श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचार – प्रवाह…“।)
अभी अभी # ८४५ ⇒ आलेख – विचार – प्रवाह
श्री प्रदीप शर्मा
बहता पानी निर्मला!
गंगा आये कहां से,
गंगा जाये कहां रे।
लहराये पानी में
जैसे धूप छांव रे।।
हमारे विचारों का प्रवाह भी गंगा के बहते पानी के समान ही है। एक बार अंजुलि में नदी के प्रवाह से जो जल हम भरते हैं, दूसरी बार वह जल नहीं होता। कोई नयी जलधारा हमारे हाथ में नीर समा जाती है। विचारों का आवागमन भी कुछ इसी प्रकार का होता है। जो विचार हाथ लग गया, अर्थात जिसे जब्त कर लिया गया, लिख लिया गया, वह अक्षर बन जाता है, शेष विचारों की आकाश गंगा में प्रवाहित हो जाता है।
नदी का उद्गम पहाड़ होते है।
विचारों का उद्गम मन, बुद्धि, अस्मिता और अहंकार होते है। मन का काम संकल्प विकल्प करना है। बुद्धि हमें सोचने पर मजबूर करती है। अस्मिता हमें संस्कार, परिवार और कुल मर्यादा का स्मरण करवाती है और अहंकार हमारा वर्तमान अस्तित्व है। हमारी राष्ट्रीयता, हमारा नाम, उपाधि और रुतबा सभी जगह अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है।।
जागृत अवस्था में तो विचार आना स्वाभाविक है, सुषुप्तावस्था में भी स्वप्न हमारा पीछा नहीं छोड़ते। वहां हमारा मन जाग रहा होता है। केवल गहरी नींद, ध्यान और अचेतावस्था में मन को शांति मिल पाती है। समुद्र की गहराई है गहरी नींद में, और ध्यान में, लेकिन वहां मोती नहीं, सिर्फ सुख चैन है, निर्विकल्प समाधि है।
जितने भी चिंतक, विचारक और दार्शनिक हुए हैं, उनके केवल वे ही विचार मूर्त रूप ले पाए हैं, जो कहीं लिपिबद्ध हुए हैं, उनके भी कई विचार प्रकट ही नहीं हो पाए। बस मन – मन मस्तिष्क में आए और बादलों की तरह बिना बरसे, मंडरा कर चले गए। विचारों का प्रवाह कभी रुकता नहीं, जो हाथ लग गया, वह सूत्र, जो फिसल गया, वह अन्तर्ध्यान।।
विचारों के प्रवाह को रोकना ध्यान कहलाता है। ध्यान करने की कोई विधि नहीं होती। सांस के आने जाने पर ध्यान देने को कहा जाता है। मन पर एक चौकीदार बिठा दिया। ध्यान कर रहे हैं, और ध्यान कहीं और है। पहले सिर्फ दरवाजे पर ध्यान दो। मन की किवड़िया अगर खुली है, तो सजना तो द्वार से प्रवेश करेंगे ही। अगर विचार नहीं, तो संकल्प विकल्प भी नहीं। कोई कविता नहीं, कोई कहानी नहीं, कोई उपन्यास नहीं, कोई महाकाव्य नहीं। विचारों का प्रकटीकरण ही सृजन है।
आनंद और सुख को कोई परिभाषित नहीं कर पाया। गूंगे ने गुड़ चखा, भर पाया। विचार अच्छे भी होते हैं और बुरे भी। वेदव्यास अगर देवताओं के गुरु हैं तो असुरों के शुक्राचार्य भी गुरु हैं। हिटलर, मार्क्स, लेनिन और अरस्तू एक विचार है। आस्तिकता और नास्तिकता विचारों के दो ध्रुव हैं, पूरब और पश्चिम है। विचारों का उगना और अस्त होना ही उनकी नियति है। विचारों से ही इतिहास बनते और बिगड़ते हैं।।
कुछ विचार हमारे होते हैं, कुछ हम किताबों से, कथित महापुरुषों से, हमारे आराध्य ग्रंथों एवं पुराणों से ग्रहण कर लेते हैं और फिर अपने विचार प्रकट करते है। उन पर बहस होती है, विवाद होते है। जब हम सही होते हैं, तो प्रसन्न होते हैं, जब कोई हमें गलत साबित करता है, तो अप्रसन्न होते हैं।
विचारों का दृष्टा बनना भी ध्यान की एक विधि है। मन को विचार से अलग रख पाना ही दृष्टा भाव है। भाव को विचार से श्रेष्ठ माना गया है। विचार चिंतन है, भाव समाधि है। विचार प्रवाह और भाव प्रवाह ऐसी नौकाएं हैं जो हमें संसार रूपी सागर की सैर कराती है। जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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