श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कुबेर खैनी।)

?अभी अभी # ७६८ ⇒ आलेख – कुबेर खैनी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुबेर न तो खैनी खाता था, और न ही उसका खैनी का कारखाना था, वह तो स्वयं ही धन का देवता था। जिसे रावण ने अपने यहां बंदी बना लिया हो, उस रावण की लंका, अगर सोने की हो, तो इसमें आश्चर्य कैसा।

आज स्विस बैंक को हम कुबेर का खजाना कह सकते हैं। लेकिन ऐसे कई कुबेर के खजाने हमारे देश में मौजूद हैं। देश के विकास में कुबेर ग्रुप के विकास मालू और किंगफिशर के विजय माल्या के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।।

विजय माल्या को रावण की तरह आप एक आवश्यक बुराई मानकर भुला भी सकते हैं, लेकिन कुबेर खैनी को आप नहीं भुला सकते। खैनी किसी को कुबेर नहीं बनाती, लेकिन जो खैनी बनाते और बेचते हैं, वे किसी धन कुबेर से कम नहीं होते। टीम इंडिया की तरह ही खैनी निर्माताओं की भी एक टीम है, जिसमें मानकचंद, विमल, पान पराग, कमलापसंद, सिमला, गोआ गुटका और रजनीगंधा भी शामिल हैं।

खैनी एक धुआं रहित तम्बाकू उत्पाद है और १०४ मिलियन वयस्कों द्वारा इसका सेवन किया जाता है। वैसे खैनी और कुछ नहीं, तम्बाकू और जलयोजित चूना है। आप चाहें तो इसे तम्बाकू के पान का विकल्प भी कह सकते हैं। जब चूना और तंबाकू को हथेली के बीच रखकर मसला जाता है, तो खैनी तैयार हो जाती है।

भूल जाइए पान बनारस वाला, जब पाउच में ही उपलब्ध है, पान मसाला।।

धूम्रपान निषेध एवं स्वच्छ भारत अभियान का जितना असर सिगरेट और पान की दुकानों पर पड़ा है, उतना असर पान मसाला, गुटका और खैनी पर नहीं पड़ा है। शराब की तुलना में यह कम अधिक बदनाम और सात्विक, शाकाहारी नशा है, जो एक इंसान को दूसरे इंसान के करीब लाता है।

जल्दी पुड़िया निकलती है, और दो अजनबियों के बीच संवाद शुरू हो जाता है।

पान, सुपारी, कत्था चूना और तम्बाकू की जड़ें हमारे समाज में बहुत गहरी हैं।

जो मजदूर दिन भर मेहनत कर पसीना बहाता है, उसके पसीने में पान, बीड़ी और तम्बाकू की गंध भी शामिल होती है।

हमारे देश में उपभोक्ता नहीं, इन उत्पादों का उत्पादक ही धन कुबेर कहलाता है। कितने भी छापे पड़ जाएं, इनके ठिकानों पर, इनका नोट छापना बंद नहीं हो सकता।।

धर्म और राजनीति के नशे के आगे तो यह नशा फिर भी कुछ नहीं, फिर भी बद अच्छा, बदनाम बुरा। पैसे की बर्बादी और सेहत के साथ खिलवाड़। लेकिन इस उद्योग में जितनी जान है उतनी और कहीं नहीं।

आप नहीं जानते, आज के धन कुबेरों की उड़ान कहां कहां तक है।

आपने कल्याण का नाम तो सुना होगा लेकिन शायद कल्याण मटके का नहीं। अगर अमीरों के लिए शेयर बाजार है तो गरीबों के लिए भी कुबेर २२० मटका सट्टे की व्यवस्था है। जहां सरकारी शराब के ठेके कानूनी हैं, उस देश में नशाबंदी और सस्ते नशों के खिलाफ लोगों को जागरुक करना इतना आसान भी नहीं।

फिल्म स्टार हों या क्रिकेट स्टार, जब करोड़ों रुपए लेकर पान पराग और रजनीगंधा के पाउच खोलते हैं, तो गरीब तो गरीब ही रहता है, लेकिन घी तो धन कुबेरों की थाली में ही जाता है। फिर भी, सही को सही और गलत को गलत तो कहना ही पड़ेगा। बुरी है लत बीड़ी, सिगरेट, शराब, गुटका और खैनी तम्बाकू की, क्योंकि यह राह है बर्बादी की। अगर देश का और अपना विकास चाहते हैं, तो इनसे दूर रहें बिकास बाबू।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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