श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपना अपना सच…“।)
अभी अभी # ९२६ ⇒ आलेख – अपना अपना सच
श्री प्रदीप शर्मा
हम सब सच्चे, मेहनती और ईमानदार हैं, हमें यह किसी को बताने की, अथवा सिद्ध करने की जरूरत नहीं। वैसे हम स्वयं भी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि हम कितने सच्चे, मेहनती और ईमानदार हैं। आपकी आप जानो, हम तो सिर्फ अपनी बात कह रहे हैं।
सच तो खैर हम बचपन से ही बोलते आ रहे हैं। क्या आपने सुना नहीं, सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला ! हम तो बस, सुबह उठकर आईने में अपना मुंह देख लेते हैं और तसल्ली कर लेते हैं कि कहीं हमारा मुंह काला तो नहीं। हमें और हमारे सच को कहीं नज़र ना लगे, इसलिए सावधानी के लिए, एक काला टीका और लगा लेते हैं। सांच को आंच नहीं, फिर भी क्या भरोसा कहीं हमारे सच को किसी की नज़र लग गई तो।।
अब सच कोई ओढ़ने बिछाने की चीज तो है नहीं, न तो इसे घर में सजाया जा सकता है और न ही इसे अकेले घर में छोड़ा जा सकता है। जहां जाते हैं, इसे साथ में ले जाते हैं, कहते हैं अगर सच का साथ हो, तो कभी झूठ पास नहीं फटकता। कभी कभी जब गलती से सच का साथ अगर छूट जाता है तो झूठ उसका फायदा उठाकर हमारे साथ हो लेता है। वैसे अगर हम सच्चे हैं तो झूठ भी हमारा क्या बिगाड़ लेगा।
बचपन में हम ज्यादा सच झूठ नहीं समझते थे। हम सबको सच ही समझ लेते थे। फिर हमें समझाया गया, झूठ से बचकर रहो।
अब अगर झूठ कोई दोस्त हो तो समझ जाएं, कि इससे दूर रहा करो। जहां दोस्ती दुश्मनी जैसी ही कोई चीज ना हो, वहां क्या सच और क्या झूठ। सभी अपने लगते थे। सभी सच्चे लगते थे।।
बचपन में जब हम सही गलत ही नहीं समझ पाते थे, तो सच झूठ क्या समझेंगे। अब किसी नादान बच्चे ने मुंह में मिट्टी भर ली और मुंह नहीं खोल रहा तो उससे पूछा जाता है, नन्हे मुन्ने बच्चे तेरे मुंह में क्या है, और वह सर हिला कर कह देता है, कुछ नहीं।
मां को भरोसा नहीं होता, मुंह खोलकर मिट्टी निकालकर कहती, झूठ बोलता है, मिट्टी खाता है और कहता है, मुंह में कुछ नहीं। कुछ भी कहो, मिट्टी के साथ, झूठ का स्वाद भी मुंह को लग ही जाता है। वह बार बार झूठ बोलता है, मार खाता है।
सच यूं ही नहीं उगला जाता। पहले मां की मार, फिर मास्टरजी की मार, थाने में पुलिस की मार भले ही कितना भी सच उगलवा ले, परिस्थिति की मार एक ऐसा कड़वा सच है जो न तो निगलते बनता है और न ही उगलते।।
सत्य की सदा विजय होती है, यह हम अदालतों में देख ही रहे हैं, अतः इस पर ज्यादा प्रकाश डालने की जरूरत नहीं। आपसे सच बुलवाने के लिए शपथ पत्र लिया जाता है, जिसे हलफनामा अथवा एफिडेविट कहा जाता है।
शपथ ही कसम है, एक तरह की सौगंध। कसमें, वादे, प्यार, वफा सब बातें हैं, बातों का क्या, यह हम नहीं, फिल्म उपकार के प्राण ऊर्फ लंगड़ कह गए हैं।
कसम भी क्या चीज है कसम से ! पत्नी स्वादिष्ट भोजन परोस रही है। स्वाद में अधिक खाने में आ ही जाता है। एक फुल्का और ले लीजिए, अरे नहीं भाई, पेट भर गया है। लगता है खाना अच्छा नहीं बना, वर्ना एक तो और ले ही लेते। अच्छा, चलो नहीं मानती तो एक रख दो। पत्नी उत्साह में थोड़े चावल और ले आती है, आप परेशान हो जाते हैं। सच में अब बिल्कुल जगह नहीं है। आपको मेरी सौगंध, इतना सा तो ले ही लो। बेचारा सच, इस सौगंध से परेशान हो जाता है।।
सच भले ही परेशान हो, पराजित नहीं होता। आज कौन परेशान है और कौन विजयी, यह कहने की आवश्यकता ही नहीं है। सच का धंधा मंदा है, झूठ का कारोबार खूब फल फूल रहा है। सब अपने अपने सच और ईमान को सभाले हुए हैं। तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफिर जाग जरा।
कलि के बाद कलयुग आया, जिसे हमने मशीनी युग नाम दिया। अटल युग के बाद अब डिजिटल युग आ गया है, इंसान की चतुराई धरे रह गई है, झूठ को पकड़ने के लिए सच अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का रूप धारण कर आया है। शायद अब सच के नहीं, झूठ के परेशान होने के दिन आ गए हैं।।
मौसम की तरह सच झूठ का चोला पहनने वालों की अब खैर नहीं। जब झूठ के कपड़े उतारे जाते हैं, तब ही नंगा सच नजर आता है। अगर आपने सच में, सच का दामन थामा है, तो आपको झूठ और पाखंड से डरने की जरूरत नहीं।
सच के सौदागरों और ठेकेदारों की कमी नहीं आजकल। उनके बहकावे में आकर कोई झूठा सच्चा सौदा ना कर बैठें। आपके सच को संभालें, क्योंकि आज के डिजिटल सच को भी साइबर क्राइम का खतरा है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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