श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फटे कपड़े…“।)
अभी अभी # ९६४ ⇒ आलेख – फटे कपड़े
श्री प्रदीप शर्मा
कुछ कपड़े फट जाते हैं, तो कुछ कपड़े फाड़ दिए जाते हैं। हमारा जमाना कपड़े पहनकर फाड़ने का था। बाजार से पहले कपड़ा आता था, फिर खुशी खुशी दर्जी को नाप दिया जाता था। शादी, जन्मदिन अथवा पास होने की खुशी में ही नए कपड़े नसीब होते थे। तब दीवाली भी मिठाई और नए कपड़ों से ही मनाई जाती थी।
बड़े भाई के कपड़े आगे चलकर छोटे भाई के काम आते थे और बड़ी बहन के, छोटी बहन को। तब कहां टेरीकॉट और टेरिलिन के कपड़ों का चलन था। सूती कपड़ों को घर में वाशिंग मशीन में नहीं, मोगरी से कूटा जाता था। बरसात में कई दिनों तक कपड़े नहीं सूखते थे।।
मुझे अच्छी तरह याद है, मेरी सूती पैंट साइकिल अधिक चलाने के कारण अक्सर पीछे से ही फटती थी। बाकी सब जगह तो रफू हो जाता था, लेकिन तशरीफ के साथ मजाक नहीं चलता था। अगर पैंट पीछे से फटी, तो किसी काम की नहीं। कालांतर में फटी शब्द का अर्थ ही बदल गया।
कुछ फटे पुराने कपड़ों की मां मजबूत थैली बना लेती थी। तब कहां कैरी बैग चलते थे। घर घर में सिलाई मशीन थी। पुराने कपड़ों का कायाकल्प घर में ही हो जाता था।।
बच्चों की फ्रॉक, झबले और महिला सदस्यों के ब्लाउज घर पर ही सिलते थे। एक मशीन आती थी जिससे बटन के लिए कमीज में सूराख किए जाते थे, जिसे काज कहा करते थे। काज बटन संस्कार किसी नए परिधान के तैयार होने का अंतिम चरण था। कपड़ों में मशीन से काज बटन लगवाने का काम मेरा था।
तब हम लोग इतनी चैरिटी अफोर्ड नहीं कर सकते थे कि पुराने कपड़े किसी गरीब को दे दें। मोहल्ले में कुछ औरतें पुराने कपड़ों के बदले बर्तन दे जाती थी। मधुर तान में जब वह आवाज लगाती थी, तो लगता था, संगीत की कोई नई धुन सुन रहे हैं। कपड़ों की पूरी जांच परख होती थी। फटे कपड़े और होली के रंगे कपड़े, हिकारत से निकाल दिए जाते थे। केवल साबुत कपड़े ही एक्सचेंज ऑफर में स्वीकार्य थे। किचन के कई पुराने बर्तन आज भी हमारे पुराने कपड़ों के त्याग का ही प्रतिफल है।।
वैसे अंदर की बात कौन बताता है। लेकिन जब सबकी फटी फिर रही है तो हम भी क्यों पीछे रहें।
हम लक्स अंडरवियर, डोरा बनियान और बंबइया चड्डी की बात कर रहे हैं। इन्हें होजियरी कहते हैं। अगर बनियान में एक छेद हो गया तो वह बहुत जल्द एक गड्ढे में परिवर्तित हो जाता है। रबर की तरह समय के साथ बनियान लंबा होता चला जाता है। कभी कभी तो शर्ट छोटी और बनियान लंबी हो जाती है। आधी बांह का बनियान, आधी बांह की शर्ट से बाहर ऐसा नजर आता है जैसे जनता चौक पर दूर से ही राजवाड़ा।
मर्दों में भी आजकल लंबी चड्डी पहनने का फैशन चल गया है। ना वह हॉफ पैंट है, ना फुल पैंट। फैशन आती रहती है जाती रहती है। टीवी सीरियल के महिला पात्रों की पीठ, ढंकी रहने के बावजूद इतनी उघाड़ी रहती है कि ब्लैक बोर्ड की तरह उस पर गणित के कुछ प्रश्न भी आसानी से हल हो जाएं। इस्स ! हमें तो शर्म आती है भाई। कपड़े तो ठीक, हमें तो दूध भी फटा हुआ अच्छा नहीं लगता। काश फटी जीन्स का भी फटे दूध की तरह पनीर बन जाता।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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