श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खिलाड़ी भावना…“।)
अभी अभी # ९६५ ⇒ आलेख – खिलाड़ी भावना
श्री प्रदीप शर्मा
अगर किसी खेल में हार-जीत न हो, तो खेल का मज़ा ही क्या ! हर खेल जीतने के उद्देश्य से ही खेला जाता है। जो जीता वही सिकंदर कहलाता है। हारे को हरि नाम।
हर खेल में एक ही भावना होती है, प्रतिद्वंद्विता की भावना ! खेल की एक ही नीति होती है, रणनीति ! अगर भाई भाई भी कोई खेल खेलते हैं, तो एक हारता है, और एक जीतता है। महाभारत में युधिष्ठिर ने जुआ खेला था। पासे उल्टे पड़ते गए, वे सब कुछ हारते चले गए। राजसभा देखती रही, विदुर, भीष्म, कृष्ण कुछ न कर पाए और युधिष्ठिर द्रौपदी को भी हार बैठे। जहाँ शकुनि सामने होता है, हमेशा पासे उल्टे ही पड़ते हैं।।
आजकल सभी खेल पेशेवर हो गए हैं ! जीतने वाले को अगर बड़ी राशि और बड़ा पदक दिया जाता है, तो हारने वाले भी करोड़पति होने लग गए हैं। winner न सही, runner ही सही।
राजनीति भी एक खेल ही है ! यह सेवा का खेल है ! जो जीतेगा, सरकार बनाएगा, वही सेवा करेगा, जो हारेगा, वह न तो खेल छोड़ेगा और न ही सेवा करेगा। उसका खेला तो अब शुरू होता है। जो जीता है, उसे नहीं खेलने देना। वह एक ऐसी कबड्डी का खेल खेलता है, जिसमें सिर्फ टांग खींची जाती है। अगर सामने वाला गिर गया तो बच्चों की तरह ताली बजाई जाती है।।
खेल हो या राजनीति, जीतने के लिए हर तरह के खेल खेले जाते हैं। शक्ति प्रदर्शन, सूझबूझ और साम, दाम, दंड भेद सबका सहारा लिया जाता है। एक खेल मिलीभगत का भी होता है। जहाँ आर्थिक लाभ के लालच में शक्तिशाली हार जाता है और कमज़ोर विजयी हो जाता है। आईपीएल की भाषा में इसे सट्टा कहा जाता है। यह खेल भावना के विपरीत है।
राजनीति में चुनाव जीतने के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। ये कंडे गोबर के होते हैं और हाथ से बनाये जाते हैं। जब कभी ये हथकंडे भी काम नहीं आते, तो यही कहा जाता है, सारा गुड़ गोबर हो गया। पैसा, शराब और चुनावी वादे भी हथकंडों की श्रेणी में ही आते हैं।।
हमारे देश में दो ही तो राष्ट्रीय खेल हैं, राजनीति और क्रिकेट। राजनीति में खिलाड़ी भावना वैसे तो कम देखने को मिलती है। लेकिन सौजन्यवश, अगर जीता हुआ प्रत्याशी, हारे हुए प्रत्याशी को उसके घर जाकर बधाई दे दे, तो इसे खेल भावना का परिचय कहा जा सकता है।
चूँकि खिलाड़ी भावना, जिसे अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त करने के लिए अंग्रेज़ी में स्पोर्ट्समैन स्पिरिट कहते हैं, जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, खेल से जुड़ी होती है, इसलिए आज भी खेल की हार-जीत केवल खेल के मैदान तक ही सीमित होती है। बाद में सभी हारे हुए, और जीते हुए खिलाड़ी पुरस्कार समारोह में एक दूसरे से हाथ मिलाते हैं, बधाई देते हैं। और खेल समाप्ति के बाद साथ साथ शॉपिंग करते हैं, प्रशंसकों को ऑटोग्राफ देते हैं।।
कितना विचित्र संयोग है ! इस बार चुनाव और आईपीएल टी-20 टूर्नामेंट, तकरीबन, साथ साथ ही चल रहे हैं। एक ओर अगर विश्व के सभी क्रिकेट के धुरंधर अपनी राष्ट्रीयता भूल एक बैनर के तले, पेशेवर तरीके से ही सही, अपनी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं, कोई जीत रहा है, कोई हार रहा है, लेकिन प्रशंसक हर बॉल पर, और हर शॉट पर तालियाँ बजा रहे हैं और स्टेडियम में बैठे दर्शक ही नहीं, घरों में टीवी के सामने बैठे शौकीन और जानकार इस जेंटलमैन’स् गेम अर्थात सभ्य पुरुषों के खेल का आनंद ले रहे हैं, तो दूसरी ओर चुनावी माहौल में केवल एक दूसरे पर कीचड़ उछाला जा रहा है। लोकतंत्र के पवित्र उत्सव का मज़ाक उड़ाया जा रहा है।
चलिए मान लिया, everything is fair in love and war ! लेकिन क्या हम चुनावी हार जीत को क्रिकेट की हार जीत की तरह नहीं ले सकते ? नहीं कदापि नहीं ! ये चुनाव देश का भविष्य निर्धारित करेंगे, देश का भाग्य बदलेंगे। और हम मतदाता भाग्य-विधाता हैं। हमारे लिए यह चुनाव जीवन मरण का प्रश्न है। आईपीएल कोई भी जीते, हमें कोई मतलब नहीं। हमारा ध्यान तो इस ओर है कि इस बार किसकी सरकार बनती है। कोई खिलाड़ी भावना नहीं। खुला खेल फरूखाबादी।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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