श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लिखकर रख लो !…“।)
अभी अभी # ८३३ ⇒ आलेख – लिखकर रख लो !
श्री प्रदीप शर्मा
अगर पूर्वाग्रह और दुराग्रहों को परे रख दिया जाए, तो फेसबुक संवाद का एक उत्कृष्ट माध्यम है ! जो कवि-सहित्यकार-शायर नहीं, वे भी जब तकिया और कलाम को एक करते हैं, तो कोई तकिया कलाम बन ही जाता है। मसलन, लिखकर रख लो !
किसी के कहने से कोई कुछ भी लिखकर नहीं रखता ! लेकिन अपनी बात पर जोर डालने के लिए ऐसा कहा जाता है। इसे आप चाहें तो ” लगी शर्त ! ” का विकल्प भी मान सकते हैं। मर्दों के लिए मूँछ मुंडवाना भी ऐसा ही एक तकिया-कलाम है, जिसका प्रयोग क्लीन-शेव्ड भी बेशर्मी से करते देखे गए हैं।।
बच्चों को नाना-नानी के घर जाने में जितनी खुशी होती है, उतनी ही खुशी आजकल उन्हें नाना-नानी को अपने घर बुलाने में भी होती है। वे उसे मेरा घर कहते हैं। बड़े शहरों और महानगरों में व्यस्तता दूरियों को और भी बढ़ा देती है। वीक-एंड में मिलना हो जाए, तो बहुत है।
मेरा नाती अक्सर मुझसे नाराज़ रहता है, इस बात से, कि नाना-नानी हमारे घर नहीं आते ! जब पहली बार वह हमें आग्रहपूर्वक अपना नया घर दिखाने ले गया था, तो खुशी से फूला नहीं समा रहा था। आओ नाना ! मैं आपको अपना नया घर दिखाता हूँ। जिस तरह हम खुशी और उत्साह से आगंतुकों को अपना नया घर, गृह-प्रवेश के पश्चात दिखाते हैं, बिल्कुल वही अंदाज़। यह हमारा ड्रॉइंग रूम, सोफा, मेरी उँगली पकड़ किचन में ले जाते हुए, यह हमारा मॉड्यूलर किचन, फ्रिज, माइक्रोवेव, और वॉश एरिया में ऑटोमैटिक वॉशिंग मशीन ! कैसा लगा ?
आओ अब मैं आपको मेरे रूम में ले जाता हूँ। यह मेरी पढ़ाई की टेबल, पापा का लैपटॉप और मेरे खिलौने। जब बच्चों के खिलौनों का नंबर आता है, तो उसकी मम्मी की वार्डरोब में रखी साड़ियाँ शरमा जाती हैं। बच्चों की गृहस्थी बड़ो की गृहस्थी से बहुत बड़ी होती है।।
मुझे याद है, उसका आग्रह तीन-चार दिन से कम का नहीं होता ! एक समय था, सुदूर, गाँव में, नाना-नानी के घर हमारा मन नहीं भरता था, और आज नाना-नानी के बिना नाती का मन नहीं भरता। एक ही आग्रह, आप मेरे घर क्यों नहीं आते ! जब कि दोनों एक ही शहर में।
इस रविवार उसका आग्रह दुराग्रह में बदल गया ! उसने अपनी मम्मी से बोला, आप नाना नानी को आज अपने घर ले चलो, वे मेरी बात नहीं सुनते। बेटियाँ तो वैसे ही भरी रहती हैं। उसने उलाहना-स्वरूप कह दिया, ” लिख लो बेटा ! नाना-नानी आज अपने घर किसी हालत में नहीं चलने वाले ! ” बाल-सुलभ मन कुछ समझा नहीं। उसने अचानक उसके बैग में से कॉपी-किताब निकाल ली, और बोला, ” ठीक है मम्मी ! मैं लिख लेता हूँ कि आज नाना-नानी हमारे घर किसी भी हालत में नहीं चलने वाले ! और नीचे मेरी साइन भी कर देता हूँ “।।
उसके भोलेपन ने मुझे गंभीरतापूर्वक सोचने पर मजबूर कर दिया और वह अपने नाना-नानी को अपने घर ले जाने में कामयाब हो गया। अब जब भी कोई व्यक्ति जब किसी बात पर ज़ोर देकर कहता है, लिख लो ! मेरी बात अगर झूठ निकले तो ! अक़्सर या तो यह अति-आत्म विश्वास होता है तो कहीं महज़ दम्भोक्ति ! मन करता है, इस बार लिखकर रख ही लूँ। वह भी क्या याद करेगा ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




