श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्रपंच और पसारा…“।)
अभी अभी # ८४० ⇒ आलेख – प्रपंच और पसारा
श्री प्रदीप शर्मा
संसार को माया कहने वाले पंचों की कमी नहीं! मानव शरीर नश्वर है, यह मानने वाले ज्ञानी-ध्यानी जीवन की सीमित आवश्यकताओं पर जोर देते हैं। प्रपंच और पसारा आसक्ति का मूल है, अतः सादा जीवन, उच्च विचार जैसे आदर्श वाक्य यदा-कदा पाठ्य-पुस्तकों में नज़र आ जाया करते थे।
जीवन की एक अवस्था होती है, जिसे आदर्श अवस्था कहते हैं। उस अवस्था में शिक्षा भी आदर्श बाल मंदिर और आदर्श शिशु विहार और आदर्श कन्या महाविद्यालय में ग्रहण की जाती थी। विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, गीता-रामायण, मीरा-कबीर-तुलसी और संत विनोबा आसपास मंडराया करते थे। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य जैसे शब्दों का बोलबाला था। सरकारी स्कूल सादगी, संतोष और सदाचार की शिक्षा दिया करते थे। ट्यूशन जैसा शब्द अस्तित्व में नहीं आया था।।
आदर्श जब बड़ा हो जाता है, तो समझदार और व्यवहारिक हो जाता है। कच्ची उम्र के भोलेपन पर समय की सयानी रेखा लकीर बन चेहरे पर हल्की मूँछ के रूप में उभरने लगती है। फ़िल्म जंगली, प्रोफेसर और राजकुमार के गीत लबों पर अनायास उतरने लगते हैं। बाल मन हुस्न, ज़ुल्फ़ और इश्क़ जैसे शब्दों में उलझकर रह जाता है।
बस यहीं से उसकी ज़िन्दगी में चकाचौंध शुरू हो जाती है।
कॉलेज की हवा, सायकल से स्कूटर, कच्ची उम्र का प्रेम और फिर चार पहिये का सफर, प्रशांत होटल से साया जी होटल तक वह बहुत कुछ ज़िन्दगी का स्वाद चख चुका होता है। अच्छी नौकरी और अच्छी बीवी के बाद वह एक अच्छे आलीशान भवन का स्वामी भी बन जाता है।।
पैसा, प्रसिद्धि और पॉवर ही अब उसके पर्याय हो जाते हैं। बच्चे पढ़-लिखकर विदेशों में सेटल हो चुके होते हैं। ऐसे समय में प्रपंच और पसारा जैसे शब्द जब उसके अवचेतन में प्रवेश कर जाते हैं, तो वह चौंक उठता है।
शायद मुझमें वैराग्य पसर रहा है। प्रपंच मुझे सुहा नहीं रहा है। क्या मेरे वानप्रस्थ के दिन नज़दीक आ गए।
बड़े भारी भरकम हैं ये चार आश्रम, जो कभी सौ बरस की ज़िंदगी को चार आश्रमों में बाँटते थे। किसे मालूम था कि ज़िन्दगी का शॉर्ट कट उसे अनजाने में एक नए ही आश्रम में ला खड़ा करेगा, जिसे आजकल वृद्धाश्रम कहते हैं। यहाँ आकर उसके प्रपंच और पसारे की इतिश्री हो जाती है। उसके ज्ञान-चक्षु खुल जाते हैं, बहुत दुनिया देख ली।।
आलस्य और प्रमाद की तरह ही प्रपंच और पसारा भी हमारे चित्त को बंचक बनाये हुए है। कर्म की विवशता ही हमें सदा प्रवृत्त, प्रबुद्ध और प्रयासरत बनाए हुए है जिसमें लोकेषणा, जिजीविषा, पुरुषार्थ, महत्वाकांक्षा और आसक्ति का भी उतना ही योगदान है। मानसिक संतुलन, विवेक और आंतरिक वैराग्य ही हमारे सांसारिक प्रपंच और पसारे को एक लगाम की तरह कस सकते हैं। अन्तरावलोकन और अनुशासन ही शायद उसकी कुंजी हो।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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