श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गाड़ी और लाइसेंस…“।)
अभी अभी # ८२५ ⇒ आलेख – गाड़ी और लाइसेंस
श्री प्रदीप शर्मा
जो चलती रहे, उसे कबीर गाड़ी कहते हैं। हमारे लिए आज वह वाहन है, और अगर इसमें पहिये और इंजिन भी है, तो लाइसेंस भी ज़रूरी है। आदमी की तरह आजकल गाड़ियों के भी कागजात बनते हैं, उन्हें भी नाम और पहचान दी जाती है। इंसानों की तरह उनका भी बीमा होता है, दुर्घटना होने पर उन्हें भी क्लेम मिलता है। हमारी तरह इनके भी अवयव होते हैं, जिन्हें, हॉर्न, लाइट, क्लच, ब्रेक और एक्सीलेटर कहते हैं। इनके डॉक्टर्स को मैकेनिक और इनके अस्पताल को गैरेज कहते हैं।
कुछ गाड़ियों का तो गैरेज ही ब्यूटी पार्लर होता है। जब सजधज कर वापस मालिक के पास आती है, तो मालिक ही नहीं पहचान पाता।
गाडियां नई भी होती हैं और सेकंड हैंड भी ! इन गाड़ियों का कोई चरित्र नहीं होता, कोई भी नौसिखिया, अपना ड्राइविंग लाइसेंस दिखा, इन्हें उड़ा ले जाता है। गाड़ियों का सिर्फ फिटनेस सर्टिफिकेट होता है, कोई चरित्र प्रमाण पत्र नहीं। अक्सर पैसे वाले रईस लोग एक से अधिक गाड़ियां रखते हैं, जिन्हें उनके ड्राइवर चलाते हैं। नये नये कपड़ों की तरह कुछ लोगों को गाड़ियां बदलने का भी शौक होता है तो कुछ लोग किसी विशेष गाड़ी के प्रति अति भावुक हो जाते हैं, मानो उसमें उनकी जान बसती हो।।
गाड़ी में दो पहिए जरूरी होते हैं। एक पहिये की साइकिल सिर्फ सर्कस में चलती है। एक गाड़ी गृहस्थी की भी होती है, जिसमें शुरू में दो पहिये ही होते हैं।
आवश्यकता और भार अनुसार गाड़ी के पहिये और स्वरूप भी बदलता रहता है। आज वही एक आदर्श गृहस्थी है, जिसके पास एक चार पहिये की गाड़ी है। आप चाहें तो इस गाड़ी को, हम दो, हमारे दो, भी कह सकते हैं।
अगर एक स्टेपनी साथ में हो, तो अधिक बेहतर।
जिंदगी की सड़क पर अगर गृहस्थी की गाड़ी चलेगी, तो वह भी पहिये पर ही चलेगी। दोनों पहियों का साथ ही जिंदगी का साथ है। एक पहिये की जिंदगी किसी अपाहिज की जिंदगी से कम नहीं होती, लेकिन लोग जी लेते हैं। जहां जीवन में आदर्श होता है, उत्साह और उमंग होती है, उद्देश्य होता है, लक्ष्य होता है, जीवन चक्र रुकता नहीं, आत्म विश्वास के पहिये ही काफी होते हैं, जीवन रथ के लिए।।
यूं तो ये जनम जनम के फेरे हैं, लेकिन गृहस्थी की गाड़ी भी कहां सात फेरे और लाइसेंस के बिना चल पाती है। पति का लाइसेंस कोई चेक नहीं करता, यहां पत्नी के कागजात चेक होते हैं। उसे पहले पत्नी बनना होता है, तब ही वह मां बन सकती है। दंड कोई भी भुगते, चालान तो गाड़ी का ही बनता है।
काश गृहस्थी की भी ऐसी कोई गाड़ी बन जाए, जो बिना पहिये के, बिना लाइसेंस के, सिर्फ प्रेम, आदर्श और मर्यादा के कागजात पर चले। किसी गाड़ी के चरित्र पर कभी उंगली ना उठे। कोई यूं ही मुंह उठाकर, पैसे और शोहरत के बल पर शोरूम से नई चमचमाती गाड़ी उठा लाए, और पुरानी गाड़ी गैरेज में, मन मसोसती रह जाए। इंसान अगर गाड़ियों को भी रिश्तों की तरह सहेजना सीख जाए, तो शायद केवल घर गृहस्थी ही नहीं, यह दुनिया भी स्वर्ग हो जाए।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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