श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सच का सपना…“।)
अभी अभी # ९६३ ⇒ आलेख – सच का सपना
श्री प्रदीप शर्मा
कल सपने में मैंने सच को देखा ! या यह कहूं मैंने सच के दीदार किये, दर्शन किये। मैंने कभी खुली आंखों से सच का साक्षात्कार नहीं किया, जब भी आंख बंद की, कभी सच नजर नहीं आया और अचानक आज सपने में सच को सामने देखकर मुझे भरोसा नहीं हुआ कि मैं सच का सामना कर रहा हूं, दर्शन कर रहा हूं। हां, इतना अहसास ज़रूर था, कि मैं सपना देख रहा हूं।
आप भी सोचेंगे, जब सपना सिर्फ सपना ही होता है, कभी सच नहीं होता, तो सच सपने में क्यों और कैसे आ सकता है। लेकिन सत्य तो ईश्वर है, वह जब कहीं भी आ जा सकता है, तो मेरे सपने में भी सच बनकर आ सकता है। भले ही मैं उसे पहचान न पाऊं।।
आप सपने में आंख खोलकर नहीं देख सकते। सपने बंद आंखों से ही देखे जाते हैं। हां, सपनों को सच करने के लिए आंखें ज़रूर खोलनी पड़ती है, जागना पड़ता है, विवेकानंद बनना पड़ता है ;
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
मेरे सामने सपने में सच था। मैने उसे देखने की कोशिश की। वह न तो नंगा था, न उसने फटी जींस पहन रखी थी, और ना ही वह अन्य किसी लिबास में था। स्वप्न में आप बड़े असहाय होते हैं। अवचेतन में बुद्धि और विवेक ताक में धरा रह जाता है, ठीक वैसे ही, जैसे बड़े बड़े मंदिरों में, प्रवेश के पूर्व, पर्स, कैमरा और मोबाइल तक लॉकर में रख लिया जाता है।।
जब बहुत देर तक सामने कुछ नज़र नहीं आया, तो मुझे सच पर शंका होने लगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि सच वच कुछ नहीं, एक धोखा है, फरेब है, दिखावा है। काहे का शिव और सुंदर। क्या सपने में भी बोध होता है ! शायद सच मुझसे मुखातिब था, लेकिन सामने नहीं आ रहा था। लेकिन हां मैं उसे सुन रहा था। वह कह रहा था सच एक अहसास है जो हमेशा अपनी आत्मा के आसपास है। अंतरात्मा का सच से संबंध है।
हम जब भी खुद से दूर होते हैं, सच से दूर होते चले जाते हैं। अपने करीब रहना ही सच के करीब रहना है। अपने आप से दूर जाना सच से पीछा छुड़ाना है, झूठ के पीछे भागना है। सत्य में प्रकाश है, झूठ अंधकार है। सांच को आंच नहीं। मतलब क्या आत्मा की तरह सच को भी किसी अस्त्र अथवा शस्त्र से पराजित नहीं किया जा सकता।।
मैने देखा, अचानक सच कहीं गायब हो गया था और सपने में मैं सच से नहीं, अपने आप से ही बातें कर रहा था। मेरा अब भी यही मानना है, सपना कभी सच नहीं होता। सच कभी सपना नहीं होता। सच हकीक़त होता है, मीठा, कड़वा आपके अनुभव के आधार पर होता है। इतने लोग दुनिया में एक दूसरे को मज़ा चखाते हैं, कभी सच को भी चख लें, लोगों को भी सच का स्वाद चखाएं। वाकई, मज़ा आ जाएगा ..!!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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