श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जीरावन…“।)
अभी अभी # 749 ⇒ आलेख – जीरावन
श्री प्रदीप शर्मा
जीवन है मधुवन ! मैं कभी मधुवन गया नहीं। बचपन में मेरी अधिकतर जानकारी सोच पर ही आधारित होती थी। बालमन सोचता था, जहां अधिक मधु होगा, उसे मधुवन कहते होंगे। जहां आग होती है, वहां धुआं होता है, जहां मधु होता है, वहां मधुमक्खी भी होती ही होगी।
जब मैं मधुवन में राधिका नाचे रे, वाला गीत सुनता था, तब मुझे चिंता हो जाती थी कि कहीं राधिका के नाचने से अथवा गिरधर की मुरलिया के बजने से कोई मधुमक्खी मगन होने के बजाय विचलित ना हो जाए। समय के साथ मेरा ढाई आखर का ज्ञान विकसित होता चला गया और मैं मधुवन का सही अर्थ भी जान गया। फूल, पराग और खुशबू वाला भी मधुवन ही होता है। अब यह गीत मैं आराम से रस लेकर सुनता हूं। मेरे पास मधुमक्खी तो क्या, कोई मक्खी भी नहीं फटकती।।
बचपन से हम नमक और मिर्ची का नाम तो सुनते आ रहे थे, बोर, जाम, जामुन में नमक मिर्ची लगाते भी आ रहे थे। मां की मसालदानी में जीरा भी होता था, जो बघार में भी डाला जाता था, लेकिन जीरे की उत्पत्ति के बारे में इतना ज्ञान नहीं था। चने के खेत जैसा कोई गीत जीरे के बारे में हमने नहीं सुना।
जब मधुवन की तरह ही जब हमने जीरावन शब्द सुना तो हमें यही लगा, जीरे के वन की ही शायद जीरावन कहते हों। आप चाहें तो कह सकते हैं, बंदर क्या जाने जीरावन का स्वाद। लेकिन जब एक बार जीरावन का स्वाद मुंह को क्या लगा, हमें इस शब्द का वास्तविक अर्थ भी पता चल गया। जीरा क्या जी, सभी स्वादिष्ट चटपटे मसालों का वन है जीरावन।।
घर में अचार नहीं हो, नींबू नहीं हो, सब्जी नहीं हो, कोई चिंता नहीं। बस अगर घर में जीरावन हो तो काम बन जाता है। वैसे पसंद अपनी अपनी। हमें ना तो कोई गरम मसाला रास आता, और ना ही कोई चाट मसाला। जीरावन में गुण भी बहुत है, और स्वाद भी।
भले ही हींग और फिटकरी में कोई सांठगांठ हो, लेकिन रसोई में तो हींग जीरे का ही राज होता है। जीरे की खेती मुख्य रूप से गुजरात के ऊंझा क्षेत्र में और राजस्थान में ही अधिक होती है। और जहां तक जीरावन का सवाल है, आपको आश्चर्य होगा, राजस्थान का प्रतापगढ़ जीरावन का गढ़ है।।
जीरावन में वैसे कोई हीरे मोती तो जड़े नहीं होते। बस जीरा, सूखा धनिया, काला नमक, लाल मिर्ची, हींग और अमचूर ही तो होता है। आप चाहें तो घर में भी बना लें। वैसे जैनियों की दादावाड़ी में कहीं कहीं आपको केसर के साथ जीरावन भी नज़र आ जाएगा।
सात्विक आहार के भी अपने ठाठ हैं। उसे भी राजसी और तामसी बनाने के तरीके हमें आते हैं।
वैसे भी प्याज लहसुन नहीं होने के बावजूद यह स्वादिष्ट है। हमारा तो घर में ही, जीवन है मधुवन, क्योंकि हमारे पास है, नंबर वन जीरावन।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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