श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छेड़ने की उम्र…“।)
अभी अभी # ७५९ ⇒ आलेख – छेड़ने की उम्र
श्री प्रदीप शर्मा
छेड़ा मेरे दिल ने,
तराना तेरे प्यार का
जिसने सुना खो गया
पूरा नशा हो गया ….
जब भी छेड़ने की बात छिड़ती है, बात eve teasing, यानी, छेड़खानी पर आकर ठहर जाती है। उत्तरप्रदेश में भाइयों की छेड़खानी पर बैन है, बैन यानी बंदिश। सहूलियत के लिए इन भाइयों को मजनू भाई कहा जाता है। बहन चाहें तो भाइयों को छेड़ सकती हैं। भाई बहनों का रिश्ता ही ऐसा है। बोलो बहना, ये सच है ना ?
छोड़ो छेड़ने की बातें, हमें इनसे क्या लेना देना।
हर काम की एक उम्र होती है। जब गुरुकुल का जमाना था, गुरु दक्षिणा स्वरूप, शिष्य जंगल जाकर लकड़ियां तोड़ते थे। समय बदलता चला गया। गुरुकुल स्कूल, कॉलेज और संकुल होते चले गए। गुरु शिष्य संबंध फिर भी कायम रहा। हमारे स्कूल कॉलेज की उम्र में लड़के लोग जंगल जाकर लकड़ियां तोड़ने की जगह ट्यूशन फीस के बदले लड़कियां ही छेड़ लेते थे।।
छेड़छाड़ और छेड़खानी में जमीन आसमान का अंतर है। बचपन में भाई बहन के बीच, संगी साथियों के बीच बात बात में एक दूसरे को चिढाना तथा परेशान करना आम बात है। किसी की किताब छुपा देना, तो किसी का एक पांव का मोजा, भी शैतानी और मसखरी की परिभाषा में आता था। भाई बहन की चोटी खींच रहा है और बहन मां से शिकायत कर रही है। यह छेड़छाड़ बड़े होकर एक मधुर स्मृति बन जाती है। बचपन के दिन भी क्या दिन थे।
किसी भी उम्र की लड़की अथवा महिला को गलत इरादे से छेड़ना अथवा उस पर फब्तियां कसना एक घृणित अपराध है, एक ऐसा पैशाचिक कृत्य है, जो दुर्भाग्य से जानवरों में नहीं, सिर्फ इंसानों में पाया जाता है, और यही कृत्य उन्हें इंसान से दरिंदा बना देता है। ईश्वर ने हर इंसान को निगाह भी दी है और नीयत भी। अगर निगाह अच्छी हो और नीयत साफ, तो छेड़खानी का एक अलग ही स्वरूप सामने आता है, जिस पर हम चर्चा करेंगे। ।
ताली दो हाथ से बजती है। आपस का परिचय हमारे मेलजोल और अच्छे व्यवहार से बढ़ता है। हर रिश्ते में प्रेम, आदर और समझदारी के साथ परिपक्वता भी जरूरी है। स्वस्थ संवाद और हंसी मजाक हमें न केवल खुशमिजाज बनाता है, यह रिश्तों में अपनापन बढ़ाता है और उन्हें और अधिक मजबूती प्रदान करता है।
शिक्षा और सह – शिक्षा का संबंध बाल मनोविज्ञान से है। एक समय था, जब सरकारी स्कूल लड़कों के अलग होते थे, और लड़कियों के अलग। केवल प्राइवेट और कॉन्वेंट स्कूल में ही सह – शिक्षा का चलन था। कॉलेज का मुंह देखने के साथ ही बाल मन लड़कियों का मुंह भी कक्षा में देख पाता था। कहीं इस बाल मन में जिज्ञासा, संकोच, शालीनता, नैतिकता और आदर के संस्कार शामिल थे तो कहीं व्यवहार में खुलापन, बेशर्मी, अनादर और बदतमीजी। कॉलेज में लड़के अच्छे भी होते थे, और बुरे भी। लड़कियां सब अच्छी ही होती थी। कुछ संकोची, शर्मीली, तो कुछ मिलनसार, खुशमिजाज। ।
फिल्मों का सबसे अधिक असर युवा पीढ़ी पर ही पड़ा। नायक नायिका का बाग बगीचों में मिलना, नाचना गाना और खलनायक का प्रवेश, छेड़छाड़ और रोमांस का रोमांच परदे से उठकर उनके बाल मन में भी प्रवेश कर गया। गुलशन नंदा और रानू के सस्ते साहित्य का भी इसमें अच्छा खासा योगदान रहा जिसका असर आगे चलकर उनके व्यक्तित्व पर पड़ा। समाज अच्छा बुरा एक दिन में नहीं बन जाता।
जब कोई कृत्य अपराध की शक्ल ले ले, तो यह समाज और मानवता के लिए कलंक है। खेद है छेड़छाड़ की आड़ में हमारे देश की माता बहनों ने इसकी भारी कीमत चुकाई है। कई अनकही कहानियां उजागर ही नहीं हुई, कितनी पीड़िताओं ने अपने कलेजे पर पत्थर रख, उसे दबा दिया, कितनों ने अस्मिता के साथ समझौता किया, कितनों ने आवाज उठाई, प्रतिकार किया, इस बुराई से लोहा लिया, बहुत लंबी, दुखभरी दास्तान है, जिसे छेड़ना अथवा कुरेदना हमारा मकसद नहीं। ।
उम्र के साथ समझ भी आती है। आटे दाल के भाव जवानी के जोश को ठंडा कर देते हैं फिर भी कहीं कहीं बासी कढ़ी में उबाल आया ही करता है। सुंदरता की तारीफ़ किसे बुरी लगती है। कहीं तारीफ अच्छी नीयत से की जाती है तो कहीं खराब नीयत से। अच्छी नीयत से की गई तारीफ रिश्तों में मिठास, समझदारी और छेड़छाड़ के उस स्वस्थ स्वरूप को उजागर करती है, जिसमें आदर, सम्मान के साथ एक अनौपचारिक नोक झोंक भी शामिल होती है। जहां खुलकर हंसी के ठहाके लगते हैं, रिश्ते व्यक्तिगत नहीं पारिवारिक और सार्वजनिक हो जाते हैं।
सत्तर वर्ष की उम्र में मुझे एक अंग्रेजी शब्द prank का शब्दकोश में अर्थ ढूँढना पड़ा।
यह छेड़छाड़ आजकल सोशल मीडिया पर भी शुरू हो गई है।
छेड़खानी शब्द पुराना और दकियानूस हो गया है और लोग शब्दों के साथ भी फ्लर्ट करने लगे हैं। युवा पीढ़ी बहुत आगे निकल गई है और हम रूढ़िवादी मिडिल क्लास मानसिकता वाले आज भी आदर्श और नैतिकता की दुहाई दे रहे हैं। ।
मुझे खुशी है कि मेरी छेड़ने की उम्र अब शुरू हुई है। सुबह सुबह हमाम में नहाते वक्त जब अपना बेसुरा सुर छेड़ता हूं, तो अपने आपको सुर सम्राट पाता हूं। चाय की प्याली जब टेबल पर पड़ी पड़ी ठंडी हो जाती है तो पत्नी का पंचम स्वर गूंज उठता है, कर दी न चाय ठंडी। पत्नी के गर्म मिजाज के कारण ठंडी चाय से भी मुंह जल जाता है। मेरी बदनसीबी, अगर पत्नी के सामने, शब्दों से छेड़छाड़ हो गई, तो अपनी खैर नहीं। यह कोई उम्र है हमें छेड़ने की ! जब उम्र थी तब तो घास डाली नहीं, और अब इस उम्र में, आया सावन झूम के ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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