श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “डबल सवारी…“।)
अभी अभी # ९६६ ⇒ आलेख – डबल सवारी
श्री प्रदीप शर्मा
यह तब की बात है, जब हर घर में एक साइकिल होती थी। साइकिल, जिसे बाइसिकल भी कहते हैं, एक ऐसा दुपहिया वाहन है, जिस पर मोटर व्हीकल एक्ट लागू नहीं होता, साइकिल का कोई रजिस्ट्रेशन नहीं होता और इसका कोई थर्ड पार्टी इंश्योरेंस भी नहीं होता।
हमने बचपन में एक पहिये की गाड़ी भी चलाई है और तीन पहिये की लकड़ी की हाथ गाड़ी भी। एक पहिये की छड़ीनुमा गाड़ी में एक हैंडल होता था, जिसके पहिये से एक घंटी भी जुड़ी रहती थी। इस साइकिल में बैठने का नहीं, साइकिल चलाने का सुख नसीब होता था। लकड़ी की, तीन पहिए की हाथ गाड़ी से तो हमने चलना सीखा था, साइकिल चलाना नहीं।।
हमें याद है, तीन पहिये की साइकिल, जिसमें एक सीट आगे होती थी और एक सीट पीछे, जिस पर छोटा भाई अथवा बहन भी आसानी से बैठ सकते थे।
वह सिंगल चाइल्ड का जमाना नहीं था।
दो पहिये की साइकिल सीखने के लिए कोई लर्निंग स्कूल नहीं था।
स्कूल के मैदान में, अथवा मोहल्ले की सड़कों पर ही यह ट्रेनिंग गिरते पड़ते संपन्न हो जाती थी। कैंची से शुरू होकर सीट पर बैठकर साइकिल चला लेना आपको एक कुशल साइकिल सवार सिद्ध कर ही देता था।।
साइकिल लेडीज भी होती थी और जेंट्स भी। हालां कि इसमें एक ही सीट होती थी, लेकिन पीछे साइकिल कैरियर भी होता था, जिसका अधिकतर उपयोग डबल सवारी के लिए किया जाता था।
भले ही तब साइकिल एक राष्ट्रीय सवारी हो, यह कहां सबके नसीब में होती थी।
बच्चों के लिए अगर साइकिल चलाना शौक था, तो बड़ों के लिए जरूरत। इन सबकी सुविधा के लिए कुछ ऐसे साइकिल की दुकानें थीं, जहां साइकिल रिपेयर भी होती थीं और प्रति घंटे की दर से किराए से भी मिल जाती थी।।
क्या साइकिल का भी चालान बनता था ? जी हां, हम भुक्तभोगी हैं। बड़ी दर्दनाक दास्तान है। तब शहर में न तो कहीं वन वे था और न ही ट्रैफिक सिग्नल ! बस चौराहों पर कुछ सिपाही मुस्तैदी से यातायात नियंत्रित करते रहते थे। अचानक एक दिन हम और हमारा दोस्त कृष्णपुरा पुल के थाने के पास डबल सवारी धर लिए गए।
हमें थाने ले जाया गया। डबल सवारी का चालान कटा, साइकिल जप्त हुई। इधर जेब में फूटी कौड़ी नहीं। पता चला, चालान कोर्ट में पेश होगा। कोर्ट में हमारी पेशी होगी, जज साहब जुर्माना वसूलेंगे, तब ही हम छूट पाएंगे। नाम, पिता का नाम, पता, सब तो नोट कर लिया गया। अगर पिताजी को पता चला तो एक तरफ कुआं और एक तरफ खाई।।
एकाएक नईदुनिया के एक
सिटी रिपोर्टर की हम पर नज़र पड़ी। वे पिताजी को जानते थे। लेकिन पुलिस बड़ी ईमानदार निकली। पत्रकार महोदय के कहने पर हमें साइकिल वापस मिल गई और हमें छोड़ भी दिया गया लेकिन अदालत का मुंह तो हमें फिर भी देखना ही था।
हमें समझा दिया गया था। जज साहब से ज्यादा बहस मत करना। चुपचाप अपना अपराध कबूल कर लेना। दो रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा। अगर सफाई पेश की तो जुर्माना डबल हो जाएगा।।
धर्मसंकट और आर्थिक संकट एक साथ। पिताजी तक बात भी नहीं जाए, और आर्थिक मदद भी कहीं से मिल जाए। ऐसे वक्त हमारे दाऊ यानी बड़े भाई साहब बहुत काम आते थे। उन्होंने सब संभाल लिया। कोर्ट में हमारी पेशी भी हो गई और आर्थिक दंड भरने के पश्चात हम लौटकर बुद्धू वापस घर भी आ गए।
आज वन वे में साइकिल क्या हाथी भी निकल जाए, तो कोई अपराध नहीं बनता। पूरी की पूरी बारात एकांगी मार्ग से गुजर जाती है, प्रशासन तमाशा देखता है, उधर डबल सवारी में हमारा तमाशा बन गया। आज हम कितने सुखी हैं
जो यह गीत गा रहे हैं ;
चक्के पे चक्का
चक्के पे गाड़ी।
गाड़ी पे निकली
अपनी डबल सवारी।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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