श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छोटे-बड़े सपने…“।)
अभी अभी # ८४१ ⇒ आलेख – छोटे-बड़े सपने
श्री प्रदीप शर्मा
कुछ लोग स्वप्नदृष्टा होते हैं !। वे देश के लिए बड़े-बड़े सपने देखते रहते हैं। सपने देखने के लिए चैन की नींद जरूरी है। कोई आपका स्वप्न भंग न कर दे। इसलिए वे सख्त हिदायत देकर सोते हैं। देश के लिए बड़ा सपना देख रहा हूँ। do not disturb.
फिल्मों की तरह ही होते हैं ये सपने ! कभी बहुत बड़े, कभी बहुत छोटे। सपने देखने के पहले, रुपहले पर्दे पर यह लिखा हुआ नहीं आता, फ़िल्म कितने रील की है। अच्छी है या बुरी, इसकी कोई समीक्षा पहले नहीं होती। एकदम लाइव टेलीकास्ट शुरू हो जाता है।।
कोई फ़िल्म सपनों का सौदागर जैसी वाहियात निकल जाती है तो कोई मेरा नाम जोकर जैसी उत्कृष्ट फ़िल्म। देशभक्त लोग, देशहित में यादगार और यलगार जैसी फिल्में सपनों में देखना पसन्द करते हैं। एक बार तो सपने में चेतक पर सवार, महाराणा प्रताप बन नाला पार कर रहे थे। चेतक का पाँव फिसल गया और उनकी नींद टूट गई, वे पलंग के नीचे गिरे हुए थे।
बड़े सपने देखना इतना आसान भी नहीं होता। एक मच्छर भी आपके सपनों को चूर-चूर कर सकता है। सपनों के लिए मच्छरदानी एक मुफ़ीद जगह है अगर सपना ज़्यादा डरावना न हुआ तो। जो डरते हैं, उन्हें सपने कम देखना चाहिए। जिन्हें कुर्सी छिन जाने का डर है, उन्हें कुर्सी पर बैठकर सपने नहीं दिखाना चाहिए। जनता जागरूक है।।
रात लंबी ज़रूर होती है लेकिन और लंबी हो जाती है, जब चैन की नींद नहीं आती। जो सत्ता में हैं, उन्हें विपक्ष के सपने आते हैं। विपक्ष को तो सपने में भी कुर्सी ही नज़र आती है। चैन की नींद में या तो सपने आते ही नहीं, और अगर आते भी हैं तो अक्सर सुहाने ही होते हैं, बहारों के सपने होते हैं। चुनावी जीत के ढोल में खलल पड़ता है, जब मोबाइल की घंटी अचानक बज उठती है।
समय की माँग है कि बड़े बड़े सपने ना तो देखे जाएँ, और न ही दिखाए जाएँ ! छोटे छोटे सपने ज़्यादा रात भी ख़राब नहीं करते। आखिर सपनों को पूरा करने के लिए जागना भी तो ज़रूरी है। सपना देखना बुरा नहीं, लेकिन झूठे सपने दिखाना अपराध ज़रूर है।।
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© श्री प्रदीप शर्मा
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