श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आदमी और पजामा…“।)
अभी अभी # ८३७ ⇒ आलेख – आदमी और पजामा
श्री प्रदीप शर्मा
इंसान, ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति का नमूना है, वह कोई बंदर अथवा भालू नहीं, कि उसे जैसा मन चाहे, जामा पहना दिया जाए। वह अपनी मर्ज़ी का मालिक है, अपनी बुद्धि और विवेकानुसार अच्छा से अच्छा खा सकता है, और अच्छे से बेहतर तरीके से ओढ पहन सकता है। वह भले ही खुद अपनी नुमाइश करे, लेकिन आप उसे नमूना नहीं कह सकते।
सभी जानते हैं पायजामा पुरुषों द्वारा पहना जाता है। पुराने लोग अक्सर कमीज पायजामा और कुर्ता धोती पहनते थे। आजकल भी कुर्ता पायजामा एक भारतीय वेषभूषा है, जिससे भारतीयता टपकती है। दक्षिण में तो आज भी वकील लोग नीचे धोती और ऊपर कमीज, काला कोट और टाई पहनते हैं। कानून हमें काला कोट और टाई पहनने को बाध्य तो कर सकता है लेकिन हमारी धोती को हात नई लगा सकता। यह हमारी राष्ट्रीयता का मामला है।।
पजामा तंग और कुर्ता ढीला हो सकता है लेकिन अगर कोई हमें कहे, तुम आदमी हो या पजामा, तो यह सिर्फ हमारा सरासर अपमान ही नहीं, हमारी अस्मिता, वेश भूषा, संस्कृति और भारतीयता की भी तौहीन है। आखिर पायजामे में ऐसा क्या है, जिससे हमें शर्मिंदा होना पड़े।
सभी जानते हैं, पेंट बुशर्ट, टाई और आज की फैशनेबल जीन्स हमारा पारम्परिक पहनावा नहीं है। कभी हमने विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी और आज उन्हीं की फटी जीन्स हम पर इतनी हावी हो गई है कि हमें एक अच्छा भला आदमी पजामा नजर आने लगा है और फटी जीन्स वाला नमूना एक बेहतर इंसान। क्या कहें, बस यही कह सकते हैं, साला मैं तो साब बन गया, साब बनके कैसा तन गया।।
मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है, हमारे जमाने में कुछ लड़के कमीज पायजामा पहनकर कॉलेज आते थे। घर पर आज भी कुछ पुराने लोग अमोल पालेकर टाइप, पट्टे वाली बंबइया चड्डी और पायजामा पहनते हैं। लेकिन यहाँ भी ब्रांडेड कैप्री और रंगबिरंगी चड्डी टाइप हॉफ पैंट का जमाना आ गया है, जिसे पहनकर आप मॉर्निंग वॉक, जॉगिंग और मॉल तक जा सकते हो। अगर हम यहाँ भी वही कहावत दोहराएँ कि यह आदमी है या पजामा, तो फिर भी बदनाम हमारा पायजामा ही होता है।
वैसे पजामा, पाजामा, और पैजामा तीनों ही पायजामा का अपभृंश हैं। पायजेब और पायदान की तरह जो जामा पाँव से जुड़ा हुआ हो, उसे पायजामा ही कहेंगे। स्कूल में हमारे हिंदी के अध्यापक खादी के, हाथ से धुले, पारंपरिक धोती कुर्ता पहनकर आते थे और नैतिकता पर विशेष बल देते थे। एक दिन उन्होंने धूम्रपान और तंबाकू के दुष्प्रभाव पर सबकी क्लास ली, और दूसरे ही दिन हमें तंबाकू पर निबंध लिखकर लाने का आदेश दिया। जितना लिख सकें, जो लिख सकें, लेकिन लिखना जरूरी है।।
अगले ही दिन सबकी कॉपियां जप्त कर ली गईं। फुर्सत में उनकी जॉच शुरू हुई और आखिर वह कयामत का दिन आ ही गया, जब सबके निबंधों का पोस्टमार्टम होना था।
कुछ छात्रों के निबंध अच्छे थे, तो कुछ के खराब। लेकिन सभी छात्रों के निबंधों का शीर्षक लाल स्याही से घेर दिया गया था। किसी ने तमाखू लिखा था, तो किसी ने तंबाखू। कहीं कू की मात्रा छोटी थी तो कहीं खू की। शायद ही किसी ने सही तरीके से तम्बाकू लिखा हो।
आप पजामा बोलें अथवा पायजामा, कोई कुछ नहीं कहने वाला। आप पायजामा पहनें, अथवा ना पहनें, यह आपका विवेकाधिकार है, बस आदमी की तौहीन करना हो तो करें, लेकिन बेचारे पायजामे ने आपका क्या बिगाड़ा है। आप यह भी तो कह सकते हैं, तुम आदमी हो या फटी जीन्स? स्वदेशी बनें, लेकिन किसी भारतीय परिधान की इज्जत तो ना उछालें और वह भी बेचारे पायजामे की। वह हमेशा पायजामा ही रहा है, उसने कहीं अतिक्रमण नहीं किया। पायजामे को पायजामा ही रहने दो, किसी आदमी को इसकी उपाधि तो न दो। अगर आप फिर भी आदत से बाज नहीं आए, तो कहीं हम ही अपना आपा ना खो दें और कह उठें आप आदमी हो या…?
© श्री प्रदीप शर्मा
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