श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ताला-चाबी…“।)
अभी अभी # ८२६ ⇒ आलेख – ताला-चाबी
श्री प्रदीप शर्मा
इस पृथ्वी पर आदमी ही एक ऐसा प्राणी है जो सबसे अधिक समझदार भी है और स्वार्थी भी ! यह जानते हुए भी कि सिगरेट से फेफड़े खराब होते हैं, वह सिगरेट पीता है और खत्म हो जाने के बाद उसे ज़मीन पर फेंक, निर्ममता से जूते से मसल देता है। पेड़ से आम तोड़ता है और चूसकर गुठली और छिलका फेंक देता है। खुद घर में रहता है, और दूसरों के घर में आग लगाने की जुगाड़ में रहता है।
वह बहादुर भी है, और सुरक्षा-प्रेमी भी ! अपनी मूल्यवान चीजों को तिजोरी और लॉकर में रखता है। अपनी पत्नी-बच्चों के लिए घर बनाता है, उनकी सुरक्षा के लिए दरवाज़े लगवाता है और चाबी-ताले का भी इंतजाम करता है।।
ताले-चाबी का भी चोली-दामन का साथ है। लोग ताले को नहीं, चाबी को सम्भालकर रखते हैं। ताले के साथ चाबी दहेज में आती है, एक नहीं दो-दो आती है। गलत चाबी से ताला नहीं खुलता ! चोर के लिए कोई ताला ताला नहीं होता। चाबी खो जाने पर चाबी बनवाई जा सकती है, ताला खो जाने पर बेचारी चाबी एक ऐसी बेवा हो जाती है जिसे कोई ताला स्वीकार नहीं करता।
केवल ज़ुबान को छोड़कर सब पर ताला लगाया जा सकता है। जब किसी फैक्ट्री में तालाबंदी होती है तो कई कर्मचारी-मज़दूर बेरोजगार हो जाते हैं। जब किसी बंद घर के ताले टूटते हैं, तो बहुत कुछ सामान चोरी चला जाता है। ताला सुरक्षित लगे होने पर भी अगर चाबी खो जाए, तो ताले को बदल डालने में ही समझदारी होती है।।
लॉकर की चाबियाँ संभालकर रखनी पड़ती हैं, गुम जाने पर डुप्लीकेट नहीं बनती, लॉकर ड्रिल ओपन होता है। जब इनकम टैक्स का छापा पड़ता है, तब कोई चाबी काम नहीं आती। ऐसे वक्त अक्सर चाबियाँ नहीं मिलती और ताले तोड़ दिए जाते हैं।
अपराधी लॉकअप में बंद होते हैं तो सज़ायाफ्ता जेल की हवा खा रहे होते हैं। खुली जेल में भी बाहर से ताला लगा रहता है। मोटे-मोटे ताले, और मोटी-मोटी चाबियाँ आजकल म्यूजियम की शोभा बढ़ा रहे हैं।।
समय के साथ ताला-चाबी का साथ भी अब छूटने लग गया है। दोनों के मिलने का समय बाँध दिया गया है ! सभी ताले इन-बिल्ट लॉक हो गए हैं। कोई डोअर-लॉक हो गया है तो कोई हैंडल लॉक। जब रिमोट ही सब काम करने लगे तो कैसा ताला और कैसी चाबी।
लोग आज भी ट्रेन में सफर करते हैं तो सामान की सुरक्षा के लिए जब तक ताला-चाबी और चेन नहीं रख लेते, उन्हें चैन नहीं मिलता। एक समय वह भी था जब एक दकियानूस शंकालु आदमी चेस्टिटी- बेल्ट लगाकर ही परदेस जाता था और आज अक्षयकुमार पैड-मैन बन एक नए उन्मुक्त खुले दिमाग वाले समाज की रचना कर रहा है।।
बहुत ताले में रख लिया पुरानी पीढ़ी ने नई पीढ़ी को। आज तो नए एंड्राइड फ़ोन का लॉक खोलने के लिए दादाजी सात साल के पोते को ही आवाज़ देते हैं। बेटा ! ये फोन फिर लॉक हो गया है। एक पुरानी कहावत है, सफलता की कुँजी हमारे हाथ में ही है। लगता है वह चाबी हमें मिल गई है। बस लगाने की देर है। खुल जा सिम सिम।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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