श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शीर्षक संगीत और पार्श्व संगीत…“।)
अभी अभी # ७८२ ⇒ आलेख – शीर्षक संगीत और पार्श्व संगीत
श्री प्रदीप शर्मा
Everything is an art. आज के युग में भले ही इंसान की कद्र ना हो, लेकिन कला और कलाकारों की कद्र है। फिल्म एक ऐसा माध्यम है, जिसमें कला भी है और मनोरंजन भी। फिल्म के कई पक्ष में से संगीत भी एक पक्ष है, जिसके बिना गीत गीत नहीं, एक गायक, गायक नहीं।
फिल्म अभिनेता सुनील दत्त ने, अजंता आर्ट्स के तले, सन् १९६४ में एक फिल्म बनाई थी, यादें, इस फिल्म का संगीत संगीतकार वसंत देसाई ने दिया था। तकनीकी रूप से इस फिल्म में केवल दो ही गीत थे, जो श्रोताओं द्वारा भी कम ही सुने गए। बस, यहीं संगीत का कला पक्ष उजागर होता है। ।
आप कोई भी फिल्म देखें, जब फिल्म के टाइटल चल रहे होते हैं, तब साथ में संगीत भी चल रहा होता है। फिल्म चलती रहती है, कलाकारों का अभिनय चलता रहता है, कहानी भी चलती रहती है और साथ ही पार्श्व में पूरी फिल्म में, संगीत भी चलता रहता है। अगर आप किसी फिल्म को बिना संवाद के सुनने की कोशिश करें, तब ही आपका ध्यान सतत बज रहे संगीत पर जाएगा।
फिल्म शोले की सफलता के बाद इस पूरी फिल्म का साउंडट्रैक रिकॉर्ड रिलीज हुआ और सलीम जावेद संवाद के साथ ही इस फिल्म के संगीत पर भी श्रोताओं का ध्यान आकर्षित हुआ। इसके पहले मुगले आजम की साउंडट्रैक रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध थी। अक्सर रेडियो पर भी पूरी फिल्म सुनी जा सकती थी। जब हम कुछ देखते नहीं, तो हमारे कान बहुत कुछ सुनकर समझ लेते हैं।
दृश्य और श्रव्य दोनों ही आज के संचार के प्रमुख माध्यम हैं। ।
राजकपूर की अधिकांश फिल्मों में शंकर जयकिशन का संगीत रहता था। अगर आप फिल्म आवारा देखें, तो उसके बैकग्राउंड म्यूजिक में आपको जिस देश में गंगा बहती है के गीत ओ बसंती पवन पागल, की धुन सुनने को मिल सकती है। अक्सर हम फिल्म मनोरंजन के लिए देखते हैं। कभी कभी अचानक हमारा ध्यान फिल्म की अन्य खूबियों पर भी चला जाता है।
कभी किसी पुरानी संगीत प्रधान फिल्म के सिर्फ बैकग्राउंड म्यूजिक पर अपना ध्यान केंद्रित करें, ऑर्केस्ट्रा का संगीत और शास्त्रीय धुनों के कुछ टुकड़ों पर आपका ध्यान अवश्य जाएगा। जरूरी नहीं आपको संगीत की समझ हो, संगीत ही आपको सब कुछ समझा देगा। ।
संगीतकार रोशन के संगीत निर्देशन में सन् १९६२ में प्रदीप कुमार, मीनाकुमारी अभिनीत एक फिल्म आरती आई थी, जिसके सभी गीत लोकप्रिय हुए थे। अगर आप इस फिल्म के बैकग्राउंड म्यूजिक पर गौर करें, तो एक जगह आपको संगीतकार रोशन की अन्य फिल्म भीगी रात के शीर्षक गीत, दिल जो न कह सका, की धुन का टुकड़ा सुनाई दे जाएगा।
पूरी फिल्म के लिए संगीत देना ही एक संगीतकार का दायित्व होता है। हम तक तो सिर्फ फिल्मी गीत ही पहुंच पाते हैं। आजकल कई फिल्मों के साउंडट्रैक उपलब्ध हैं, कभी आंख बंद कर इन फिल्मों के मधुर संगीत का भी आनंद लें।
गाने तो हम बहुत सुनते हैं। ।
प्रसंगवश, अभिनेता महमूद केवल एक हास्य कलाकार ही नहीं थे। फिल्म छोटे नवाब से उन्होंने अगर पंचम ऊर्फ राहुलदेव बर्मन को ब्रेक दिया तो फिल्म जनता हवलदार से रोशन साहब के सुपुत्र राजेश रोशन को। उनकी ही फिल्म पड़ोसन के टाइटल म्यूजिक पर कभी गौर करें। फिल्म के सभी टाइटल, शुद्ध हिंदी में हैं जिनके साथ फिल्म के सभी पक्षों का कलात्मक रूप से चित्रांकन है, जो दर्शक को लुभाता भी है और गुदगुदाता भी है। इसे एक हास्य फिल्म के साथ ही एक म्यूजिकल फिल्म भी दर्जा दिया गया है, जहां गीत और संगीत दोनों फिल्म की जान हैं।
एक एक गीत की धुन बनाने में संगीतकारों को दिन रात एक करना पड़ता था। गायक की कितनी रिहर्सल और कितने टेक रीटेक के बाद ही कोई गीत हमारी जुबां पर चढ़ पाता था। जो धुन के पक्के होते हैं, वे ही अच्छी धुन भी निकाल सकते हैं। बिना धुन के भी कभी कोई गीत बना है। इंसान किसी भी धुन पर यूं ही नहीं थिरकता।
संगीत प्रधान फिल्मों की फेहरिस्त बहुत लंबी है।
जरूरत है इनके पार्श्व संगीत यानी बैकग्राउंड म्यूजिक पर गौर करने की।
कहीं सारंगी की मधुर धुन है तो कहीं संतूर का बेहतरीन टुकड़ा। शादी के मौके पर शहनाई तो विदाई पर दुख भरा वायलिन ! हर दृश्य संयोजन के साथ ध्वनि संयोजन भी फिल्म की जान होता है। वीडियो ने हमारी ऑडियो की क्षमता को थोड़ा कम कर दिया है। कभी फिल्म देखें नहीं, उसका साउंडट्रैक भी सुनें। असली संगीत का आनंद लें।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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