24 घंटे मिलकर एक दिन बनता है, जिसमें रात भी शामिल होती है। 60 मिनिट मिलकर एक घंटा बना सकते हैं लेकिन सभी घंटियाँ मिल-जुलकर एक घण्टा नहीं बना सकती। घण्टा, घण्टा है, घंटी घंटी।

घंटा-घर में कोई घंटा नहीं होता, एक घड़ी ज़रूर होती है, जो हर घंटे का अहसास दिलाती है,

टन टन की ध्वनि पैदा करती है। घड़ी भले ही खराब हो, घंटा घर को कोई फर्क नहीं पड़ता।।

घरों में पूजा-घर में घंटियाँ होती हैं, जो आरती के समय बजाई जाती है। बड़े बड़े मंदिरों में छोटे-बड़े घंटे-घंटियाँ बज उठती हैं, सुबह शाम, जब आरती का वक्त होता है।

आते-जाते, घंटों से छेड़छाड़ करना, छोटे बच्चों को गोद में लेकर घंटी बजाना बड़ा सुखद और मनोरंजक मंज़र होता है।

बचपन में अपने पाँवों पर खड़े होते ही पिताजी ने एक पहिये वाली साईकल दिलवा दी थी, जिसमें एक घंटी लगी हुई थी। घूमते पहिये के साथ-साथ घंटी की भी आवाज़ आती थी। दो पहिये की साईकल में अगर घंटी ना हो, तो चालान बन जाता था।

समय के साथ घंटी का स्थान हॉर्न ने ले लिया। कभी किसी घंटी वाले को निवेदन नहीं करना पड़ता था, कृपया घंटी बजाएँ।

जब कि भारी वाहनों के पीछे उसूलन लिखना पड़ता है, हॉर्न प्लीज।।

घर की डोअर बेल, दूध वाले की घंटी और गर्मी में कुल्फी-आइसक्रीम की घंटी पर सबका ध्यान रहता था। कितना भी पढ़ाकू छात्र क्यों न हो, छुट्टी की घंटी बरबस ध्यान आकर्षित कर ही लेती थी। गाँव में तो जानवरों के गले में भी घंटी बाँधने का रिवाज है। कहीं जंगल में चरने बहुत दूर न निकल जाए।

एक कहावत मेरे गले आज तक नहीं उतरी ! बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे ? ठीक है, बिल्ली शेर की मौसी है, लेकिन इतनी खूँखार भी नहीं। कभी कभी मेरी बिल्ली मुझसे भी म्याऊं कर लेती है, लेकिन मेरे लिए मेरी बिल्ली के गले में घंटी बाँधना कोई टेढ़ी खीर नहीं। लेकिन केवल किसी कहावत को गलत सिद्ध करने के लिए बिल्ली की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ गले में घंटी बाँधना मुझे मंजूर नहीं। चोरी-चुपके चूहे का शिकार करने वाली बिल्ली क्या घंटी बजाकर शिकार करेगी ! बिल्ली के गले में घंटी बाँधना, उसके पेट पर लात मारने जैसा है।।

बच्चों के पाँव में पैजनियाँ और किसी नृत्यांगना के पाँव में घुँघरू, घंटी का ही, लघुतम स्वरूप है। जो कानों में मधुर रस घोल दे, वह घंटी। किसी की फ़क़त याद से ही दिल में घंटियाँ बजनी शुरू हो जाएं, वह स्थिति सबसे श्रेयस्कर है। ऐसे भी अवसर आते हैं जीवन में, साहब घंटी बजाते रह जाते हैं, और चपरासी का कहीं पता नहीं रहता। और वह बाहर बैठा साहब को कोस रहा होता है, क्या घर में भी बीवी को घंटी बजाकर बुलाते हैं। अपने हाथ से एक ग्लास पानी तक नहीं पी सकते साहबज़ादे।

सभी आवाज़ों के ऊपर अन्तरात्मा की आवाज़ की तरह, अचानक टेलीफोन की घंटी मेरा ध्यान आकर्षित करती है।

जब तक ना उठाओ, घर को सर पर उठा लेती है। मैं फ़ोन उठाकर घंटी की ध्वनि को विराम दे देता हूँ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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