श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “परिंदे और दरिंदे…“।)
अभी अभी # ८३४ ⇒ आलेख – परिंदे और दरिंदे
श्री प्रदीप शर्मा
परिंदों के लिए खुला आसमान है, लेकिन दरिंदों पर भी कहां लगाम है। इस पृथ्वी पर किसका राज है, राम राज में राक्षसराज भी रहे, जंगलराज में अगर वनराज है तो पक्षियों का सरताज भी पक्षीराज ही रहा है। महाभारत क्या है, पहले अशांति, फिर युद्ध और अंत में शांति पर्व। क्या कभी शांति शाश्वत रही है। पहले सम्राट अशोक, फिर कलिंग युद्ध और अंत में फिर वही शांति बुद्धं शरणं गच्छामि।
क्या देवासुर संग्राम का अंत हो गया। क्या दरिंदों ने परिंदों पर रहम करना शुरू कर दिया। क्या रिंद ने इबादत शुरू कर दी, मैखाने से मुंह मोड़ लिया। क्या विदुर नीति चाणक्य नीति और युद्ध की रणनीति में दबकर नहीं रह गई। क्या विदुर नीति पलायन और गीता का ज्ञान ही सर्वोपरि है। धर्म की रक्षा के लिए क्या युद्ध ही जरूरी है। बिना हिंसा के भी कहीं शांति स्थापना हो पाई है। दुष्टों का संहार और अन्याय का प्रतिकार ही धर्म है, पुरुषार्थ है। जिसके लिए गिद्ध दृष्टि और बाज जैसी फुर्ती बहुत जरूरी है।।
हमारे देवी देवता केवल गरुड़ और सिंह की सवारी ही नहीं करते, वे शस्त्रों से सुसज्जित भी रहते हैं। शास्त्र और शस्त्र का अनूठा मेल है हमारे दर्शन में। जब तक धर्म की पूरी तरह हानि नहीं होती, ईश्वर अवतार नहीं लेते और अधर्म से धर्म की रक्षा का भार हम पृथ्वीवासियों पर आ जाता हैं।
आजकल हम सभ्य और सुसंस्कृत हो चुके हैं। न्याय और कानून व्यवस्था पर यकीन करते हैं। फौज, पुलिस और अदालत, सब हमारे पास उपलब्ध है, लेकिन जिस तरह हम परिंदों को उड़ने से नहीं रोक सकते, दरिंदों को दरिंदगी से भी नहीं रोक सकते। दरिंदों से परिंदों में दहशत है, दरिंदों को किसी से डर नहीं।।
सूर्य हमें ही नहीं, हमारे अंतस को भी प्रकाशित करता है। हमारा गायत्री मंत्र भी ज्ञान और प्रकाश के प्रतीक सविता अर्थात् सूर्य की ही तो आराधना है। सूर्य के बारह बीज मंत्रों से हम सुबह सूर्य नमस्कार करते हैं। अगर सूर्य अपने तेज को नियंत्रित नहीं करे, तो इस पृथ्वी का ही पता नहीं चले।
हमारी पृथ्वी में जल तत्व भी है और अग्नि तत्व भी है। तीन चौथाई जल होते हुए भी इसके गर्भ में कई ज्वालामुखी हैं। पृथ्वी भी अगर धैर्य धारण नहीं करे, तो हमें जलजले से कोई नहीं बचा सकता।
हमारे कर्म, सृष्टि को कितने विचलित करते हैं, यह हम नहीं जानते। जब प्रकोप आता है, तब भागते फिरते हैं। यह सृष्टि ही कहीं बगलामुखी है तो कहीं ज्वालामुखी। हमारे कल्याण के लिए यह ज्वाला बनकर फिर भी हमें आशीर्वाद ही देती है।।
यह जानते हुए भी कि प्रकृति की निगाह में हमारा अस्तित्व किसी कीड़े मकोड़े से अधिक नहीं, हमारे अंदर का दरिंदा उछलकूद करने लगता है।
आप क्या समझते हैं, सूर्य आपका गुलाम है, पृथ्वी आपके काले कारनामों की मूक दर्शक बनी रहेगी। एक करेगा, और सब मरेंगे। जब किसी परिंदे की चीख निकलती है, तो धरती रोती है, आसमान रोता है, सूरज शर्म के मारे बादलों में अपना सर छुपा लेता है। सूर्य को ग्रहण यूं ही नहीं लगता। वह अपने क्रोध रूपी तेज पर रोक लगाने की कोशिश करता है। क्योंकि एक बार शिव के तांडव के बाद सृष्टि में प्रलय को कोई नहीं रोक सकता।
हमें प्रदूषण के साथ ही नकारात्मक ऊर्जा को भी कम करना पड़ेगा। क्या अपराध मनोविज्ञान का संबंध आज की बढ़ती स्वच्छंदता और आजादी है। क्या हमारी शिक्षा पद्धति में कोई खोट है। कहीं हमारे आदर्श ही तो खोखले नहीं। दंड विधान की प्रक्रिया कितनी कारगर है, क्या दोषियों को त्वरित दंड का प्रावधान है, जैसे कई ज्वलंत प्रश्न हैं, जो किसी दरिंदगी के साथ उठते हैं, और बंदगी के साथ ठंडे हो जाते हैं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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