श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दूसरी पारी।)

?अभी अभी # ८१७ ⇒ आलेख – दूसरी पारी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारा जीवन भी किसी क्रिकेट के मैदान से कम नहीं ! चार दिन की चांदनी ही यहाँ कभी फाइव डे क्रिकेट है तो 50-50 ओवर वाला एक दिवसीय क्रिकेट भी। फटाफट जिंदगी जिंदगी जीने वाले तो आजकल टी-20 में ही पूरे जीवन का आनंद ले लेना चाहते हैं। काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।

यह जिंदगी भले ही दोबारा ना मिले, एक क्रिकेट के टेस्ट मैच की तरह यहाँ भी दूसरी पारी का प्रावधान है। हमारे जीवन के दो भाग होते हैं, पूर्वार्ध और उत्तरार्द्ध, कुछ लोग इन दोनों ही पारियों में बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं, तो कुछ एक पारी में शून्य में आउट हो जाते हैं, तो दूसरी पारी में कमाल दिखा जाते हैं। होते हैं कुछ बदनसीब, जो दोनों पारियों में शून्य पर पेवेलियन लौट आते हैं। ईश्वर बड़ा दयालु है, वह फिर भी उन्हें मौका देता है, क्षेत्ररक्षण का और गेंदबाजी का। वे चाहे तो वहां भी अपनी किस्मत आजमा सकते हैं।।

जिन्होंने अभी जीवन में पदार्पण ही किया है, उनके लिए सभी रास्ते खुले हैं, उनके हाथ खुले हैं, उनके बाजू खुले हैं, वे कितने चाहें, चौके छक्के, अर्ध शतक, शतक, दोहरा शतक और तिहरा शतक मार सकते हैं। बल्लेबाजी नहीं तो गेंदबाजी ही सही, तेज़ नहीं तो स्पिन ही सही। फिरकी, यॉर्कर और फुलटॉस का कमाल ही सही। जीवन में फेंकना और झेलना भी एक कला है। गेंद को मैदान से बाहर भेजना भी कला है और बाउंड्रीलाइन पर जाते शॉट को कैच करना और रोकना भी क्षेत्ररक्षण का ही हिस्सा है।

हमने कितनी पारियां खेली हैं, यह हम ही जानते हैं। कोई आज अपने जीवन के पूर्वार्द्ध में है तो कोई उत्तरार्द्ध में। जीवन में जितनी उपलब्धियां जरूरी हैं उतनी ही खिलाड़ी भावना भी। हमारे ग्रंथ तो हमारी औसत, सौ बरस की जिंदगी को चार बराबर बराबर पारियों में बांटकर चले गए और इन्हें उन्होंने आश्रम का नाम दे दिया। लेकिन एक भारतीय नारी की केवल दो ही पारियां। शादी के पहले मायका और शादी के बाद ससुराल। एक पारी दूसरी पारी के बिना अधूरी।।

आजकल स्त्री पुरुष में ज्यादा भेद नहीं। पुरुषों की तरह महिलाएं भी क्रिकेट खेलने लग गई हैं। घरेलू जीवन हो या किसी दफ्तर का जीवन, जीवन की दोनों पारियों को हंसते हंसते ही तो खेलना है। जरूरी नहीं कि सबके हाथ में बल्ला अथवा गेंद ही हो। जिस पुरुष के हाथ में कभी तलवार थी, आज उसके हाथ में कलम भी हो सकती है और जिस नारी के हाथ में कभी बेलन था, उसके हाथों में कभी देश की बागडोर भी हो सकती है।

हर व्यक्ति अपनी दूसरी पारी शुरू करने के लिए स्वतंत्र है। इतिहास गवाह है, अधिकांश लोगों की दूसरी पारी ही पहली पारी से बेहतर साबित हुई है। जीवन का संघर्ष, कांटों भरी राह, कदम कदम पर चुनौतियाँ ही तो रास्ता सुगम बनाती हैं। इनके अनुभव से ही इंसान की दूसरी पारी रंग लाती है। अक्सर महान लोगों की दूसरी पारी ही उनकी उपलब्धि बन जाती है। हाथ कंगन को आरसी क्या। मोदीजी की दूसरी पारी को ही देख लीजिए।।

जीवन का क्या भरोसा। मुसीबत के वक्त यह पहाड़ जैसा नज़र आता है और सुख के आते ही क्षणभंगुर हो जाता है। हाय यही तो मेरे दिन थे सिंगार के, दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के। इन्हीं रास्तों से गुजर कर ही हम दूसरी पारी तक पहुंच पाए हैं। कुछ साथ छोड़ गए, कुछ साथ रह पाए हैं। कुछ हमारे सहारे हैं, कुछ को हमारा सहारा है।

एक उम्र के बाद जीवन में ठहराव, सुरक्षा और सुकून आ जाता है। हम इसे रिटायरमेंट, सेवानिवृत्ति अथवा निवृत्ति का नाम दे देते हैं। बस यही हमारी दूसरी पारी है, जब हम अपनी प्राथमिकताएं तय करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। अपने लिए जी सकते हैं। यह उम्र आदेश पालन करने की नहीं, अपने आपको आदेश देने की उम्र है। अपनों को साथ लेकर चलने की उम्र है।।

यह उम्र खामियों की नहीं, खूबियों की उम्र है। कमजोरी और मजबूरी के स्थान पर मजबूती और दृढ़ संकल्प के रास्ते पर चलने का समय है। अपने आपको जानने और समझने का मौका तो हमें कभी मिला ही नहीं। कर गुजरें, जो करना चाहते हैं। आपका जीवन कोरा काग़ज़ नहीं ! यह कुछ खोने का नहीं, पाने का वक्त है। आपकी यह दूसरी पारी व्यर्थ ना जावे। जीवन का सूरज तो अब खिला है, जीवन की शाम में सुबह की धूप का आनंद लें। हम सबकी दूसरी पारी, पहली पारी से बेहतर हो। आमीन !

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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