श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हृदय – मंथन।)

?अभी अभी # ७८० ⇒ आलेख – हृदय – मंथन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या आपने कभी बाज़ार में ताज़ा लस्सी पी है, जिसे आपके सामने ही मथा गया हो। एक बड़े से पात्र में दही लिया जाता है, उसमें पानी, शकर, बर्फ और केसर मिलाकर एक बड़ी लकड़ी से मथा जाता है, फिर उसके बाद मस्तानी लस्सी ग्लास में आपको पेश की जाती है। कहीं कहीं आजकल बिजली से चलने वाली मथनी का प्रयोग भी होने लग गया है और अधिकांश जगह तो पहले से घंटों पहले बनाई लस्सी फ्रिज में से निकालकर पेश कर दी जाती है। हाथ से आंखों के सामने मथी लस्सी का स्वाद ही कुछ और होता है।

हम सबों के घर की रसोई में लकड़ी की एक रवई होती है है, वह भी इसी काम आती है। दही की छाछ बनाना और छाछ की कढ़ी। आजकल यह स्टील की भी आने लग गई है। फिलिप्स और अंजलि जैसी कंपनियों ने इसे इतना आसान बना दिया है कि बिना थोड़ी सी भी मेहनत के नवनीत की प्राप्ति हो जाती है।।

मंथन से ही अमृत की प्राप्ति होती है। लस्सी पीने वाले शौकीन जब मलाईदार लस्सी का स्वाद चखते हैं, तो उन्हें अमृत पान का ही अहसास होता है। भोजन वास्तव में अमृत ही तो है। कृष्ण की बाल लीलाओं में मटकी, मथनी और मक्खन का बहुत सुंदर वर्णन हुआ है। बिना मथे भी कहीं मक्खन की प्राप्ति हुई है।

हमारे हृदय में भी केवल विचार ही नहीं भावनाएं भी हैं। जिनका हृदय कोमल होता है, उनका हृदय बहुत जल्द पसीज जाता है। होते हैं कुछ पत्थर दिल पाषाण हृदय वाले निष्ठुर लोग, जिनके हृदय में कोई हलचल नहीं होती। बिना हलचल के भी कहीं दही को मथा जाता है।।

जिस हृदय में हलचल है, जो करुणा से ओतप्रोत है, वह बहुत जल्द पसीज जाता है। जब ऐसे हृदय में मंथन होता है तो जिस नवनीत की प्राप्ति होती है, वह वास्तविक सुख है, संतोष है, तृप्ति है। जब हम दही को मथते हैं तो छाछ बनती है। हृदय को जब मथा जाता है तो वही करुणा द्रवित हो आंखों से आंसू की धारा बन वह निकलती है। इन आंसुओं के साथ जितनी वेदना, जितना पश्चाताप बाहर निकलता है, चित्त उतना ही शुद्ध होता चला जाता है।

हमने हृदय मंथन करना बंद कर दिया है। हमने अमूल का पश्चराइज्ड मक्खन का उपयोग करना शुरू कर दिया है। अब हमारा दिल नहीं पसीजता। हमारे आंसू सूख चुके हैं। अब हम लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने लग गए हैं। हमारी वृत्ति आसुरी होती चली जा रही है।।

भावनाओं में बहना गलत है, हमें यही सिखाया जा रहा है। आंसू औरतें बहाती हैं, आप मर्द हो, घड़ियाली आंसू बहाया करो। जब हृदय द्रवित होता है तो हार्ट अटैक होता है। मजबूत बनो। कैसी भावना, कैसा हृदय मंथन, कैसी चित्त शुद्धि। किसी भी मिठाई की दुकान में जाओ, फ्रिज की लस्सी पियो, पेटीएम से काम चलाओ।

कभी हृदय को द्रवित तो होने दें किसी की याद में, किसी की फरियाद में। प्रार्थना, सबद, भजन, कीर्तन, अरदास, दुआ, सब हृदय मंथन के ही प्रकार हैं। जग को जीतना है तो कभी जगजीत के भजनों में डूबकर देखें। पंडित जसराज, कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी हों, बिस्मिल्ला खान की शहनाई हो या फिर रविशंकर का सितार, मन की वीणा के सभी तार झंकृत हो जाते हैं। यही चित्त शुद्धि है। यही हृदय मंथन है। इसी से जीवन नवनीत की प्राप्ति होती है। यही शायद अमृत वेला है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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