श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जीवित प्रमाणित…“।)
अभी अभी # ८४२ ⇒ आलेख – जीवित प्रमाणित
श्री प्रदीप शर्मा
हाल ही में, मैं अपने आपको, जीवित घोषित और प्रमाणित करके आया हूं। वैसे तो जीते सभी हैं, लेकिन मनुष्य योनि में मुख्य रूप से योगी, भोगी और रोगी ही जीवित देखे जाते हैं। योगी ईश्वर के लिए जीता है, तो भोगी सौ वर्ष तक सांसारिक सुख भोगना चाहता है, और रोगी की आस, स्वस्थ होने की उम्मीद और जिजीविषा उसे हमेशा जीवित रखती है। केवल एक पेंशनभोगी ही ऐसा प्राणी है, जो सिर्फ़ पेंशन पर जीता है। यानी पेंशन ना हुई, उसकी लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम अर्थात् वेंटीलेटर हुई।
डिजिटल युग में घर बैठे ऑनलाइन भी अपने आपको जीवित घोषित किया जा सकता है, इसके लिए बस अपने मोबाइल अथवा डेस्कटॉप पर क्लिक किया, और आप जीवित सिद्ध हुए। जीना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन जीवित रहना एक पेंशनभोगी का कर्तव्य भी है, क्योंकि उसे पेंशन जीवित रहने के लिए ही दी जाती है। सेवामुक्ति के पश्चात् आजीवन उसे एक पेंशनभोगी योनि में ही आखरी सांस तक, दिन रात गुजारने हैं।।
पेंशन यूं ही मुफ्त में नहीं मिल जाती, इसके लिए कुछ वर्ष तो गुजारिए परिश्रम और लगन से किसी शासकीय, अर्ध शासकीय दफ्तर में। सस्पेंड होने और टर्मिनेट होने के अंदेशे से अपने आपको बचाते हुए, क्लीन चिट मिलने के पश्चात् ही यह सुनहरा पल एक वेतन भोगी के जीवन में आता है। जो दुनिया में कुछ नहीं कर सकता, केवल वह ही आसानी से नौकरी कर सकता है। केवल कुछ कर गुजरने वाले ही आपसे नौकरी, चाकरी और गुलामी तक करवा लिया करते हैं। पहले आपसे सिर्फ वोट मांगा, और बाद में वामन अवतार की तरह दानवीर बाली को कंगाल कर बैठे।
असली अन्नदाता तो वही है, जो हर व्यक्ति को रोजी रोटी दे, लेकिन कुछ पुण्यात्मा ऐसे भी होते हैं, जो मुफ़्त में राशन, बिजली, पानी और दवा दारू भी बांटा करते हैं, और प्रभु के गुण गाया करते हैं ;
राम की दुनिया, राम का खेत।
खा ले चिड़िया भर भर पेट।।
लेकिन आदमी जिस चिड़िया का नाम है, उसका पापी पेट कभी भरता ही नहीं। कभी ये दिल मांगे मोर, तो कभी एक के साथ एक फ्री। उसे उसके आज की ही नहीं, कल की भी चिंता जो रहती है।।
हम कल की चिंता से मुक्त इसीलिए तो हैं, कि हमें कल भी पेंशन मिलती रहेगी। हमारी पेंशन का संबंध हमारी साँसों से है। बसंती के पाँवों की तरह जब तक हमारी साँसें चलेगी, तब तक हमें भी यकीन है, हमें हमारी पेंशन मिलती रहेगी। पेंशन है तो जीवन है, जीवन है तो पेंशन है। जब पेंशन है तो क्या टैंशन है।
अटेंशन, अटेंशन पेंशनर्स !
जीवन प्रमाण पत्र प्रस्तुत करें, जीना इसी का नाम है।।
♥ ♥ ♥ ♥ ♥
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




