श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सावन को आने दो।)

?अभी अभी # 734 ⇒ आलेख – सावन को आने दो ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सावन आए, न आए, जिया जब झूमे सावन है ! सुना है, सावन के महीने में पवन सोर करता है ! इस बार पवन का कोई ज़ोर नहीं चल रहा, पवन सोर नहीं कर रहा।

आषाढ़ चला गया, फिर क्यों सावन रूठ रहा ! सावन के बारे में ऐसी मान्यता है कि वह गरजता, बरसता आता है। कुछ का कहना है वह झूमकर आता है। सब बकवास है। यहाँ तो सावन सूखा जा रहा है।।

मुझे धीरज रखने को कहा जा रहा है। इस बार सावन मास का आगाज़ गुरु पूर्णिमा से हुआ ! आसमान से गुरु कृपा तो बरस गई, बारिश नहीं हुई। ग्रहण तो चाँद को लगा था, बारिश को तो नहीं। इधर की तरह उधर भी इम्-बैलेंस है। मुम्बई में मानसून आ गया। मुम्बई ने समय पर उसे इंदौर की ओर रि-डायरेक्ट भी कर दिया। अब कोई डंडा लेकर बारिश तो नहीं करवा सकता। कहीं बाढ़ है कहीं सूखा ! वही बात हुई, कहीं भोजन फेंका जा रहा, तो कहीं कोई भूखा सो रहा।

विविध भारती के अनुसार, पड़ गए झूले, सावन ऋतु आई रे ! कुछ शायराना तबीयत के लोग इसका फ़ायदा उठाना चाहते हैं। सावन के महीने में, एक आग सी सीने में, लगती है तो, पी लेता हूँ, दो चार घड़ी जी लेता हूँ।।

यह आग कब बुझेगी ! हम सीने की नहीं, धरती की आग की बात कर रहे हैं। एक हमारे कुमार गंधर्व साहब नहीं मान रहे ! अवधूता, गगन घटा गहरानी रे। किसान को खेत में पानी देना है, खेत सूख रहे हैं। अभी ऐसी नौबत नहीं आई है कि राग मेघ मल्हार गाया जाए।

यहां तक तो ठीक है, लेकिन एक बात समझ में नहीं आती, सावन के आते ही, ये देव क्यों सो जाते हैं ! ऐसा प्रतीत होता है, देव अपना चार्ज, हरी भरी वसुंधरा को सौंप निश्चिंत हो सो जाते हैं। दो जून की रोटी पानी की व्यवस्था हो गई। शादी ब्याह सब ठप पड़े हैं। करने वाले फिर भी कर ही रहे हैं। सावन तो समझदार है, समय पर आ गया ! अब देवों से नहीं, देवराज इंद्र से ही उम्मीद है। समय पर आ ही जाएँगे ! अगर नहीं आए, तो आखिर हम कहाँ जाएँगे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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