श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पेट पालना।)

?अभी अभी # ७६४  ⇒ आलेख – पेट पालना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

°°° •• Pet Parenting •• °°°

एक आम आदमी केवल अपना ही पेट पाल सकता है और अपने परिवार का ही भरण पोषण कर सकता है। हम चार भाई, चार बहन और माता पिता समेत कुल १० प्राणी थे, यानी इलेवन में सिर्फ एक कम। लेकिन वह हमारा जमाना था। हम दो हमारे दो, से जो परिवार कल्याण शुरू हुआ है, वह आज लिव इन रिलेशन पर भी जाकर शायद ही रुके।

हमने तो अपने आपको सिंगल चाइल्ड तक ही सीमित कर लिया, लेकिन फिर भी हमारे आम और खास परिचित इतने उदारवादी निकले कि उनका आंकड़ा तीन चार तक तो पहुंच ही गया।

दो लगातार कन्याओं के जन्म के पश्चात् एक वंश चलाने वाले तीसरे पुत्र की चाह किसे नहीं होती, लेकिन ईश्वर की इच्छा के आगे क्या किया जा सकता है, जब तीसरी बार भी उनके घर जुड़वा कन्या रत्न ही किलकारी मार रहे हों।।

जो पैदा करता है, वही दाने पानी की भी व्यवस्था करता है। हम अपने पेट को पापी नहीं कहते, फिर भी यह भी कड़वा सच है कि आज की इस दुनिया में पेट पालना इतना आसान भी नहीं। होते हैं कुछ विरले, जो अपने साथ अन्य लोगों के भी पेट का ख्याल रखते हैं। जिन्हें अपना पेट पालने में कठिनाई होती है, उनके लिए सरकार मुफ्त राशन, मुफ्त चिकित्सा और मुफ्त रसोई गैस की भी व्यवस्था कर रही है। हद होती है इंसानियत की। अब क्या आप भगवान से मिलोगे।

एक समय वह भी था, जब लोग अपने सदस्य साथ अन्य पशु पक्षियों को भी पाल लेते थे। भारत कृषि प्रधान देश रहा है। जहां खेती बाड़ी होगी, वहां गाय ढोर भी होंगे ही। खेती के लिए बैल और घर के दूध घी के लिए गाय भैंस भी पाले जाते थे, जिनके रहने के लिए घर के पास ही मवेशियों के लिए बाड़े बनाए जाते थे जहां कटी फसल और कृषि संबंधित उपकरण भी सुरक्षित रखे जाते थे।।

वैसे तो इस पेट को पापी पेट भी कहा गया है, क्योंकि यह कभी तृप्त होता ही नहीं। रोज भरो और रोज खाली, आखिर पापी ही हुआ ना। हम तो सिर्फ अपना ही पेट पालते हैं, होते हैं कुछ लोग ऐसे भी सज्जन जो अपने साथ अन्य मूक प्राणियों का पेट भी पालते हैं।

इन प्राणियों में जलचर, थलचर और नभचर भी हो सकते हैं।

एक शब्द पेट (pet) अंग्रेजी का भी होता है, जिसका भी अर्थ पालतू ही होता है। यह पेट, पालतू कुत्ता, बिल्ली, भी हो सकता है और तोता मैना, कबूतर अथवा लव बर्ड्स भी। वैसे पालने वाले तो घोड़ा, हाथी और आस्तीन में सांप भी पाल सकते हैं। आप इन सबको पशु प्रेमी कह सकते हैं। ये अपने पेट पालने के साथ पेट्स (pets) का भी पालन पोषण करते हैं।।

वैसे तो मेरी बिल्ली कभी मुझसे म्याऊँ नहीं करती, फिर भी इंसान के टुकड़ों पर पलने वाले कुछ कुत्ते भौंकने के साथ साथ काटने भी लगते हैं। शायद या तो उन्हें अंग्रेजी नहीं आती, अथवा उन्होंने अंग्रेजी की यह कहावत नहीं सुनी;

“Barking dogs soldem bite.” अजी solden छोड़िए, ये जंगली कुत्ते तो इतना सॉलिड काटते हैं, कि खुद तो इधर पहले पागल हो जाते हैं, और उधर जिसे काटा, वह पानी भी नहीं मांगता।

दिल्ली के कुत्तों की दहशत की आवाज तो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई, और अब प्रशासन कुत्तों के पीछे पड़ा है, और जन आक्रोश पशु प्रेमियों के खिलाफ। मैने कभी किसी मूक प्राणी को नहीं पाला। होते हैं कुछ लोग, जो बकरी को तो पाल लेते हैं, और बकरे की बली चढ़ा देते हैं। मुर्गी पालते हैं और उसका अंडा ही नहीं, मुर्गा भी खा जाते हैं।

मछली पालन तो किसी का व्यवसाय है, रोजी रोटी है। वाह रे इंसान, तू कितना महान। वाकई, तू pet भी पालता है, और इस पापी पेट को भी।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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