श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य क्षणिका – “बापू की कुटिया…“।)
अभी अभी # 729 ⇒ बापू की कुटिया
श्री प्रदीप शर्मा
(BAPU KI KUTIYA)
बापू का कॉपीराइट वैसे तो गांधीजी के पास ही है, लेकिन घर के किसी भी बुजुर्ग को आप निश्चिंत हो, बापू कह सकते हैं। अपने बाप की उम्र के काका, बाबा तो ठीक, कुछ परिवारों में तो बच्चों को भी बाबू, बाबा और बापू कहकर संबोधित किया जाता था।
पहले हमें नाम से लगा, सेवाग्राम और साबरमती आश्रम की तरह, शायद यह कुटिया भी कभी बापू का निवास स्थान रही होगी, लेकिन आज से ५० वर्ष पूर्व, भोपाल प्रवास में, जब मैं टीटी नगर के आसपास, देर रात ९ बजे, कोई भोजनालय तलाश रहा था, अचानक मेरी निगाह इस बापू की कुटिया पर पड़ी, जहां कुछ लोग भोजन कर रहे थे।।
नाम में सादगी झलक रही थी, अतः मैं निश्चिंत हो गया, यहां जरूर मुझे शुद्ध, सात्विक, शाकाहारी भोजन अवश्य उपलब्ध होगा, और यकीन मानिए, बापू की कुटिया ने मुझे निराश नहीं किया।
कम कीमत पर मुझे घर जैसा भोजन नसीब हुआ।
उसके बाद जब भी भोपाल जाता, एक नजर बापू की कुटिया पर अवश्य डालता।
मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब मेरे शहर इंदौर में भी अचानक एक जगह मेरी नजर “बापू की कुटिया” पर पड़ी। बापू की तो खैर गुडविल ही इतनी है कि हर छोटे बड़े शहर में आपको एम जी रोड, महात्मा गांधी मार्ग, गांधी हॉल, गांधी नगर और गांधी प्रतिमाएं मिल जाएंगी। उनके नाम से कई मेडिकल कॉलेज होंगे। गांधी आदर्श ना सही, लेकिन ब्रांड बनकर तो रह ही गए हैं। उन्होंने भले ही पैसे से मोह ना पाला हो, लेकिन भारतीय मुद्रा अभी तक उनकी तस्वीर के मोह को छोड़ नहीं पा रही है। बोलचाल की भाषा में बड़े नोटों को लोग गांधी छाप नोट भी कहने लगे हैं।।
आखिर एक दिन वह भी आ गया, जब मुझे मेरे शहर की बापू की कुटिया के स्वादिष्ट भोजन का स्वाद लेने का सुअवसर मिला।
कुटिया जैसा यहां कुछ भी नहीं था। हां, भोजन शाकाहारी ही था।
अगर आप सात्विक भोजन चाहते हैं तो जैन फूड हाजिर है। संक्षेप में अगर कहें तो बापू की कुटिया ने मुझे यहां भी निराश नहीं किया।
वैसे भी आजकल सादगी का नहीं, तड़क भड़क का जमाना है, इसलिए बापू की कुटिया पर भी रात में चकाचौंध रोशनी जगमगाती रहती है। यहां सत्संग अथवा सर्व धर्म की प्रार्थना नहीं होती, बस सशुल्क पेट पूजा होती है।
भाषा विवाद से दूर, इसका हिन्दी में नियॉन साइनबोर्ड (नामपट्ट), “बापू की कुटिया”, भी दूर से ही अपनी छटा बिखेरता है। अगर यही साइनबोर्ड अंग्रेजी में लिखा होता तो
शायद कुछ इस प्रकार होता, “BAPU KI KUTIYA”.
आजकल सभी आश्रम वातानुकूलित हो चले हैं, और कुटिया, कॉटेज।
हर अमीर अपने महल को दौलतखाना और गरीबखाना ही कहता है।
जब से रामराज्य में किसी गरीब की झोपड़ी के भाग खुले हैं, हर भक्त अपने कॉटेज को झोपड़ी ही मानने लगा है, और वहां भी राम जी की कृपा से आराम ही आराम है।
बापू की कुटिया में आपको विदुर का साग मिले ना मिले, दुर्योधन का मेवा मिलने से तो रहा।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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