श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कान, नाक, और गला…“।)
अभी अभी # 748 ⇒ आलेख – कान, नाक, और गला
श्री प्रदीप शर्मा
(EAR, NOSE & THROAT)
हमारे शरीर के जितने भाग हैं, चिकित्सा की दुनिया में उसके उतने ही विभाग हैं। हर परिवार का एक चेहरा होता है, हमारे चेहरे का भी एक परिवार है, जहां निगरानी के लिए अगर आँखें हैं, तो सुनने, साँस लेने और गले मिलने के लिए कान, नाक और एक गला है। आँख के लिए अगर अलग से आई स्पेशलिस्ट है तो नाक, कान और गले, तीनों का भार, बेचारे अकेले ENT विशेषज्ञ पर है। अजीब सरकार है हमारी एनाटॉमी और फिजियोलॉजी की ! शरीर में ही पूरा मेडिकल कॉलेज खोल रखा है। नाक के नीचे मुंह है, जिसमें बत्तीस दांत हैं, अगर दांत में दर्द है तो यह मामला दंत विभाग का है, E N T का नहीं ! दंत विशेषज्ञ की सेवाएं लीजिए। सॉरी आंटी।
पर्दा आँख में भी होता है, और कान में भी। आँख के पर्दे को रेटीना और कान के पर्दे को ear drum कहते हैं। वैसे पर्दे घरों में, खिड़की दरवाजों में भी होते हैं। कोई पर्दे के पीछे से देखता है, तो कोई पर्दे के पीछे से सुनता है। दीवारों के भी जब कान हो सकते हैं, तो क्या कान के पर्दे नहीं हो सकते। जितना महत्व आंख के परदे का है, उतना ही महत्व कान के परदे का है। अधिक आवाज से कान के पर्दे फटने का अंदेशा रहता है।।
कान सुनने के लिए बने हैं और नाक सूंघने और साँस लेने के लिए। गला हमें धड़ से जोड़ता है। E N T यानी कान, नाक और गले को आप शरीर का 3BHK अपार्टमेंट भी कह सकते हैं, क्योंकि अंदर से ये तीनों अंग आपस में मिले हुए हैं। सर्दी जुकाम हुआ, तो गला भी खराब होना ही है। कान का दर्द भी किसी सरदर्द से कम नहीं। सरदर्द की तो कई गोलियाँ हैं, झंडू बाम है, कान के दर्द का इलाज या तो दादी मां के पास है या फिर किसी E N T के पास।
इस बार हमने कोरोना को मुंह नहीं लगाया। बार बार हाथ धोए, सैनिटाइज किया, गले का विशेष खयाल रखा। हल्दी, नमक और गिलोय हमारी संजीवनी बूटी रहे। मुंह पर मास्क रहा, हम जब भी घर से बाहर रहे। सोचिए, अगर हमारी नाक और कान नहीं होते तो कितनी परेशानी होती। नाक पर मक्खी ही नहीं, मास्क भी टिकता है और चश्मा भी। चश्मा चढ़ता तो आँख पर है, लेकिन उसको सहारा नाक और कान ही देते हैं। कुछ लोग आज भी कान पर जनेऊ चढ़ाते हैं।
श्रृंगार के क्षेत्र में भी महिलाओं का प्रिय विभाग कान, नाक और गला ही है।
दांत के दर्द में अगर लौंग रामबाण नुस्खा है, तो महिलाओं की नाक पर भी लौंग विराजमान होती है। कहीं कहीं इसे नथ भी कहा जाता है। कान नहीं होते तो कर्ण श्रृंगार कैसे होता। झुमका बरैली वाला हो या कान के टॉप्स अथवा इयररिंग, कान, सुनसान अच्छा नहीं लगता। श्रृंगार में क्या कभी गला पीछे रहा है।
हीरे मोतियों की माला हो, मंगलसूत्र हो अथवा नौलखा हार, नारियों की पसंद का उपहार, हार ही तो होता है। प्रेयसी हो या पत्नी, दिल जीतने के लिए गले के हार से बेहतर कोई विकल्प नहीं।
हम कभी कान के कच्चे ना हों, कभी हमारी नाक नीची ना हो, गला सुरीला हो, नाक, कान और गले की बीमारियों से अपना बचाव करते हुए, अच्छा संगीत सुनें, अपने आसपास के वातावरण को शुद्ध और सुगंधित बनाए रखें। गला काट स्पर्धा से दूर रहें। सबका हो भला, हमेशा निरोग रहे, कान, नाक गला।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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