श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सपने अपने अपने।)

?अभी अभी # ७९७ ⇒ आलेख – सपने अपने अपने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सपने तो सपने, कब हुए अपने ! यह भी क्या बात हुई ? अपने ही सपने, अपने नहीं होंगे, तो किसके होंगे। अमीर आदमी के तो सभी सपने सच हो जाते हैं, उसकी आँखों की नींद गायब हो जाती है। अब सपने आएँ भी तो कैसे, और अगर आ भी गए तो वापस ग़रीबी के आने से तो रहे।

ग़रीब का सपनों पर जन्मसिद्ध अधिकार है। उसे, कम से कम, सपने देखने से तो कोई नहीं रोक सकता। उसकी हालत तो यह है कि अगर वह आँखें खोल, जीवन की कड़वी सच्चाई से रूबरू होना चाहे, तो सियासत उसे फिर सपने दिखाना शुरू कर देती है। बहुत देख लिए उसने, खुली आँखों से, समाजवाद और गरीबी हटाओ के सपने। अब अच्छे दिनों के सपने देखने के लिए उसके पास वक्त नहीं।।

जिनका यथार्थ कड़वा होता है, वे मीठे सपनों से ही काम चला लेते हैं। जो व्यावहारिक, सकारात्मक सोच और पुरुषार्थी लोग होते हैं, वे सपने देखने में नहीं, सपनों को सच करने में यक़ीन रखते हैं। फिर चाहे वह ओलिंपिक में गोल्ड मेडल का सपना हो, या कौन बनेगा करोड़पति की हॉट सीट पर अमित जी से हाथ मिलाने का।

सपने देखना आपका, (सं)वैधानिक अधिकार है। आप जैसे चाहें सपने देखें, अच्छे-बुरे, शालीन -अशालीन, अहिंसावादी-आतंकवादी, कोई आपको नहीं रोक सकता। यह आपका निजी और अंदर का मामला है। लक्स अंडरवियर से सभी अधिक अंदरूनी।।

फिल्मों को सपनों से बहुत प्रेम है। बहारों के सपने, शहर और सपना तो ठीक, बेचारी स्वप्नसुंदरी पर भी फ़िल्म बना डाली, ड्रीमगर्ल ! आम आदमी को सिर्फ़ चार आने में सच्चाई से सपनों के संसार में ले जाने का दायित्व हमारी फिल्में पिछले कई सालों से बखूबी निभाती चली आ रही है। अब तो अपनी हथेलियों में, जहाँ कभी कराग्रे वस्ते लक्ष्मी, कर मूले सरस्वती का वास था, वहाँ आज एक स्मार्ट फ़ोन सभी सपनों को साकार कर रहा है। अब लोग सपने नहीं देखते, हर चीज़ लाइव देखते हैं, अपने घरों में, बैडरूम में, ड्रॉइंग रूम में, कभी अकेले में, तो कभी सपरिवार।

आप इसे आधी हक़ीक़त और आधा फसाना भी कह सकते हैं। हम खुश हैं, जो मिला उसमें भी, जी न मिला उसमें भी। सपने देखना हम नहीं छोड़ेंगे। अपने तो कब के पराये हो चले, कम से कम सपने तो अपने हैं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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