श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दस्तक…“।)
अभी अभी # ७६० ⇒ आलेख – दस्तक
श्री प्रदीप शर्मा
दस्तक, किसी के आगमन की आहट भी हो सकती है, और किसी प्रिय घटना की पूर्व-सूचना भी ! यह कोई गरजने-बरसने वाली स्थिति नहीं होती, कोयल की एक मधुर कूक होती है, जो याद दिलाती है, किसी के आने की, एक थपथपाहट होती है दरवाजे पर, क्या मैं अंदर आ सकता हूँ ?
दस तक गिनती गिनने में जितना वक्त लगता है, वह एक दस्तक ही होती है। दस्तक में धैर्य होता है, क्योंकि इसका प्रदर्शन घंटे-घड़ियाल अथवा डोअर बेल बजाकर नहीं किया जा सकता !
हाथ, जिसे दस्त भी कहते हैं, की पाँच उँगलियों में प्रमुख, अँगूठे की पड़ोसन अनामिका को मोड़कर जब दरवाज़े पर हौले-हौले ठक-ठक की जाती है, तब उसे दस्तक कहते हैं।।
दस्तक का दहलीज से बड़ा करीबी का संबंध है। आप फ़ोन पर, एस एम एस द्वारा, अथवा ई-मेल से दस्तक नहीं दे सकते। हाँ ! किसी के दिल के करीब जा, धीरे से दस्तक दे सकते हैं। दस्तक की आहट सबको सुनाई नहीं देती। जिसे दस्तक दी जाती है, उसे ही वह सुनाई देती है।
जब जवानी दस्तक देती है, किसे पता चलता है ! जब जीवन में अनायास खुशियां छा जाती हैं, किसी का प्रेम दिल पर दस्तक देता है, मन की किवड़िया खुल जाती है, सैयां जी आन, द्वारे खड़े होते हैं। ।
कभी कभी सिर्फ़ किसी के आने की आहट होती है, दरवाज़ा हवा से हिलता है, महसूस होता है, किसी ने दस्तक दी ! बड़ी उम्मीद से दरवाज़ा खोलते हैं, निराशा ही हाथ लगती है;
कौन आया है यहाँ,
कोई न आया होगा !
मेरा दरवाज़ा, हवाओं ने
हिलाया होगा।।
प्यासे सावन को बारिश की दस्तक की दरकार है, धरती तरस रही है, आसमाँ दस्तक दे। आज तो छूट है, चाहे छप्पर फाड़ दे।
अल्ला मेघ दे, पानी दे, गुड़ धानी दे।।
जिसे देर रात तक, फिक्र के मारे नींद नहीं आती, वह चाहता है, निद्रा देवी आँखों पर दस्तक दे, वह बाहें फैलाकर, आँख मूँदकर उसे अपने आगोश में ले ले।
कई दिनों से तलाश थी, कभी अच्छे दिनों की भी दस्तक हो !
पोस्टमैन जब कोई मनीऑर्डर लेकर आता था, दरवाज़े पर दस्तक बड़ी प्यारी लगती थी। अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई है, देखता हूँ, शायद एक अच्छा दिन ही हो। ।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




